जो भी हुआ अच्छा हुआ

जो भी हुआ अच्छा हुआ,

ख़त्म पुराना एक किस्सा हुआ,

जिसमें कभी समाया था वजूद मेरा,

दूर मुझसे आज मेरा वो हिस्सा हुआ।

वो अपनी ही धुन में खोई रही,

कोई बेमतलब ही रूसवा हुआ,

आग और पानी जैसा प्यार था अपना,

किस हक़ से फिर आज वो गुस्सा हुआ।

सूरत को सीरत पर तरजीह मिली,

हुस्न महंगा इश्क सस्ता हुआ,

कैसे मिलता दिल को करार,

ख़ुद से मिले भी एक अरसा हुआ।

मुझमें वो शामिल कुछ इस तरह है

मुझमें वो शामिल कुछ इस तरह है,

वो है जीने का मकसद और वजह है,

दुआ में होकर भी क्यों मिलती नहीं है,

क्या हवा को पता है वो रहती कहां है?

उड़ते बादलों के जैसी फितरत है उसकी,

पल भर में वो यहीं है पल भर में वो वहां है,

मैं भागता हूं उसके पीछे धूप के जैसा,

परछाई के जैसी वो ठहरती कहां है?

मुझमें ढ़ल रही है वो सर्द रातों के जैसी,

बिना धुएं के आग जलती कहां है,

दो सीधी लकीरों जैसी किस्मत है अपनी,

जो साथ दिखती तो हैं पर मिलती कहां है?

तेरे मिलावटी इश्क से तो दिल की दूरियां ही अच्छी हैं

तेरे मिलावटी इश्क से तो ,

दिल की दूरियां ही अच्छी हैं,

इस ज़माने की झूठी तसल्लियों से तो,

मेरी मजबूरियां ही अच्छी हैं।

दर्द को कब परवाह कि तुम कांटा या ग़ुलाब हो,

झूठ की मीठी ख़ुराक से तो,

सच की कड़वी गोलियां ही अच्छी हैं।

हर हमराज़ हमनवा बने ये मुमकिन कहां,

नकाब के पीछे छिपे चेहरों से तो,

पीठ पे छूरियां ही अच्छी हैं।

छूटे हुए तीर को हवाओं का इल्म नहीं,

बेकसूर के शिकार से तो,

हाथ में चूड़ियां ही अच्छी हैं।

हर सवाल का जवाब हो ये कहां लिखा,

बेकार की गलतफहमियों से तो,

उलझी पहेलियां ही अच्छी हैं।

तेरे मिलावटी इश्क से तो,

दिल की दूरियां ही अच्छी हैं,

इस ज़माने की झूठी तसल्लियों से तो,

मेरी मजबूरियां ही अच्छी हैं।

जाते-जाते न जाने क्यूं एक लम्हा ठहर गया

जाते-जाते न जाने क्यूं लम्हा एक ठहर गया,

देकर दर्द जुदाई का न जाने किस शहर गया,

हंसते हैं वो इस तरह से मानो कुछ हुआ ही नहीं,

आग लगी थी कहीं पर, पानी कहीं पर बह गया।

गहरे तजुर्बे दे गये इश्क के वो चार दिन,

आधा भरा था पैमाना, आधा खाली रह गया,

जाते हुए लम्हों मुझ पर कुछ इल्जा़म तो कहो,

कागज़ पे कुछ लिखा था, कुछ अधूरा रह गया।

पता चला है हाल उनके हमसे जुदा नहीं,

आसुओं की बारिश में सारा ख़ुमार बह गया,

हर मोड़ को मज़िल मिले ये मुमकिन कहां,

जख़्म पुराने भर गए, दाग़ दामन पे रह गया।

ये सच है या ख्वाब है

ये सच है या ख्वाब है,

कोई शायद आसपास है,

कहीं दिन ढल रहा है बेवजह,

कहीं चढ़ती रातें उदास है।

हजारों मुश्किलें हैं जीवन में,

जीने की तरकीबें भी नायाब है,

कोई ढूंढ़ रहा है जिंदगी का मकसद,

किसी की किस्मत उसके साथ है।

रंग बदलती इस दुनिया में,

उनकी सादगी कितनी लाजवाब है,

उन्हें नफ़रत भी हमीं से है,

हमसे मोहब्बत भी बेहिसाब है।

कैसी कसक उठती है दिल में,

कितनी अजीब सी ये प्यास है,

दूर कहीं दिखता एक साया है,

बस एक अधूरा सा अहसास है।

उसकी हर बात एक राज़ सी क्यूं है ?

