तलाश में हूं अपनी मगर…

तलाश में हूं अपनी मगर,

अब तक मैं नाकाम हूं,

ख़ुद को ख़ुद में ढूंढ़ रहा,

मैं ही मेरा मुकाम हूं।

माना मुझसे मेरी दूरियाँ,

ज्यादा ही कुछ बढ़ गईं

मैं ही अपनी चोट हूं,

मैं ही अपना ईनाम हूं।

मुझे मेरी कदर नहीं,

मुझसे ही मैं हैरान हूं,

मैं ही ख़ुद को मिटा रहा,

मैं ही ख़ुद की पहचान हूं।

क्या से क्या मैं हो गया,

कुछ तो बता ऐ ज़िदंगी,

किसका मैं सजदा करूं,

कैसे करूं मै बंदगी।

मेरा भी वो हुआ कहाँ,

जो तेरा भी हुआ नहीं,

मैं ढूंढ़ता उसे रहा,

जो कभी मुझे मिला नहीं।

कैसी है ये दिल्लगी,

कैसी ये उड़ान है,

मैं ही मुझमें कैद हूं,

मैं ही मेरा आसमान हूं…

© abhishek trehan

ना बुरा मानता हूं,ना तुम्हें जानता हूं…

ना बुरा मानता हूं,

ना तुम्हें जानता हूं,

अब उससे क्या शिकायत,

जिसे हवा मानता हूं।

होकर भी नहीं मुझमें,

कुछ ऐसे तुम जुड़ी हो,

दूर ढूंढ़ती हैं तुमको नज़रें,

नज़दीक तुम खड़ी हो।

कोई बात नहीं है समझता,

कोई हालात नहीं है समझता,

अब उससे क्या कहूं मैं,

जो जज़्बात नहीं है समझता।

अगर सिर्फ़ ख़्वाब होते,

तो और बात होती,

उन ख्वाहिशों का क्या करूं मैं,

जिन्हें इल्तिजा मानता हूं।

ज़माने की हर ख़ुशी पर,

एक तेरी कमी है भारी,

उसे कैसे भूल जाऊँ,

जिसे ख़ुदा मानता हूं।

उस दर्द से क्या कहूं मैं,

जो हमें अपनों से मिला है,

अपनों से मिले ज़हर को

अब दवा मानता हूं…

*इल्तिजा – प्रार्थना, निवेदन

© abhishek trehan

कभी सोचा नहीं था ऐसा वक्त भी आएगा…

कभी सोचा नहीं था,

ऐसा वक्त भी आएगा,

इंसान ही ख़तरा बनेगा,

इंसान ही पार लगाएगा।

ज़िदगी में उस मुकाम तक,

जाना अभी नहीं है

जहाँ शहर तो होगा,

साया नज़र नहीं आएगा।

वक्त कह रहा है,

अभी वक्त है संभल लो

अगर अब भी नहीं संभले,

तो वजूद भी मिट जाएगा।

अभी बंदिशें लगी हैं,

कल नींद भी उड़ेंगी

अगर फिर भी नहीं रूके तो,

ये घरौंदा बिखर जाएगा।

कुछ भी गलत करके,

अपनी बारी का इंतज़ार करना

अगर चिंगारी कोई भड़की,

तो तुम्हारा भी घर जल जाएगा।

अगर सपने ही देखने हैं,

तो चारदीवारी में तुम रहना

ये रात भी ख़त्म होगी,

नया सवेरा फिर मुस्कुराएगा…

© abhishek trehan

दर-ब-दर ढूंढ़ रहा है,पंछी अपने पानी को…

दर-ब-दर ढूंढ़ रहा है,

पंछी अपने पानी को,

कितना मुश्किल है पूरी करना,

लफ्ज़ो से इस अधूरी कहानी को।

रेत ही रेत फैली हो जैसे,

रेत की चलती आंधी हो,

रेत से ही शुरूआत हुई हो,

रेत ही आखिरी निशानी हो।

रूठी-रूठी घटा है लगती,

रूठा मेरे हिस्से का बादल है,

हवा भी उल्टी बह रही है,

दिल भी अश्कों से घायल है।

ना जाने किसकी नज़र लगी है,

