कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा…

यादों की थोड़ी सी मिट्टी लेकर ,

आज उनसे दो अक्स बनाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

आज यारों की महफिल में,

फिर से कुछ रंग जमाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

फिर तोड़कर उन चेहरों को,

उनसे फिर दो शख्श बनाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

ताकि तुम में कुछ-कुछ मैं रह जाऊँ,

और मुझ में कुछ-कुछ तुम रह जाओ,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

आज फिर से पुरानी तस्वीर लेकर,

साथ में कुछ तो वक्त बिताना,

कुछ तुम जैसा कुछ मुझ जैसा।

ताकि तुम में कुछ-कुछ मैं रह जाऊँ,

और मुझ में कुछ-कुछ तुम रह जाओ….

रिश्ते

जीवन अपनों से ही परिभाषित होता है। जीवन की सार्थकता अपनों के बीच ही है। अपरिचित व्यक्तियों और अनजान स्थान पर जीवन व्यतीत करना मुश्किल हो जाता है। अनजानी जगहों पर मुख्य बाधा विचारों के आदान-प्रदान में आती है। जहां हम किसी से व्यवहार नहीं कर सकते और कोई हमें समझ नहीं पाता है तो वहां रहने में मुश्किल आना स्वाभाविक ही है।

संबंधों के लिए भावनाओं की जरूरत होती है। भावनाओं के तार ही हमें एक दूसरे से जोड़ने का काम करते हैं। जब तक भाव नहीं जुड़ते हैं तब तक संबंध मजबूत नहीं होते हैं और संबंधों में गहराई नहीं आती है।

जब कोई हमें समझने वाला होता है, जो हमारे सुख-दुख से संवेदित होता है, हमारे साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है तो वहां जिदंगी का फूल विकसित होकर खिलता है। जहां लोग अपने होते हैं वहां जीवन की परिस्थितियां लगभग एक जैसी होती हैं और मंजिल साथ मिलकर बढ़ने पर मिल ही जाती है।

जीवन के विकास में अपनत्व और प्रेम की बहुत आवश्यकता होती है जो हमें केवल अपनों द्वारा ही मिल पाता है, दूसरे शब्दों में जहां अपनत्व मिलता है वहीं लोग अपने होते हैं।

सामान्य रूप से हम अपने संबंधियों और परिवार के सदस्यों को ही अपना समझते हैं पर ये सब मात्र शरीर और रक्त के संबंध हैं। सच्चे संबंध तो वहां बनते हैं जहां पर विचार और भावनाएं मिलती हैं।

विचार और भावनाओं के मेल से ही संबंधों में स्थायित्व आता है, उनमें प्रेम पनपता है और रिश्तों में गर्माहट आती है। सच्चे संबंध ही जीवन को सार्थक और बेहतर बनाते हैं। हमें भी भावनाओं को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि भावनाओं की मजबूती पर ही रिश्तों की इमारत खड़ी होती है।

इंसान के रिश्ते वक्त जरूरत के मुताबिक बदलते रहते हैं, पुराने संबंध टूटते और नये बनते हैं। कभी अपने पराये तो कभी पराए अपने बन जाते हैं। पुराने लोगों की जगह नये लोग आते हैं और नया रिश्ता बन जाता है, लोग साथ छोड़कर चले जाते हैं और रिश्ता खत्म हो जाता है। कुछ संबंध एेसे भी होते हैं जो समय के परे हैं जिन रिश्तों में भावनाएं गहरी और सच्ची होती हैं उन्हें काल भी मिटा नहीं पाता है।

बिना मंज़िल का सफ़र

वो बिना मंजिल के सफर पे था,
वो नाकाम होकर भी किसी की नज़र में था,
अनजानी सी ख्वाईशों से थी उसकी यारियां,
न जाने वो किसके असर में था।

बातों में उसकी थी दुनियादारी की कमी,
वो अपनी ही मौजों की लहर में था,
किसे सुनाता वो अपने चंद पन्नों के ग़म,
पता चला वो तो बुतों के शहर में था।

