आदतें ही हमें बनाती और मिटाती हैं

समीर की सुबह कभी शांत नहीं होती है वह हड़बड़ी में उठता है और आफिस के लिए कभी समय पर तैयार नहीं हो पाता है। आफिस का समय हो जाने पर भी वह कभी कपड़े पहन रहा होता है, तो कभी बैग या जूते ढूढ रहा होता है। इस वजह से वह नाश्ता भी नहीं कर पाता है। इन सबका असर उसके काम पर भी पड़ता है आफिस देर से पहुंचने के कारण अक्सर उसे बास की नाराजगी का सामना करना पड़ता है और सुबह का नाश्ता नहीं करने के कारण दिन भर उसका एनर्जी लेवल कम बना रहता है।

देर रात तक जागना और सुबह देर तक सोना समीर की आदत में शुमार है और उसकी यही आदत उसकी शारीरिक और मानसिक तनाव की वजह भी है। समीर की भांति लगभग सभी घरों में सुबह एेसी ही होती है जिसका मुख्य कारण दिनचर्या का सही निर्धारण नहीं होना है। हममें से ज्यादातर लोगों को यह पता नहीं होता है कि दिनचर्या का सही निर्धारण कैसे करना चाहिए।

हमारे जीवन में अनेक समस्याएं दिनचर्या के गलत निर्धारण के कारण होती हैं, सही दिनचर्या हमें न केवल अनेक परेशानियों से बचाती है बल्कि हमें शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रखने में भी मदद करती है। हममें से कुछ लोग दूसरों को देखकर अपनी दिनचर्या बनाते हैं, एेसे में महत्वपूर्ण है कि दूसरे लोगों की सभी आदतों को फालो करने की जगह आप उनकी केवल उन्हीं आदतों को अपनाएं जो आपको जीवन में आगे बढ़ाने में सहायक हों, दूसरो को देखकर अपनी दिनचर्या बनाने में सावधानी बरतना भी आवश्यक है क्योंकि उनकी गैरजरूरी आदतें आपको व्यर्थ में थकती हैं और आपको पीछे ले जाने का काम करती हैं।

हमारे लिए यह समझना भी आवश्यक है कि अपने कार्यों को समय से पूरा करना हमारी खुद की जिम्मेदारी है इसके लिए दूसरों को दोषी ठहराना उचित नहीं है। दूसरे हमें हमारे कार्यों को समय से पूरा करने में हमारी मदद जरूर कर सकते हैं पर काम को समय से पूरा करने की आदत हमें स्वयं ही विकसित करनी होगी और इसके लिए हमें स्वयं ही प्रयास करना होगा।

हम आज जो भी हैं अपनी आदतों की वजह से हैं। आदतें ही वो हैं जो हमें बनाती हैं और मिटाती हैं। वक्त के साथ आदतें भी बदलती रहती हैं नई आती हैं और पुरानी जाती हैं। सुबह समय से जागना,आफिस के लिए समय से तैयार हो जाना, सुबह का नाश्ता अनिवार्य रूप से करना आदि एेसी छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें हम अपनी आदत में शुमार करके अनेक समस्याओं को कम कर सकते हैं। इन आदतों को अपनी दिनचर्या में शामिल करके हम काम को समय से पूरा कर सकते हैं और भविष्य में आने वाली चुनौतियों का सामना बेहतर ढंग से कर सकते हैं।

सफल होने से पहले असफल होना क्यों जरूरी है?

1- असफलता इस बात का सबूत हैं कि किसी ने सफल होने के लिए कम से कम कोशिश तो की, इसलिए हमें अपनी असफलताओं पर शर्मिन्दा होने के बजाय उसे कोशिश के प्रमाण के रुप में देखना चाहिए।

2- असफलता हजार सबक सिखाती है जो कोई पुस्तक नहीं सिखा सकती है। ये सबक सीखकर आप उन्हें जीवन में बाद में लागू कर सकते हैं।

3- विफलताएं यह महसूस करने में मदद करती हैं कि आपके लिए क्या सही है और क्या गलत , यह निर्णय लेने में सहायता प्रदान करती हैं।

4- खुद को अंहकार से बचाने एवं जमीनी हकीकत से जोड़े रखने के लिए सफलता से पहले विफलता मिलना आवश्यक है।

5- असफलता आपको सफलता के साथ सामंजस्य बैठाने में मदद करती है और सफलता को सिर पर चढ़ने नहीं देती है।

6- ज्ञान और परिपक्वता प्राप्त करने के लिए असफलता आवश्यक है।

7- नकली चेहरे की पहचान करने और सच्चे साथी की पहचान करने में विफलताएं मदद करती हैं।

8- विफलताएं आप के अंदर के योद्धा को सक्रिय रखतीं हैं, जिससे आप प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ना सीखते हैं।