ना जाने कैसा ये मंज़र है

ज़हर भी पानी लगने लगा है

बेताबियों का आलम है।

मान लिया है मैने भी अब ये,

जीवन की यही कहानी है,

ना प्यास बुझी है,ना आग बुझी है

कैसी ये मनमानी है।

हाथ दुआ में उठने लगे हैं,

ये रिश्ता भी शायद रूहानी है,

वो बूंद बनकर मुझपे बरस रहा है,

जो तेरे हिस्से का पानी है…

© abhishek trehan

जिंदा हूं मैं थोड़ा,मैं थोड़ा मर चुका हूं…

जिंदा हूं मैं थोड़ा,

मैं थोड़ा मर चुका हूं,

बाकी हूं थोड़ा ख़ुद में,

थोड़ा ख़ुद में मिट चुका हूं।

आज़ाद भी नहीं हूं,

मैं बरबाद भी नहीं हूं,

थोड़ा नसीब ने लिख दिया है,

थोड़ा ख़ुद मैं लिख चुका हूं।

मिट्टी का मैं बना हूं,

तुम बूँदों सी बरस रही हो,

थोड़ा दूर हुआ हूं ख़ुद से,

थोड़ा ख़ुद में बच गया हूं।

मंज़िल कोई नहीं है,

सपनों सा ये सफ़र है,

थोड़ी ख़ुशबू उठ रही है,

थोड़ा मैं बहक गया हूं।

दिल कह रहा है,

छोड़ दूं अब ये दुनिया,

तेरी बात के ख़ातिर,

फिर से पलट गया हूं।

उसने कहा है हमसे,

तेरे इंतज़ार में खड़े हैं,

वो थोड़ा मुझमें रूक गई है,

मैं थोड़ा उसमें ठहर गया हूं…

© abhishek trehan

जरूरत से ज्यादा संभलने लगे हैं…

जरूरत से ज्यादा संभलने लगे हैं,

परिंदे भी ठिकाना बदलने लगे हैं,

बदलना तो जिंदगी की फ़ितरत है लेकिन,

वो मौसम से भी ज़्यादा बदलने लगे हैं।

किस्मत से सबको शिकायत यही है,

जो हासिल है उससे मोहब्बत नहीं है,

ख्वाहिशें भी ज़िदंगी का हिस्सा हैं लेकिन,

वो जरूरत से ज़्यादा मचलने लगे हैं।

बूंद-बूंद करके मिट्टी में समाती है बारिश,

जैसे धरती ने बादल से की हो सिफारिश,

फिर भी प्यास दिलों की मिटती नहीं है,

वो अश्कों को पानी समझने लगे हैं।

तोड़कर ज़िदंगी ने है जुड़ना सिखाया,

रास्तों की उलझनों ने है मुड़ना सिखाया,

टूटना तो ख़्वाबों की फ़ितरत है लेकिन,

वो जरूरत से ज़्यादा बिखरने लगे हैं।

मालूम है हमको ये मुनासिब नहीं है,

तारों से इश्क करना भी वाज़िब नहीं है,

दूरियों ने हदों में है रहना सिखाया,

वो दूरियों को इजाज़त समझने लगे हैं।

एक वक्त था जब तेरी हसरत थी मुझको,

अब वो वक्त है जब तेरी जरूरत है मुझको,

मेरी जरूरत को भी तेरी आदत हुई है,

इस आदत को हम इबादत समझने लगे हैं…

© abhishek trehan

कुछ ज़िदगी लाजवाब है, कुछ हम भी बेमिसाल हैं…

कुछ ज़िदगी लाजवाब है,

कुछ हम भी बेमिसाल हैं,

कुछ जीतने की ज़िद है,

कुछ हारने के सवाल हैं।

हज़ारों ख्वाब तोड़कर,

सुबह एक हो रही,

कुछ रात की है बेबसी,

कुछ सुबह का कमाल है।

वक्त बहुत बीत गया,

समझे तुम फिर भी नहीं,

अफ़सोस अब क्या करें,

तुम्हारा क्या ख़्याल है।

मैं गांठ पुरानी खोल दूं,