करता था वो उसकी हर बातों पर यकीं,
न जाने वो किस वहम में था,
कहने को तो छोड़ दिया था उसने भी उसे,
पर वो चेहरा आज भी उसके ज़हन में था।

खो गया था बिखेरकर खुशबू दिशाओं में सभी,
वो गुलाब जो कभी उसके चमन में था,
वो सोया ऐसे कि फिर सहर न हुई,
जिस्म लिपटा हुआ सफेद क़फन में था।

वो बिना मंजिल के सफर पे था
वो नाकाम होकर भी किसी की नज़र में था…

नसीब

नसीब पासा फेंकने की तरह है और आप इसकी सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। यदि सब कुछ आपकी इच्छा के अनुसार घटित होता है तो अच्छा है और यदि ऐसा नहीं होता है तो फिर अपने कौशल में सुधार करने के लिए काम करना जारी रखिये।

नसीब ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप नियंत्रित कर सकते हैं, जबकि कड़ी मेहनत आपके हाथ में है जो आपके चांसेज को बेहतर बनाती है। आप जिसे नियंत्रित नहीं कर सकते हैं उसके बजाय जो आपके नियंत्रण में है उस पर अपने ध्यान को केंद्रित करना हमेशा बेहतर होता है।

लोग आपसे अधिक प्रतिभाशाली हो सकते हैं लेकिन कड़ी मेहनत ज्यादा या कम करने का किसी के पास कोई बहाना नहीं होता है, जीवन में कड़ी मेहनत करने का अवसर सबके पास समान होता है।

जीवन की दो चाबियाँ कड़ी मेहनत और किस्मत हैं। जब ये दोनों चाबियाँ एक साथ काम करती हैं, तो आपके जीवन का ताला खुल जाता है।

कड़ी मेहनत सीढ़ियों की तरह है और किस्मत लिफ्ट की तरह है, कभी-कभी लिफ्ट फेल हो सकती है लेकिन सीढ़ियांं हमेशा आपको ऊपर की तरफ ले जाएंगी।

आपको अपनी कड़ी मेहनत का परिणाम हो सकता है तुरंत या फिर निकट भविष्य में ना मिले, लेकिन अंततः इसका परिणाम मिलकर रहेगा क्योंकि मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती है।

कभी-कभी आप अपनी कड़ी मेहनत को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते हैं और लोग इस गलतफहमी में उसे आपका नसीब समझ लेते हैं।

सुना है वो हमको भुलाने लगे हैं….

सुना है वो हमको भुलाने लगे हैं,
जिनको पाने में हमको ज़माने लगे हैं,
वो उलझी सी बातें,वो धुंधले से चेहरे,
सपनों में फिर से आने-जाने लगे हैं।

पकड़कर उंगली जिन्हें चलना सिखाया,
वो रिश्ते ही हमें आज आजमाने लगे हैं,
छोड़ आए थे जिनको हम मंजिल के खातिर,
वो रास्ते फिर से हमें बुलाने लगे हैं।

थक गए थे हम बातों में मिलावट से लेकिन,
वो फिर से हमें मनाने लगे हैं,
पास से न सही, दूर से ही सही,
वो हमें देखकर मुस्कुराने लगे हैं।

क्या बात है, क्यों बदली सी फिज़ा है?
वो नज़रों से नज़रें मिलाने लगे हैं,
जो न सीखे थे जिंदगी में झुकना कभी,
वो सजदे पर सिर झुकाने लगे हैं।

जिन्हें फिक्र थी कल की…

जिन्हें फिक्र थी कल की वो रोए रात भर,

जिन्हें यकीन था खुदा पर वो सोए रात भर।

हालात ने जैसे चाहा वैसे हम ढल गए,

बहुत संभल कर चले थे लेकिन पैर फिसल गए।

चलते रहे जिंदगी की राहों पर बहते पानी की तरह,

जीवन में लोग आते- जाते रहे सफर के मुसाफिर की तरह।

जो न कहना था लबों को वो नज़रों ने कह दिया,

करवां गुजर चुका था अकेला मैं रह गया।

जब चले सच की राह पर तो उसूल कुछ तोड़ने पड़े,

जहां पर मेरी गलती न थी वहां भी हाथ मुझे जोड़ने पड़े।

सजदे पर झुकने की वजह भी क्या कमाल होती है?