9- विफलताएं एक मसालेदार व्यंजन की तरह हैं जो सफलता को और मीठा बना देतीं हैं।

10- आशाओं को मत खोइये और असफलताओं के लिए अपने भाग्य को शाप मत दीजिए, उनका सम्मान करिये और जीवन में आगे बढ़ना सीखिये।

हमेशा यह बात याद रखिये कि असफलताएं आपकी जड़ों को जमीन के अंदर गहराई तक मजबूत कर रही हैं।

कुछ बातें जो तुम्हे सीखनी होगीं

मेरा एक मित्र है. वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत है. कुछ समय पहले वह कंपनी के मुख्यालय में एक सेमिनार में हिस्सा लेने गया हुआ था. सेमिनार का विषय Ethical Practices in your Work Life था. सेमिनार में बताया गया था कि हमें कैसे अपने कार्यों को ईमानदारी से करना चाहिए, सफलता के लिए शार्टकट से बचना चाहिए और लालच में न पड़ कर सही रास्ते पर चलना चाहिए. निश्चित रूप से सेमिनार में बतायी गयी बातें बेहद प्रेरक थीं.

सेमिनार से लौटने के कुछ दिनों बाद उसे अपने जूनियर के साथ देश के एक पिछड़े हुए जिले के रूरल मार्केट में जाना था और कंपनी को मार्केट में संभावनाओं की रिपोर्ट देनी थी. मार्केट में घूमते हुए वो एक दुकान पर गया वहां उसने देखा दुकान की सेल्फ पर उसकी कंपनी के कुछ प्रॉडक्ट रखे हुए हैं जिनके उपयोग की समय सीमा या expiry date काफी समय पहले बीत चुकी है. उसने दुकानदार से कहा एेसे प्रोडक्ट जिनके उपयोग की तिथि समाप्त हो गई हो को बेचना लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने जैसा है. उसे उन प्रोडक्ट को तुरंत हटाकर कंपनी को वापस भेज देना चाहिए.

दुकानदार उसे आश्चर्य के साथ देखने लगा. उसने कहा साहब यह रूरल मार्केट है, यहां सब कुछ बिकता है जो माल शहरों में नहीं बिक पाता उन्हें कंपनी यहां बिकने के लिए भेज देती हैं. यहां लोगों को यह तक नहीं पता कि उत्पादों की expiry date भी होती है. यहां माल अपकी कंपनी द्वारा आथराइजड एजेंसी से सप्लाई किया जाता है. पुराने माल को खपाने के लिए कंपनी हमें extra Scheme देती है. शुरूआत में एक बार पुराना माल वापस किया था उसका क्लेम आज तक नहीं मिल पाया है. आपके पहले जो साहब आते थे वो हमेशा sales बढाने को कहा करते थे.

अब आश्चर्यचकित होने की बारी मेरे मित्र की थी. वह बिना कुछ कहे वापस लौट आया. उसने अपनी रिपोर्ट बनाई और मैनेजमेंट को सब कुछ लिख कर भेज दिया. उसे उम्मीद थी कंपनी इस गलत काम के खिलाफ कार्रवाई करेगी और कठोर एक्शन लेगी. कुछ दिनों के पश्चात उसे अपनी कंपनी की तरफ से मेल आया. उसमें लिखा था कि कंपनी को emotional नहीं practical लोगों की आवश्यकता है. कंपनी को उसकी सेवाओं की अब जरूरत नहीं है. उसकी नौकरी जा चुकी थी.

कुछ समय बाद मेरा वही मित्र अपने बेटे के स्कूल में पैरंट्स – टीचर मीटिंग में गया था. वहां टीचर ने उससे कहा था कि उसका बेटा स्कूल में झूठ बोलता है, वह दूसरे बच्चों की चीजें छीन लेता है और समझाने पर बहाने बनाता है और खुद को सही ठहराने की कोशिश करता है. टीचर कह रही थी कि उसके बेटे में moral values की कमी है. बच्चे मां – बाप से सीखते हैं. उसे घर पर बच्चे को ईमानदारी, सच्चाई और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता के बारे में सिखाना चाहिए. मेरा मित्र बिना कुछ कहे वहां से चला आया उसकी आँखों में आँसू थे.

कुछ दिन पहले मुझसे मिलने आया था.तभी उसने मुझसे अपने दोनों अनुभव साझा किये थे. वह बहुत परेशान लग रहा था. उसने मुझसे कहा था कि यार दुनिया में बहुत असमानता है, हर तरफ अनीति है, अन्याय है. वह कह रहा था हर जगह सत्य उपेक्षित है, आज की दुनिया में सही रास्ते पर चलने का धैर्य किसी में नहीं हर कोई झूठ का शार्टकट लेकर मंजिल पर पहुंचना चाहता है.

