ना किसी के साथ हूं ना किसी के पास हूं…

ना किसी के साथ हूं,

ना किसी के पास हूं,

साल नया लग गया,

मैं बेवजह उदास हूं।

तारीख भी बदल गई,

महीना भी बदल गया,

तुम आकर मुझे सम्हाल लो,

मैं टूटता पलाश हूं।

मौसम बहुत सर्द है,

दिल में बहुत दर्द है,

अधूरा हूं मैं तेरे बिना,

मुकम्मल मेरा हमदर्द है।

मुद्दतें गुज़र गईं,

हिसाब हमने किया नहीं,

उसने कुछ सुना नहीं,

हमने कुछ कहा नहीं।

वो ढूंढ़ते हमें रहे,

हम कहीं मिले नहीं,

अब अपने दिल ढूंढ़ लो,

मैं तुम्हारे ही आस-पास हूं।

आज भी लिखा नहीं,

बस इतना तुम समझ लो,

मेरी तुम प्यास हो,

मैं तुम्हारी तालाश हूं…

(स्वलिखित)

नफ़रत करता हूं तो उनकी अहमियत बढ़ जाती है…

नफ़रत करता हूं तो,

उनकी अहमियत बढ़ जाती है,

चुप रहता हूं तो,

उनकी मासूमियत बढ़ जाती है।

उनसे भी ज्यादा कातिल है,

उनकी दुश्मनी,

वो नज़रों से मारते हैं तो,

उनकी ख़ासियत बढ़ जाती है।

बड़े सलीके से हवाओं में,

वो ख़ुशबू सी घोल देते हैं,

जब हवाएं तेज़ चलती हैं,

वो अपनी ज़ुल्फें खोल देते हैं।

अपनी तलब तुम्हें कहूं,

या ख्वाइश तुम्हें कहूं,

आगाज़ तुम कर दो,

अंजाम मैं बनूं।

कोई मंज़िल नहीं हो जिसकी,

मोहब्बत वो रास्ता है,

जब संग वो मेरे चलते हैं,

सफ़र की कैफ़ियत बढ़ जाती है।

इस ख़त मे क्या लिखूं,

इंतज़ार ये बेजुबां है,

वो हाथ बढ़ाकर छू लेते हैं,

इश्क की रुहानियत बढ़ जाती है…

दुआओं का कोई रंग नहीं होता…

दुआओं का कोई,

रंग नहीं होता,

इश्क करने का कोई,

ढंग नहीं होता।

आ न जाना कहीं तुम,

वक्त की बातों में देखो,

वक्त भी हमेशा,

किसी के संग नहीं होता।

दुनिया में आज़माते हैं,

लोग किस्मत को अपनी,

किस्मत का लिखा हमेशा,

सबको पसंद नहीं होता।

डूब जाता है सूरज,

हर शाम को लेकिन,

अंबर का आँचल,

कभी बेरंग नहीं होता।

तेरी साँसों सी महक,

कहीं नहीं मिलती,

हर आशिक इश्क में,

कटी पतंग नहीं होता।

कोई ठहरता नहीं है,

पल भर भी कभी देखो,

और किसी के दिल का दरवाज़ा,

कभी बंद नहीं होता…

(स्वलिखित)

कभी ख़ामोश रहूं मैं कभी कुछ तुम कहो ना…

कभी ख़ामोश रहूं मैं,

कभी कुछ तुम कहो ना,

कभी शब्द कोई लिखूं मैं,

कभी अर्थ तुम बनो ना।

है बेचैन मेरा दिल,

करार तुम बनो ना,

ढूंढ़ता हूं मैं तुमको,

मुझमें तुम रहो ना।

दुनिया तो वही है,

रास्ते अलग-अलग हैं,

संग मेरे न चल सको तो,

मेरी मँज़िल तुम बनो ना।

बड़ी लंबी गुफ़्तगू है,

वक्त बहुत कम है,

एक ज़िदगी काफ़ी नहीं है,

हर जनम में तुम मिलो ना।

कभी घाव पे नमक है,

कुछ इश्क में मिले सबक हैं,

दर्द बेशुमार बढ़ रहा है,

कोई दवा तुम बनो ना।

जब तुम साथ मेरे चलोगी,

तब ये दुनिया कुछ कहेगी,

है मेरी बस यही तमन्ना,

तुम मेरे ही रहो ना…

(स्वलिखित)

फुर्सत महंगी है सुकून सस्ता है…

फुर्सत महंगी है,

सुकून सस्ता है,

ढूंढ़ता हूं मैं जिसको,

वो मुझमें ही बसता है।

वो ही मेरी मँज़िल है,

वो ही मेरा रस्ता है,

उसमें ही मैं रोता हूँ,

वो मुझमें ही हंसता है।

छोटी सी कहानी है,

तुम्हें जो सुनानी है,

मैं उसमें ही चलता हूं,

वो मुझमें ही रूकता है।

मुश्किलों से गुज़रा हूं,

रास्तों ने भी परखा है,

साथ तेरे लगता मुझे,

हर दर्द अब सस्ता है।

तू ही मेरी हकीक़त है,

तू ही मेरा फ़साना है,

तू ही मेरी ज़िद है,

तुझे ही अब पाना है।

मैं डगमगाती हुई कश्ती हूं,

तू ही मेरा किनारा है,

ढूंढ़ता है ये दिल जिसे,

वो कुछ तुझसा ही दिखता है…

(स्वलिखित)