उसकी हर बात एक राज़ सी क्यूं है

ढलती हुई ये शाम उदास सी क्यूं है

खुशियों का ठौर कहां हम ढूंढे

मंजिलें मुझसे नाराज़ सी क्यूं है

जो मिला है उसकी कद्र कहां है

जो नहीं है उसकी तालाश सी क्यूं है

हर चेहरे के पीछे छिपा एक चेहरा है

झूठ में सच की आस सी क्यूं है

बाहर दिवाली दिलों में अंधेरा है

पानी में रहकर भी प्यास सी क्यूं है

तारों की महफिल पे चांद का पहरा है

चांदनी इतनी उदास सी क्यूं है

जिंदगी तुम कितने सवाल करती हो

जब भी करती हो बेमिसाल करती हो,

जिंदगी तुम जितने भी सवाल करती हो,

कहां खुशी मिलती है, कहां ग़म मिलता है,

लोगों को लगता है हर इंसान यहां बिकता है।

जैसे ही कुछ सम्हलता हूं फिर कमाल करती हो,

नई मुश्किलों से फिर हलाल करती हो,

ना रात रूकती है, ना दिन ठहरता है,

यहां वक्त भी किसी के लिए कहां रूकता है?

कभी ऐसे कभी वैसे निहाल करती हो,

कांटों में फूलों के जैसे ख्याल करती हो,

कुछ स्याह कुछ सफेद लकीरों ने घेरा है,

हर रात के बाद जीवन फिर नया सवेरा है।

कभी सीधे कभी तीखे सवाल करती हो,

अपनी चालों से मुझे बेहाल करती हो,

जब भी करती हो बेमिसाल करती हो,

जिंदगी तुम जितने भी सवाल करती हो।

हर बात की कोई कहानी नहीं होती

हर बात की कोई कहानी नहीं होती,

हर धुन की मीरा दीवानी नहीं होती,

कुछ रिश्तों का कोई नाम नहीं होता,

कुछ रिश्तों की कोई निशानी नहीं होती।

किसी की बातों में अब दिल नहीं लगता,

किसी की यादें कभी पुरानी नहीं होती,

टुकड़ों – टुकड़ों में सबको जीना पड़ता है,

संग हमेशा किसी के जवानी नहीं होती।

अपनों के लिए कभी वक्त नहीं मिलता,

गैरों की महफ़िल कभी वीरानी नहीं होती,

तिनके-तिनके से घर बना करता है,

अपनों से अपनों को परेशानी नहीं होती।

(स्वरचित)

दिखता नहीं है जो वो कहीं अंदर छिपा रहता है

दिखता नहीं है जो वो कहीं अंदर छिपा रहता है,

ख़ामोश निगाहों में भी एक समंदर छिपा रहता है,

यकीन आता नहीं तो कभी आज़मा के देख लो,

रिश्तों की आड़ में भी एक खंजर छिपा रहता है।

जो कहते है उन्हें किसी का खौफ़ नहीं,

आखों में उनकी भी डर का मंज़र छिपा रहता है,

मुमकिन है किनारों को पता भी न चले,

ठहरे पानी में भी एक बवंडर छिपा रहता है।

कोई माने न माने पर हकीक़त है यही,

रिश्तों का मकसद तो मतलब के अंदर छिपा रहता है,

लोग ढूढ़ते हैं खु़दा को पत्थरों में कहीं,

असली ख़ुदा तो दिल के अंदर छिपा रहता है।

एक शोर जो गुमसुम सा है

भीतर एक शोर जो गुमसुम सा है

कहीं दूर बजती बाँसुरी की धुन सा है

कभी दूर जाता कभी पास आता हुआ

किसी शायर की अधूरी नज़्म सा है।

शहर-दर-शहर भटकता हुआ

ये रेत में पानी के वहम सा है

आईने में अपनें अक्स को ढूंढ़ता

ये इश्क की अधूरी कसम सा है।

सर्दियों की सुबह में नर्म धूप सा

ये घास पे बिखरी शबनम सा है

कभी लहराता, कभी थर-थराता हुआ

ये शोर बहुत बेशरम सा है।