हम जिस तरह के माहौल में जी रहे हैं वो झूठ का है, छल और कपट का है. हम जैसे माहौल में रहते हैं वैसे ही हमारे विचार हमारी सोच बन जाती है. मै उसकी बातों से सहमत था वह जो कह रहा था वही दुनिया की हकीकत है. फिर उसने जो मुझसे कहा वो बड़ा महत्वपूर्ण था उसने कहा कि यार जो मैं नहीं हूँ अपने बेटे को वैसा बनने के लिए कैसे कहूं? जिन रास्तों को मैं छोड़ आया हूँ उन रास्तों को पर अपने बेटे को चलने के लिए कैसे कहूं? मैं उसे कैसे समझाऊँ कि सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता है? वो मेरी तरफ देख रहा था उसकी आँखों में आँसू थे.

मैं निरउत्तर था. मेरा मित्र परेशान था. वह एक तरह के ethical dilemma में था. वह अपने बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित था. काफी सोच विचार करने पर भी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. जब काफी समय बीत गया और बुद्धि कोई निर्णय नहीं कर पाई तो मैंने उससे से कहा कि तुम वही करो जो तुम्हे पहले से पता है, तुम अपने बेटे को वही बताओ जिसका तुम अनुभव कर चुके हो.. तुम उसे बता दो कि यह दुनिया कठोर है और बुरे लोगों से भरी पड़ी है, उसे बता दो यहां हर कदम पर अन्याय है और असमानता है, उसे बताओ कि सत्य यहां परेशान होता है.

मैने आगे कहा  पर मैं चाहता हूं कि तुम साथ में उसे यह भी बताअो कि हर बुरे इंसान के पास भी अच्छा ह्रदय हो सकता है, उसे बताओ कि हर स्वार्थी नेता में एक अच्छा लीडर बनने की संभावना छिपी होती है, उसे बताओ कि मेहनत से मिलने वाला एक रूपया भी सड़क पर मिलने वाले पांच सौ के नोट से ज्यादा कीमती होता है. यह सब सिखने में उसे वक्त लगेगा पर उसे खुद पर विश्वास करना सिखाओ और दूसरों पर भरोसा करना भी क्योकि तभी वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा.. ये बातें बड़ी हैं और लम्बी भी पर उसे बता दो यह उसके लिए अच्छा होगा.. तुम्हारे जैसा मेरा भी एक बेटा है जो अभी बहुत छोटा है और प्यारा भी…

जीवन की रेस में फिनिशिंग लाइन नहीं होती

परिवर्तन जीवन का अनिवार्य हिस्सा है. यह अनवरत जारी रहने वाली प्रक्रिया है. परिवर्तन हमारे चाहने या न चाहने पर निर्भर नहीं होता ये तो बस होता रहता है। परिवर्तन मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं macro और micro जो परिवर्तन हमे और दूसरों को होते हुए दिखाई देते हैं जैसे उम्र के साथ होने वाले परिवर्तन, रहन सहन में होने वाले परिवर्तन, वेशभूषा में और खानपान में होने वाले परिवर्तन आदि को macro changes कहा जाता है वहीं जो परिवर्तन सूक्ष्म होते हैं जैसे विचारों में होने वाले परिवर्तन, व्यवहार में होने वाले परिवर्तन आदि को micro changes कहा जाता है। हम अक्सर macro changes को तो नोटिस करते हैं पर micro changes को नोटिस नहीं कर पाते हैं। जो सूक्ष्म है उसे देख पाना आसान नहीं होता है.

जीवन में होने वाले परिवर्तन सकारात्मक भी होते हैं और नकारात्मक भी जो परिवर्तन जीवन में अनुकूल परिस्थितियां लाते हैं उन्हें सकारात्मक और जो परिवर्तन प्रतिकूल परिस्थितियां लाते हैं उन्हें नकारात्मक परिवर्तन कहते हैं। हममे से ज्यादातर लोग परिवर्तन पसंद नहीं करते और इसके लिए तैयार भी नहीं होते हैं क्योंकि हमें हमेशा एक अज्ञात का डर होता है जिसे fear of unknown कहते हैं. कम ही लोग होते हैं जो इस डर को जीत पाते हैं जो इस डर के आगे बढ़ पाते हैं उन्हें परिवर्तन पसन्द होता है और एेसे लोग देश और दुनिया में परिवर्तन लाते हैं इन्हें change agents कहते हैं. परिवर्तन लाने में हमेशा विरोध का सामना करना पड़ता है कभी यह विरोध खुद के भीतर से तो कभी बाहर से होता है.

जीवन में होने वाले बड़े परिवर्तन अकस्मात होते हैं जिसके लिए हम तैयार नहीं होते हैं और जब ये परिवर्तन होते हैं तो अक्सर जीवन बदल जाता हैं। परिवर्तन में अवसर भी होता है और भय भी होता है जो इसमें अवसर देखते हैं वो आगे बढ़ जाते हैं और जो परिवर्तन से भयभीत हो जाता है वो वहीं रह जाता है जहां वो पहले था.