मिलती नहीं ख़ुशी कहीं जब हमसे वो रूठते हैं…

मिलती नहीं ख़ुशी कहीं,

जब हमसे वो रूठते हैं,

लगता नहीं है दिल कहीं,

जब अश्कों को वो पोछते हैं।

कहते नहीं वो हमसे,

उन्हें क्या पसंद नहीं,

करते हम कुछ हैं,

मतलब कुछ वो सोचते हैं।

मिले वो हमसे कब थे,

हमसे कब वो बिछड़ गए,

हम कुछ समझ सके नहीं,

वो ख़मोशी से सब कह गए।

खोया उन्हें जब हमने,

तब ये पता चला,

जीने को थे वो जरुरी,

बिना उनके हम है बेवजह।

दूरियों ने सिखा दिया है,

नज़दीकियों का फलसफ़ा,

कहती नहीं है जुबां कुछ,

वो बस नज़रों से बोलते हैं।

लाजवाब है उनकी पसंद भी,

बेमिसाल है उनकी हर अदा,

कभी कहते हैं नसीब वो हमको,

कभी तकदीर को कोसते हैं…

(स्वलिखित)

जल रहा है कोई,कोई ख़ाक हो रहा है…

जल रहा है कोई

कोई ख़ाक हो रहा है

हमें इश्क हुआ है उनसे

ज़माना राख हो रहा है

बड़ी मासूम सी कशिश है

बड़ा मासूम है वो चेहरा

सर्दियां बढ़ रही हैं

इश्क बेशुमार हो रहा है

कभी फुर्सत मिले तुम्हें तो

हाल-ए-दिल तुम्हें बताएं

जुबां कुछ कह रही है

कुछ बयान हो रहा है

पहले उठायी नज़रे

ज़ुल्फों को फिर संवारा

हल्का सा मुस्कुरा दिये वो

मौसम गुलज़ार हो रहा है

हसरते मचल रही हैं

काँटा गुलाब हो रहा है

फासले मिट रहे हैं

पूरा हर हिसाब हो रहा है

हंसकर कुबूल की है

उन्होनें हमारी हर दुआएँ

शुक्रगुज़ार हूँ मैं उनका

जीने का इंतज़ाम हो रहा है…

(स्वलिखित)

खोने को कुछ नहीं है…

खोने को कुछ नहीं है,

पाना भी कुछ कहाँ है,

दूर दिखता है कोई साया,

उठता यादों का बस धुआँ है।

पाया था जो वो है खोया,

खोया भी गया कहाँ है,

मज़िल सबकी वही है,

मुसाफ़िर सब यहाँ है।

तुम साथ नहीं तो क्या है,

संग यादों की तपिश है,

तेरा बिना अधूरा हूँ मैं,

बड़ी मुकम्मल सी ये कशिश है।

लंबा है ये सफ़र भी,

हमसफ़र संग नहीं है,

प्यासा है कोई मुसाफ़िर,

पानी कहीं नही है।

तकलीफ़ तब है होती,

टूटती हैं जब डोरें,

टूट जाए जब कोई डोरी,

जुड़ती वो फिर कहाँ है।

कुछ हसरतें हैं अधूरी,

कुछ काम हैं जरूरी,

ज़िदगी चल रही है,

हम जीते अब कहां है…

(स्वलिखित)

नफ़रत है किसी को मुझसे कोई ऐतबार कर रहा है…

नफ़रत है किसी को मुझसे,

कोई ऐतबार कर रहा है,

किसी को सूरत पसंद नहीं है,

कोई दीदार कर रहा है।

दर्द का भी तुम देखो,

होता है हिसाब अपना,

कभी जीने के लिए है जरूरी,

कभी बीमार कर रहा है।

मिला तो हमें बहुत है,

गिनते हम कहाँ है,

पुराना जख़्म भर रहा है,

नया इंतज़ार कर रहा है।

किस कदर है इश्क तुमसे,

इस कदर है तलब तुम्हारी,

छूट जाऊँ मैं अब ख़ुद से,

जुड़ जाए अब रूह हमारी।

उन्होनें ख़ैरियत नहीं है पूछी,

मगर उन्हें हमारी हर ख़बर है,

हमसे वो बेख़बर नहीं हैं,

हम पर उनकी हरदम नज़र है

समझते हैं वो मजबूरी,

कुछ काम हैं जरूरी,

हल्की आग सुलग रही है,

धुआँ बेशुमार उठ रहा है…

(स्वलिखित)

मँज़िले भी तेरी हैं रास्ता भी तेरा है…

मँज़िले भी तेरी हैं,

रास्ता भी तेरा है,

मैं भटका हुआ मुसाफ़िर हूँ,

हवाओं में मेरा बसेरा है।

वक्त की बंद मुट्ठी में,

छिपा राज़ कोई गहरा है,

जिंदगी के कुछ सवालों पर,

नसीब का पहरा है।

साथ चलने की ज़िद है,

रात का अँधेरा है,

दूर कहीं मेरा मुकाम है,

पास घर तेरा है।

मर्ज़ियाँ भी तेरी हैं,

शहर भी तेरा है,

हारी हुई बाज़ी है,

मुस्कुराता हुआ चेहरा है।

दुनियादारी की बंदिश है,

इश्क ये बहरा है,

डूबना ही मकसद है,

दरिया बहुत गहरा है।

कल भी अकेला था,

सच आज भी अकेला है,

लोग सब उसके थे,

ख़ुदा बस मेरा है…

(स्वलिखित)