झुकता है सिर जमीन पर, दुआ कुबूल आसमान में होती है।

मन

दुनिया में दिखाई देने वाली हर चीज़, हर वस्तु के तीन आयाम होते हैं। यह तीन आयाम हैं – लंबाई, चौड़ाई और गहराई। हमारा मन भी त्रिआयामी है। हमारे मन के तीन आयाम चेतन, अचेतन और अतिचेतन हैं। मन की संरचना भी किसी भौतिक पदार्थ की भांति ही है बस फर्क इतना है कि मन सूक्ष्म होता है इसलिए दिखाई नहीं देता है जबकि भौतिक पदार्थ स्थूल होते हैं इसलिए दिखाई पड़ते हैं।

हमारा सामान्य जीवन क्रम मन की चेतन अवस्था से संबंधित होता है। हमारी दिनचर्या से जुड़े सभी कार्य चेतन मन से संचालित होते हैं। हमारी नींद व सपनों का संबंध अचेतन मन से है जब हम सो जाते हैं तब हमारा अचेतन मन जाग्रत रहता है। मन का अतिचेतन स्तर अत्यधिक सूक्ष्म है जिसका संबंध ध्यान, आंनद और निस्वार्थ भावना से होता है।

मन की संरचना काफी हद तक समुद्र में डूबी हुई विशालकाय बर्फ की चट्टान के जैसी होती है जिसका कुछ हिस्सा सतह के ऊपर होता है जिसे हम देख पाते हैं हालांकि यह संपूर्ण चट्टान का बहुत छोटा हिस्सा होता है इसे हम चेतन मन कह सकते हैं।

बर्फीली चट्टान का शेष भाग पानी में डूबा रहता है। इसे हम तब तक नहीं देख पाते हैं जब तक हम स्वयं गहराई में न जाएं। चट्टान के इस हिस्से की तुलना अचेतन मन से की जा सकती है। कठिन होता है अचेतन तक पहुंच पाना।

इन दो हिस्सों के अतिरिक्त बर्फीली चट्टान का एक हिस्सा वाष्प बन जाता है और आकाश में छोटे-छोटे बादल बनकर मंडराने लगता है। यही अतिचेतन मन है। उस बादल तक पहुंच पाना करीब – करीब असंभव है यही कारण है कि ध्यान कठिन है और समाधि दुसाध्य है।

जागरण व चिंतन की घटनाएं चेतन मन में सम्पन्न होती रहती हैं। जब हम गहरी नींद में होते हैं और चेतन मन शांत होता है जाता है तब अचेतन मन क्रियाशील होता है। जब अचेतन मन भी शून्य हो जाता है तब अतिचेतन में प्रवेश मिलता है हालांकि यह अवस्था बिरलों को ही प्राप्त हो पाती है।

मुश्किल सबक

1- दूसरों के सामने खुद को लाचार और बेबस मत दिखाइये , लोग इसका फायदा उठाने की कोशिश करेंगे।

2- किसी रिश्ते में जो व्यक्ति कम परवाह करता है अक्सर उसका पक्ष ज्यादा मजबूत होता है और वह हर्ट भी कम होता है।

3- इस दुनिया में पैसा बोलता है। पैसे के बिना, आप कुछ भी नहीं हैं।

४- आपके बारे में लोगों की धारणा वास्तविकता से भी अधिक महत्वपूर्ण है, अक्सर हम तथ्यों को नजरंदाज करते हैं और धारणा के आधार पर किसी को दोषी या निर्दोष मान लेते हैं।

5- हम उन लोगों को महत्व देते हैं जो यह नहीं सोचते हैं कि हम महत्वपूर्ण हैं और जो हमें महत्वपूर्ण मानते हैं, उन्हें हम स्वीकार नहीं करते हैं।

6- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके ग्रेड कितने अच्छे हैं, ग्रेड आपको केवल आधी दूरी तक ले जाते हैं,लोग आपके सामाजिक कौशल पर अधिक ध्यान देते हैं।