विकास या development भी एक तरह का परिवर्तन ही होता है जिसे सकारात्मक या positive development कहा जा सकता है और जब यह परिवर्तन सतत या continuous होता है तो इसे ही समावेशी विकास या sustainable development कहते हैं।  क्या कोई भी development सम्पूर्ण या 100% हो सकता है?

एक मशहूर एयरवेज का sustainable process development प्रोग्राम की accuracy 99.96% पहुंच चुकी है जिसका मतलब यह हुआ हर 10000 उड़ान में से 4 उड़ान के दुर्घटनाग्रस्त होने की संभावना होती है। सोचिए हर बार जब उड़ान भरी जाती है तब कितने इन्सानों की जिंदगी दावं पर लगी होती है। पर यह संभावना कभी भी 100% नहीं हो सकती क्योंकि हर साल इसमें नये कारक या variables जुड़ जाते हैं जो पुराने कारकों से पूरी तरह भिन्न होते हैं। यह लगातार दौड़ी जाने वाली ऐसी रेस है जिसकी कोई फिनिशिंग लाइन नहीं होती है। इसका मतलब यह भी है कि जीवन में कोई भी परिवर्तन स्थायी या पूर्ण नहीं होता यह लगातार चलने वाली अंतहीन प्रक्रिया है जिसका कोई अंत नहीं है। Management की भाषा में इसे ही TQM या Total Quality Management कहते हैं।

मन के हारे हार है मन के जीते जीत

हौसला या हिम्मत एक सिक्के के दो पहलू हैं। मोटिवेशन की सारी थ्योरी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती हैं। ये इन्सान की वो फितरत है जो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाने का माद्दा रखती है। जो भी उठा है इसी के बूते उठा है और जो नहीं उठ सका उसमें शायद इसकी कमी थी।

कुछ लोग खुद हौसला रखते हैं पर दूसरों को नहीं दे पाते वहीं कुछ लोग दूसरों को हौसला देते हैं पर खुद नहीं रख पाते। पहले को रिजर्व और दूसरे को सोशल कह सकते हैं। दोनों में बेहतर कौन है ये बिहेवियर सांइस के शोध का विषय है। कहते हैं सकारात्मक सोच हौसला या हिम्मत जुटाने का सबसे अच्छा श्रोत है।

सोच हमें अपने चारों तरफ के वातावरण से मिलती है पर यह भीतर से भी आती है चूंकि भीतर का बाहर और बाहर का भीतर प्रभाव पड़ता है इसलिए हमारी सोच भी सकारात्मक से नकारात्मक और नकारात्मक से सकारात्मक होती रहती है।

सामान्य स्थिति में बाहर का भीतर पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है ईसीलिए हमारा खुशियां हमारी सोच अक्सर दूसरों की मेहरबानी पर निर्भर करती है। जब हम किसी की मेहरबानी पर जीते हैं तो हम में हिम्मत या हौसला नहीं होता और जो होता है उसे डर कहते हैं भला डर के सहारे कभी कोई ऊंचा उठ सकता है? बुद्ध ने इसे समझा था और कहा था ” अपो दीपो भव:” अपने दीपक आप बनें। इसे आत्मसात करिये और खुद के बनाए डर से ऊपर उठिये ।

सपने देखने का अधिकार सबको है। सपने जिदंगी में उतने ही जरूरी हैं जितनी खीर में चीनी शायद सपने ही हैं जो पूरे हो या न हों पर दिल के हमेशा करीब होते हैं।

 हकीकत अक्सर निर्मम हुआ करती है ।हर सपने हर ख्वाब को कड़ी कसौटी पर आजमाती है और जो उस पर खरा नहीं उतरता उसे बिखरने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। पर सपने टूटने का मतलब ये नहीं कि वो बेकार थे दरअसल इस दुनिया के कुछ उसूल हैं और अपने सपने को जीने के लिए उन शर्तों को पूरा करना पड़ता है।

सफल होने और हार जाने में महज इतना फर्क है कि आप अपनी शर्तों पे जिए। सही या गलत कुछ नहीं है बस नजरिए का फर्क है। इतिहास गवाह है कि जो चीजों और घटनाओं को लेकर उदार रहा और जिसने दिल और दिमाग के दरवाजे खुले रखे सपने पूरे उसी के हुए। इसलिए खुद को उदार बनाइए और चीजों को आत्मसात करना सीखिए क्या पता किसी मोड़ पर इतिहास आप के इंतजार में हो।

मेहनत बड़ी है या भाग्य

google image

दादाजी क्या मैं बड़ा होकर कलेक्टर बन पाऊंगा? दस वर्ष के प्रखर ने अपने दादाजी से यही प्रश्न पूछा था। प्रखर के दादाजी उच्च शिक्षित एक बेहद सुलझे हुए और मिलनसार व्यक्ति थे। वे भारतीय विदेश सेवा से कुछ समय पहले ही रिटायर हुए थे। प्रखर और उसकी छोटी बहन ऊर्जा को अपने दादाजी से विशेष लगाव था। वो दोनों छुट्टी के दिनों में दिन भर दादाजी के आसपास मंडराते रहते थे। दादाजी भी बच्चों से बेहद स्नेह करते थे और खेल-खेल में उन्हें मानवीय मूल्यों की शिक्षा दिया करते थे।