या यादों के रंग घोल दूं,

रात गहरी हो चली,

किस चीज़ का मलाल है।

ये दिल बहुत उदास है,

बुझती नहीं ये प्यास है,

ये लकीरों की है बेबसी,

या इश्क की मिसाल है।

ना रूठने का है डर मुझे,

ना मनाने का ही सवाल है,

अंबर भी सूना हो गया,

कोरा ही वो रूमाल है…

© abhishek trehan

गुस्सा नहीं हूं तुमसे,नाराज़ भी नहीं हूं…

गुस्सा नहीं हूं तुमसे,

नाराज़ भी नहीं हूं,

तुम मेरा कल नहीं हो,

तुम्हारा आज मैं नहीं हूं।

गलती करना गलत नहीं है,

हर ज़िद भी सही नहीं है,

तुम आगाज़ नहीं हो मेरा,

तुम्हारा अंजाम मैं नहीं हूं।

चाहे कुसूर हो किसी का,

नफ़रत से क्या मिलेगा,

तुम मुस्तक़बिल नहीं हो मेरा,

तुम्हारा फ़िलहाल मैं नहीं हूं।

दिल से दूर होकर,

दिल के करीब हो तुम,

तुम बेख़बर नहीं हो मुझसे,

तुमसे अंजान मैं नहीं हूं।

ज़िदंगी गुज़र रही है,

किरदार बदल गए हैं,

शिकायतें चल रही हैं,

परेशान मैं नहीं हूं।

जरूरत नहीं तुम्हारी,

ऐसा कहां कहा है,

तुम उम्मीद नहीं हो मेरी,

तुम्हारी पहचान मैं नहीं हूं…

© abhishek trehan

धूप मिटा दो,छांव मिटा दो …

धूप मिटा दो,छांव मिटा दो

मेरे सब अरमान मिटा दो,

छोड़ दो बस मुझको मुझमें,

बाकी सब पहचान मिटा दो।

कहां- कहां से जोड़ें ख़ुद को,

यहां-वहां से तोड़ें ख़ुद को,

ख़त्म करो ये किस्सा तुम भी,

बाकी सब निशान मिटा दो।

लगता नहीं है,कहीं दिल अब मेरा

रातें है लंबी,उलझा है सवेरा

छोड़ दो बस कुछ उम्मीदें मुझमें,

बाकी सब ग़ुमान मिटा दो।

बस इतनी सी बात हुई है,

सुबह से फिर शाम हुई है,

हुआ है अंबर का रंग गुलाबी,

फ़ीकी हर मुस्कान हुई है।

शायद अब फिर लौट न पाऊं,

दूर कहीं पर मुकाम बनाऊं,

छोड़ दो कुछ ख़ुद को मुझमें

बाकी सब अनुमान मिटा दो।

चोट पर फिर से चोट लगी है,

अश्कों पर फिर से रोक लगी है,

हुए हैं सुर्ख़ चांद-सितारे,

जाने किसकी टोक लगी है…

© abhishek trehan

मैं कोई किताब लिखूं…

मैं कोई किताब लिखूं,

उसकी तुम कहानी बनो

मैं कोई गीत लिखूं,

उसकी तुम ज़ुबानी बनो।

रास्ते तो बहुत हैं,

मेरी राह है कौन सी,

मैं कोई अंजाम लिखूं,

उसकी तुम निशानी बनो।

जिस्म से परे है वो,

मेरे इश्क का जो मुकाम है

भीगो दे जो मेरी रूह को,

तुम बूंद का वो पानी बनो।

सही-ग़लत, कुछ नहीं,

ये नज़र-नज़र की बात है

दुनिया ढूंढ़ती है नये को,

मेरे लिए तुम पुरानी बनो।

गुज़र जाएगा ये दौर भी,

कुछ साज़िश,कुछ इत्तेफ़ाक हैं

जिस्मों से जुड़ी रिश्तों की डोर है,

मेरे लिए तुम रूहानी बनो।

कांटें तो नसीब में बहुत थे,

हमें फूल भी कम मिले नहीं

ये ज़िंदगी खुदा की मेहर है,

इस ज़िंदगी की तुम मेहरबानी बनो…

© abhishek trehan