7- हर किसी को खुश करना असंभव है। हमेशा कोई न कोई होगा जो आपसे असहमत है।

8- आप जितना अधिक बाहर की दुनिया में खुशी पाना चाहेंगे , उतना ही अधिक आप असफल होंगे।

9- हम में से बहुत लोग अतीत या भविष्य में जीते हैं। वर्तमान बहुतों के लिए अज्ञात है।

10- आपके जीवन में सभी की एक भूमिका है और जब उनकी भूमिका समाप्त हो जाएगी, तो वे आपको छोड़ देंगे।

11- यदि आप अपने भीतर की आवाज को नहीं सुनते हैं, तो संभावना अधिक है कि आपको बाद में पछताना होगा।

उम्मीदें

समीर एक कंपनी के सेल्स विभाग में कार्यरत है। उसके ऊपर टार्गेट अचीव करने का दबाव है। ऐसा भी नहीं है कि टार्गेट पहली बार मिले हों, उसने पहले भी टार्गेट पूरे किये हैं और उच्च अधिकारियों से प्रशंसा भी प्राप्त की है। पर इस बार बात कुछ अलग है, उसे लग रहा है कि वो इस बार टार्गेट अचीव नहीं कर पाएगा, उसका मन काम में नहीं लग रहा है। वह खोया खोया सा रहने लगा है, वह एक अज्ञात से भय से भयभीत है। निश्चित रूप से समीर के जीवन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

वैशाली उसी कंपनी के अकाउंट्स सेक्शन में कार्यरत है। वह हमेशा ऊर्जा और उत्साह से भरपूर रहती है,वह दिये गये काम को अक्सर डेडलाइन से पूर्व ही कम्प्लीट कर लेती है। वह भविष्य को लेकर पूरी तरह आशान्वित है। उसका आत्मविश्वास उसके चेहरे पर दिखता है, वैशाली अपने जीवन से खुश और संतुष्ट है।

एक सी परिस्थितियां, एक सा माहौल, एक से अवसर, एक सा वर्क-कलचर किसी को प्रेरित करता है तो किसी को निराशा से भर देता है। किसी में उम्मीद जगाता है तो कोई उसी माहौल में नाउम्मीद हो जाता है। समीर और वैशाली दोनों की शिक्षा का स्तर, संख्यातमक, तार्किक और कम्यूनिकेशन स्किल्स एक से हैं फिर भी एक जीवन से खुश और दूसरा निराश है।

समीर की यह स्थिति उसके लिए खतरनाक है, ज्यादा समय तक वह काम को टाल नहीं सकता है। टार्गेट अचीव न करने की स्थिति में उसकी नौकरी संकट में पड़ सकती है वहीं दूसरी तरफ इस बात की पूरी संभावना है कि वैशाली को इस बार के अप्रेजल में प्रमोशन मिलेगा,वैशाली के काम से उच्च अधिकारी संतुष्ट हैं।

समीर की हताशा और वैशाली के उत्साह के पीछे अनेकों कारण हो सकते हैं जिनकी तुलना नहीं की जा सकती है फिर भी एक बड़ी वजह नजरिये की है। किन्हीं कारणों और परिस्थितियों के कारण समीर का नजरिया नकारात्मक हो गया है और इसका उसके आत्मविश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। उसे अपनी समस्याएं पहाड़ जैसी नजर आ रही हैं, उसका सारा ध्यान समस्याओं का सामना करने में नहीं बल्कि उनको टालने में लगा हुआ है, निश्चित रूप से समीर का यह नजरिया उसे ज्यादा दिन तक बचा नहीं पाएगा।

समीर को इस स्थिति से बाहर कौन निकाल सकता है? निश्चित रूप से उसे अपनी सहायता स्वयं करनी पड़ेगी। उसे अपना खोया हुआ आत्मविश्वास पाने में अपने करीबी लोगों की भी आवश्यकता पड़ेगी, वह यह कैसे कर सकता है? इसका सबसे बेहतर तरीका है अपने बेसिक्स की तरफ वापस लौटना, अपनी ताकत को पहचानना, जो आपके करीब हैं उनसे अपनी बात शेयर करना और उनका समर्थन हासिल करना।