प्रखर के इस प्रश्न को सुनकर दादाजी के चेहरे पर मुस्कान आ गयी उन्होंने मुस्काते हुए पूछा कि प्रखर पहले यह बताओ कि तुम कलेक्टर क्यों बनाना चाहते हो? प्रखर ने कुछ सोचने के बाद उत्तर दिया कि दादाजी स्कूल में मेरे दोस्तों ने बताया है कि कलेक्टर बहुत बडा़ आदमी होता है, उसके पास बड़ी गाड़ी और घर होता है, मेरे दोस्तों ने बताया है कि उससे सभी लोग डरते हैं, दादाजी इसीलिए मैं कलेक्टर बनना चाहता हूं।

प्रखर के उत्तर से दादाजी को आश्चर्य नहीं हुआ। उन्हें प्रखर के बाल मन से उसी प्रकार के उत्तर की उम्मीद थी। उन्होंने कहा “बेटा यदि तुम सही दिशा में प्रयास करोगे, पूरे मनोयोग से परिश्रम करोगे और तुम्हारे भाग्य में होगा तो तुम अवश्य कलेक्टर बन जाओगे।” दादाजी के कहे शब्दों को प्रखर ध्यान से सुन रहा था। उसने बालसुलभ जिज्ञासा के साथ पूछा दादाजी भाग्य किसे कहते हैं?

यह प्रश्न सुनकर दादाजी कुछ गंभीर हो गए कुछ देर शांत रहने के बाद वो प्रखर को समझाते हुए बोले कि बेटा भाग्य यानी किये जा चुके कर्मों का संचय,बीते हुए कल में हमारे द्वारा किये गये कर्मों का फल ही भाग्य का निर्माण करता है। जब तुम बड़े हो जाओगे तो तुम्हें समझ में आने लगेगा कि जीवन में सब कुछ हमारे हाथ में नहीं होता है। हमारे हाथ में तो बस प्रयास करना या मेहनत करना होता है। कर्मों का फल हमारे हाथ में नहीं होता है।

हमारे प्रयासों के फल हमारे भाग्य के अनुरूप होते हैं। जीवन में कभी कभी बहुत प्रयास करने के बाद भी वांछित सफलता नहीं मिल पाती है। हमारे भाग्य के अनुरूप ही बाहर की परिस्थितियां परिवर्तित होने लगती हैं इनका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है और हमारी किस्मत हमें वहां पहुंचा देती है जहां हमें पहुंचाना होता है। भाग्य प्रबल और शक्तिशाली होता है।

दादाजी की बातों का प्रखर पर असर पड़ा था। पर अभी उसकी बुद्धि इतनी परिपक्व नहीं हुई थी कि इन बातों को उसके सही अर्थ में आत्मसात कर सके । प्रखर सोचने लगा कि मनुष्य का भाग्य ही सबकुछ होता है हम कुछ करें या न करें हमारे भाग्य में जो होगा वह हमें अवश्य ही मिल जाएगा। प्रखर में आए इस परिवर्तन से सभी हैरान थे। बात जब दादाजी तक पहुंची तब उन्होंने प्रखर की छोटी बहन ऊर्जा को बुलाकर प्रखर के इस व्यवहार के बारे में पूछा, ऊर्जा ने बताया कि भैय्या कह रहे थे कि पढ़ाई में मेहनत करने से कोई फायदा नहीं है दादाजी ने बताया है कि जो हमारे भाग्य में होता है वह हमें अवश्य ही मिल जाता है।

ऊर्जा की बात सुनकर दादाजी की चिंता कम हो गयी वो समझ गए कि प्रखर में आए इस अचानक परिवर्तन का कारण क्या है। उन्होंने प्रखर को बुलाया और समझाते हुए कहा कि ” बेटा तुमने मेरी बातों का जो अर्थ समझा है वो अधूरा है। भाग्य प्रबल और शक्तिशाली अवश्य है पर बिना पुरूषार्थ के वह अधूरा है। भाग्य और पुरूषार्थ एक दूसरे के पूरक हैं। जहां पुरूषार्थ है भाग्य भी उसी के साथ है। बेटा इतिहास की किताबों से लेकर हमारे वर्तमान समय में अनेक एेसे उदाहरण मिल जाएगें जिन्होंने अपने भाग्य को प्रबल पुरूषार्थ से बदल दिया। बेटा पुरूषार्थ ही वह ईधन है जिसकी शक्ति से जीवन की गाड़ी दौड़ती है।”