समीर की तरह हम सभी की जिंदगी में भी ऐसी परिस्थितियां आती रहती हैं जब हम जिदंगी में बहुत निराश हो जाते हैं। तब भी कुछ ऐसा है जो हमें प्रेरित कर सकता है। उस कठिन समय में आवश्यकता होती है खुद को पहचानने की, अपनी ताकत को बटोरने की,उस समय आवश्यकता होती है जिजीविषा की, जीवटता की और जिन्दगी को जीने की। जब भी आपके सामने ऐसा वक्त आ जाए तो खुद को यह याद दिलाते रहिये कि- जब सब कुछ समाप्त हो जाता है फिर भी एक चीज बची रहती है उसे भविष्य कहते हैं। आपका भविष्य आपके हाथ में है उसे कोई नहीं छीन सकता है. यही मोटिवेशन का मूल आधार  है।


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शब्दों के घाव

आज के युग मे इंसान को क्रोध बहुत जल्दी आता है, गुस्सा एक तरह का मनोविकर है जिसका मुख्य कारण तनाव पूर्ण जीवनशैली है, क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो सबसे पहले खुद को जलती है कहते है क्रोध करने वाले इंसान को उसका क्रोध स्वय सज़ा देता है।

आज बहुत दिनो की बारिश के बाद आज मौसम साफ हुआ था पर समीर अपने कमरे मे उदास बैठा था उसकी आज ऑफीस मे फिर से किसी से किसी बात पर बहस हुई थी उसका मन गुस्से से भरा हुआ था, यू तो समीर एक होशियार और मेहनती कर्मचारी था पर उसके भीतर एक ही कमी थी कि उसे क्रोध बहुत जल्दी आता था।

छोटी छोटी बातों में अपना टेम्पर लूज कर देना समीर का स्वभाव बन गया था, अपनी इस आदत से स्वयं समीर भी परेशान था और इस आदत से छुटकारा पाना चाहता था पर यह सब इतनी तेजी से होता था कि वो कुछ भी सोच समझ नहीं पाता था उसने बहुत कुछ सीखा था पर क्रोध पर नियंत्रण करना वो नहीं सीख पाया था।

बहुत प्रयास करने के बाद भी जब उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तो उसने अपने मित्र अनुराग से मदद माँगी, अनुराग समीर को लेकर मठ मे अपने गुरुजी के पास गया समीर ने गुरुजी से अपनी समस्या बतायी और सहयता करने की अपील की।

समीर की बात सुन कर गुरुजी मुस्कुराने लगे उन्होने समीर को कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना।

पहले दिन समीर ने छोटी छोटी बातों में दिनभर में बीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया और फिर एक दिन ऐसा आया समीर ने पूरे दिन में एक बार भी अपना टेम्पर लूज नहीं किया।

जब उसने अपने मित्र अनुराग को ये बात बताई तो वह उसे लेकर फिर आश्रम गया जहा समीर की बात सुनकर गुरुजी ने कहा आज से, अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो उस दिन इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना।

समीर ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब समीर ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने मित्र अनुराग को ख़ुशी से ये बात बतायी।

कुछ दिनों बाद गुरुजी अनुराग के साथ समीर के घर आये और उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो। अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था,जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं।

गुरुजी के जाने के बाद समीर फिर से बाड़े के पास गया और बाड़े में हुए छेदों पर हाथ फेरने लगा उसे यह महसूस हो रहा था कि मानों ये बाड़े के छेद न होकर लोगों के ह्दय थे जिन्हें उसने अपनी बातों से छलनी कर दिया था। उसकी आखों मे आसू आ गये थे .समीर ने मन ही मन गुरुजी को धन्यवाद दिया और निश्चय किया कि वो अब क्रोध करके इस बाड़े में और कील नहीं ठोकेंगा।

इसलिए अगली बार आप भी अपना टेम्पर लूज करने से पहले ज़रूर सोचियेगा कि क्या आप भी उस बाड़े में और कीलें ठोकना चाहते हैं ?