दादाजी की बातों को सुनकर प्रखर के मन से संदेह दूर हो रहा था। उसके मन से संशय के बादल छंट रहे थे। दादाजी अपनी बात जारी रखते हुए बोले बेटा प्रखर जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है उन कर्मों पर ध्यान देना जो हमारे हाथ में हैं जिस चीज पर हमारा वश नहीं है उसके बारे में ज्यादा सोचना निरर्थक है। कर्म ही हमारे वश में हैं कर्मों के फल या भाग्य हमारे नियंत्रण से बाहर है इसलिए हमें ज्यादा सोचना छोड़कर बस कर्म करते रहना चाहिए। यही भगवान कृष्ण ने गीता में भी कहा है कि कर्म करते हुए फल की चिंता मत करो।

दादाजी के शब्दों ने प्रखर के मन को छुआ था। प्रखर ने कर्म के महत्व को समझा और वह पुनः मेहनत से पढ़ाई करने लगा प्रखर को मेहनत के रास्ते पर लौटता देख कर सभी खुश थे। दादाजी शांत बैठे प्रखर और ऊर्जा को खेलता हुए देख रहे थे वो जानते थे कि अब बच्चों का भविष्य उज्ज्वल है। आज एक बार फिर साबित हो गया था कि भाग्य और पुरूषार्थ के बीच श्रेष्ठता की कशमकश में पुरूषार्थ ही सर्वोपरि है।

विचार ही ताकत हैं

Google image

आज दुनिया जैसी भी दिखाई देती है वह पूर्व में हमारे मन में उठने वाले विचारों का परिणाम है। आज दुनिया में जितनी अच्छी चीजें, अविष्कार,प्रगति दिखाई देती है वह परिणाम है उन सकारात्मक विचारों का जिनका जन्म किसी मनुष्य के ह्रदय में हुआ था और दुनिया में जो भी नकारात्मकता है,सत्ता और शक्ति का दुरुपयोग है वह भी परिणाम है उन नकारात्मक विचारों का जिनका जन्म किसी मनुष्य के ह्रदय में हुआ होगा।

1- मनुष्य का जीवन घटनाओं का समूह है और ये घटनाएं हमारे विचारों का परिणाम हैं। विचार एक शक्ति है जिसका उपयोग करके हम जीवन में बहुत ऊंचा भी उठ सकते हैं और इस शक्ति का दुरुपयोग हमें पशुओं के स्तर से भी नीचे गिरा सकता है।

2- मन ही विचारों का उद्गम और अंत स्थल है, विचार मन से ही जन्म लेते हैं और मन में ही समाप्त हो जाते हैं। हमारे विचारों का हमारे जीवन की हर एक घटना पर प्रभाव पड़ता है।

3- विचार भी बच्चों की तरह होते हैं, वे भी अपना पराया, भला बुरा नहीं समझते हैं और बस कभी भी, कहीं भी, कहीं से भी हमारे पास चले आते हैं ।यदि हम आने वाले विचारों का स्वागत करते हैं, उन्हें अपनाने का प्रयास करते हैं तो वे पुष्ट होते हैं, बढते हैं, विकसित होकर हमारा पुनर्निर्माण करते हैं।

4- यदि विचारों को दुत्कार दिया जाए ,उन्हें बेइज्जत कर दिया जाए, उनकी परवाह न की जाए तो फिर एेसे विचार हमारे पास से चले जाते हैं। ये विचार मृतप्राय होकर हमारे मन की गहराइयों में दफन हो जाते हैं।

5- सभी विचार न तो हर एक के लिए अच्छे होते हैं और न ही बुरे, विचारों को चुनने के लिए मनुष्य स्वतंत्र है। जो विचार आपको अच्छा लगता हो, जिनसे अच्छी आदतें बनती हों, जो उत्तम स्वभाव का निर्माण करते हों एेसे विचार हमारे मित्र के समान हैं।

6- विचारों में बहुत शक्ति होती है,हम जैसा सोचते हैं वैसे ही बन जाते हैं।नकारात्मक विचार नकारात्मकता को और सकारात्मक विचार सकारात्मकता को आकर्षित करते हैं।

7- विचार वह शक्ति है जिसका उपयोग अच्छे और भलाई के कामों में भी किया जा सकता है और इस शक्ति को एेसे कामों में भी नष्ट किया जा सकता है जो मानवता को कलंकित करते हैं।

जिंदगी में कुछ चीजों को न कहना भी सीखिये

google image

1- उन लोगों को न कहना सीखिये जो हर वक्त आपका ध्यान चाहते हैं। एेसे लोग आपको अपनी तरफ आकर्षित करके आपको स्वयं से दूर कर देते हैं।

2- ऐसे कामों को न कहना सीखिये जिन्हें आप सिर्फ मजबूरी में करते हैं। लंबे अंतराल में ऐसे कार्य आपके लिए जितना आप सोचते हैं उससे कहीं अधिक नुकसानदेह साबित होते हैं।

3- ऐसे लोगों को न कहना सीखिये जो आपको अपने लिए बदलना चाहते हैं। जो लोग आपको आपके स्वाभाविक रूप में स्वीकार नहीं करते हैं वे आपके योग्य नहीं होते हैं।

4- ऐसी मानसिकता को न कहना सीखिये जो सभी को खुश करना चाहती है। आप एक समय में सभी को खुश नहीं कर सकते हैं।

5- क्रोध,ईर्ष्या आदि नकारात्मक मनोभावों को न कहना सीखिये जो आपकी मानसिक ऊर्जा को जोंक की तरह चूसकर आपको थका देते हैं।

6- उन अव्यावहारिक अपेक्षाओं को न कहना सीखिये जो आप दूसरों और खुद से रखते हैं। याद रखिए कि आपकी हर अपेक्षा पर न तो दूसरे और न ही आप खुद खरे उतर सकते हैं।

7- न कहना सीखिये उन चीजों और लोगों को जिन्हें आप कसकर पकड़ना चाहते हैं। जीवन का यह नियम है कि जिस चीज को आप जितना ज्यादा चाहते हैं वह आपसे उतनी ही जल्दी दूर हो जाती है।

8- लोगों को बदलने की कोशिश को न कहना सीखिये, आप सिर्फ एक ही इंसान को बदल सकते हैं जो आप स्वयं है।

9- न कहना सीखिये उस प्रवृत्ति को जो अपनी असफलताओं के लिए दूसरों को दोषी ठहराती है। बेहतर होगा कि आप अपने कामों की जिम्मेदारी स्वयं लेना सीखिये।

कुछ बातें जो जीवन में ज्यादा महत्व नहीं रखती हैं

google image

1- फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर लाइक्स की संख्या, आपके अधिकांश फालोअर्स लाइक बटन पर क्लिक इसलिए करते हैं क्योंकि जब वे सोशल मीडिया पर अपलोड करते हैं तो वह आपके द्वारा लाइक पाने की उम्मीद करते हैं। यह कड़वा है लेकिन सच है।

2- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप स्कूल की परीक्षा में शीर्ष पर हैं या विफल हैं। अंक वास्तव में आपके जीवन में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाते हैं। आत्म- विकास पर ध्यान केंद्रित करना कहीं ज्यादा बेहतर है। एेसे बहुत से उदाहरण हैं जिन्होने स्कूल में बहुत अच्छा नहीं किया पर जीवन में ऊंचा मुकाम हासिल किया।

3- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि जीवन में आपका कोई ब्वाय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड है या नहीं , ब्वाय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड का होना जीवन में अनिवार्य नहीं है। इनके बिना भी जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है।

4- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप लंबे या छोटे, मोटा या पतले, काले या गोरे हैं। आपके शरीर की आकृति आपकी आंतरिक सुंदरता को परिभाषित नहीं करती है।

5- ब्रेकअप का मतलब जीवन का अंत नहीं है। आगे बढ़ना सीखिये, आप हमेशा किसी बेहतर को पा सकते हैं।

6- आप लोगों को उनकी जाति और भाषा से जज नहीं कर सकते हैं। कोई भी इंसान जाति या भाषा के आधार पर श्रेष्ठ या निम्न नहीं होता है, इंसानों के साथ केवल इंसानियत का व्यवहार कीजिए।

7- इंटरव्यू में खारिज होना या कॉलेज प्लेसमेंट में सेलेक्ट नहीं होना जीवन का अंत नहीं है, हो सकता है कुछ बड़ा आपके लिए इंतजार कर रहा हो।

क्योंकि हर बार भूल सुधारने का मौका नहीं मिलता

google image

राधिका और सिद्धार्थ की मुलाकात एक सोशल नेटवर्किंग साइट पर हुई थी। समय के साथ उनकी दोस्ती गहरी हो गई थी। धीरे-धीरे उनकी दोस्ती मुलाकातों में और फिर मुलाकातें गहरे प्रेम में रूपांतरित हो गईं थीं। इस प्रेम की परीणिति शादी के रूप में हुई और दोनों विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए।

प्रेम उन्मुक्त होता है पर विवाह एक बंधन है, प्रेम सुखद कल्पना है तो विवाह यथार्थ का धरातल है। यथार्थ की जमीन कठोर होती है जहां कोरी भावुकता से काम नहीं चलता है। विवाह के रिश्ते से जुड़ी हुई कुछ मर्यादाएं और जिम्मेदारियां होती हैं जिसका पालन पति-पत्नी दोनों को करना पड़ता है। शुरुआत के कुछ वर्षों तक तो सिद्धार्थ और राधिका काफी हँसी मजाक और नोक झोंक किया करते थे। पर शादी के कुछ सालों बाद उनमें छोटी छोटी-छोटी सी बातों पर झगड़े होने लगे।

इस बेकार की लड़ाई में कोई भी झुकने को तैयार नहीं था उन दोनों का अहंकार हिमालय से भी ऊंचा था। समय पंख लगा कर उड़ रहा था अब उनके जीवन में एक नन्हीं सी परी मुस्कान भी आ गई थी जिसकी परवरिश की जिम्मेदारी उन पर थी। मुस्कान के आने के बाद राधिका का अधिकांश समय बेटी की देखभाल करने में बीतता था राधिका और सिध्दार्थ के बीच अब संवाद कम और खामोशी बढ़ गई थी। दोनों बिना कुछ कहे खामोशी से जिंदगी की गाड़ी को किसी तरह से खींच रहे थे।

जीवन में कुछ घटनाएं एेसी घटती हैं जो हमारे नजरिये को बदल कर रख देती हैं एेसा ही कुछ राधिका और सिद्धार्थ के जीवन में भी घटित हुआ था। उस दिन उनकी शादी की सालगिरह थी, राधिका ने उस दिन सिद्धार्थ को विश नहीं किया वो पति के रिस्पॉन्स को देखना चाहती थी। उस दिन सिध्दार्थ सुबह जल्दी उठा और बिना कुछ कहे घर से बाहर निकल गया। राधिका रुआँसी हो गई उसे लगा सिध्दार्थ आज के दिन उसे इग्नोर कर रहा है।

दो घण्टे बाद घर की कॉलबेल बजी, राधिका दौड़ती हुई गई और जाकर दरवाजा खोला । दरवाजे पर गिफ्ट के पैकेट और उसकी पसंद के फूलों के बुके के साथ सिध्दार्थ खड़ा मुस्कुरा रहा था। सिध्दार्थ ने उसे गले से लगा लिया और सालगिरह को विश किया। फिर वह बिना कुछ कहे अपने कमरे मेँ चला गया।

राधिका गिफ्ट का पैकेट खोल कर देखने लगी तभी उसके मोबाइल फोन पर घंटी बजी उसके पास स्थानीय पुलिस स्टेशन से फोन आया था फोन पर पुलिस वाला कह रहा था कि सारी मैम बहुत दुख के साथ आपको बताना पड़ रहा है कि आपके पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई है, उनकी जेब में पड़े पर्स से आपका फोन नम्बर ढूढ़ कर आपको कॉल किया है।

राधिका के हाथ से फोन छूट कर जमीन पर गिर पड़ा उसे इस खबर पर सहसा विश्वास ही नहीं हुआ वह सोचने लगी की सिध्दार्थ तो अभी-अभी घर के अन्दर आये हैं और मुझे गले लगाकर विश भी किया है जरूर पुलिस वालों को कोई गलतफहमी हुई है । तभी उसके दिमाग में एक बात बिजली की तरह कौँध गई उसे कहीं पर सुनी एक बात याद आ गई कि मरे हुये इन्सान की आत्मा अपनी विश पूरा करने एक बार जरूर आती है।

राधिका बदहवास होकर दहाड़े मारकर रोने लगी। उसे सिद्धार्थ से अपना वो मिलना, प्यार , लड़ना, झगड़ना, नोक-झोंक सभी कुछ याद आने लगा। उसे अपने ऊपर पश्चतचाप होने लगा कि अन्तिम समय में भी वो सिध्दार्थ को प्यार ना दे सकी।

वो बिलखती हुई जब अपने कमरे में पहुंची तो उसने देखा सिद्धार्थ वहाँ नहीं था। वो चिल्ला चिल्ला कर रोती हुई सिद्धार्थ की तस्वीर के सामने खड़े होकर प्लीज कम बैक, कम बैक सिद्धार्थ कहने लगी, वह रोते हुए कह रही थी कि सिद्धार्थ तुम एक बार वापस आ जाओ मै अब कभी भी तुमसे नहीं झगड़ूंगी।

ठीक उसी वक्त बाथरूम का दरवाजा खुला और किसी ने से उसके कंधे पर हाथ रख कर पूछा क्या हुआ? राधिका ने पलट कर देखा तो उसके पति सिध्दार्थ उसके सामने खड़े थे। वो रोती हुई उनके सीने से लग गई उसने सुबुकते हुए सिद्धार्थ से सारी बात बताई ।

तब सिद्धार्थ ने बताया कि आज सुबह जब वो उसके लिए शादी की सालगिरह का गिफ्ट लेने के लिए गए थे तो रास्ते में उनका पर्स कहीं गिर गया था फिर एक दोस्त से पैसे उधार लेकर उन्होंने गिफ्ट खरीदा था । जिस व्यक्ति को उनका बटुआ मिला होगा लगता है उसकी दुर्घटना में मौत हो गई है।

जिन्दगी में किसी की अहमियत तब पता चलती है जब वो हमारे साथ नही होता है, राधिका और सिद्धार्थ को तो जिंदगी ने दूसरा मौका दे दिया पर जिन्दगी की करवटें सभी को भूल सुधार का मौका नहीं देती हैं। थोड़ा झुककर लोगों को माफ़ कर देना अच्छा है क्या पता दुबारा पश्चाताप का मौका भी मिले न मिले।