शब्दों के घाव

आज के युग मे इंसान को क्रोध बहुत जल्दी आता है, गुस्सा एक तरह का मनोविकर है जिसका मुख्य कारण तनाव पूर्ण जीवनशैली है, क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो सबसे पहले खुद को जलती है कहते है क्रोध करने वाले इंसान को उसका क्रोध स्वय सज़ा देता है।

आज बहुत दिनो की बारिश के बाद आज मौसम साफ हुआ था पर समीर अपने कमरे मे उदास बैठा था उसकी आज ऑफीस मे फिर से किसी से किसी बात पर बहस हुई थी उसका मन गुस्से से भरा हुआ था, यू तो समीर एक होशियार और मेहनती कर्मचारी था पर उसके भीतर एक ही कमी थी कि उसे क्रोध बहुत जल्दी आता था।

छोटी छोटी बातों में अपना टेम्पर लूज कर देना समीर का स्वभाव बन गया था, अपनी इस आदत से स्वयं समीर भी परेशान था और इस आदत से छुटकारा पाना चाहता था पर यह सब इतनी तेजी से होता था कि वो कुछ भी सोच समझ नहीं पाता था उसने बहुत कुछ सीखा था पर क्रोध पर नियंत्रण करना वो नहीं सीख पाया था।

बहुत प्रयास करने के बाद भी जब उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तो उसने अपने मित्र अनुराग से मदद माँगी, अनुराग समीर को लेकर मठ मे अपने गुरुजी के पास गया समीर ने गुरुजी से अपनी समस्या बतायी और सहयता करने की अपील की।

समीर की बात सुन कर गुरुजी मुस्कुराने लगे उन्होने समीर को कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना।

पहले दिन समीर ने छोटी छोटी बातों में दिनभर में बीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया और फिर एक दिन ऐसा आया समीर ने पूरे दिन में एक बार भी अपना टेम्पर लूज नहीं किया।

जब उसने अपने मित्र अनुराग को ये बात बताई तो वह उसे लेकर फिर आश्रम गया जहा समीर की बात सुनकर गुरुजी ने कहा आज से, अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो उस दिन इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना।

समीर ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब समीर ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने मित्र अनुराग को ख़ुशी से ये बात बतायी।

कुछ दिनों बाद गुरुजी अनुराग के साथ समीर के घर आये और उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो। अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था,जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं।

गुरुजी के जाने के बाद समीर फिर से बाड़े के पास गया और बाड़े में हुए छेदों पर हाथ फेरने लगा उसे यह महसूस हो रहा था कि मानों ये बाड़े के छेद न होकर लोगों के ह्दय थे जिन्हें उसने अपनी बातों से छलनी कर दिया था। उसकी आखों मे आसू आ गये थे .समीर ने मन ही मन गुरुजी को धन्यवाद दिया और निश्चय किया कि वो अब क्रोध करके इस बाड़े में और कील नहीं ठोकेंगा।

इसलिए अगली बार आप भी अपना टेम्पर लूज करने से पहले ज़रूर सोचियेगा कि क्या आप भी उस बाड़े में और कीलें ठोकना चाहते हैं ?

मोटिवेशन


मोटिवेशन की अवधारणा आधुनिक मैनेजमेंट का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसकी जड़ में दो विचारधाराएं काम करती हैं. इनमें से एक को नकारात्मक विचारधारा या Theory X कहते हैं. और दूसरी को सकारात्मक विचारधारा या Theory Y कहते हैं.

Theory X के अनुसार कर्मचारी स्वभाव से ही आलसी, काम को टालने वाले और डेडलाइन को फालो नहीं करने वाले होते हैं. अतः मैनेजमेंट को कर्मचारियों के साथ कड़ाई से पेश आना चाहिए और सख्त नियंत्रण के साथ उत्पादन को बढ़ाने पर जोर देना चाहिए. मोटिवेशन की यह विचारधारा औद्योगिक क्रांति के समय में अमेरिका और यूरोप की कंपनियों में लोकप्रिय थी जिसका उद्देश्य कम लागत पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना था. डिसीपलिन और Layoff का कॉन्सेप्ट Theory X का बेहतरीन उदाहरण है.

वहीं Theory Y या मोटिवेशन की सकारात्मक विचारधारा का सारा फोकस कर्मचारियों के मानवीय पहलू पर होता है. इस थ्योरी के अनुसार अधिकतर कर्मचारी कर्मठ, जिम्मेदारी को समझने वाले और कर्तव्यों का निर्वाह करने वाले होते हैं. अतः मैनेजमेंट को कर्मचारियों के साथ उदारता से पेश आना चाहिए और परस्पर सहयोग के द्वारा लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए. टीम वर्क और सामूहिक डिसिजन मेकिंग का कॉन्सेप्ट Theory Y का बेहतरीन उदाहरण है. मोटिवेशन की यह विचारधारा नब्बे के दशक में ग्लोबलाइजेशन के उपरांत मल्टीनेशनल कंपनियों में काफी लोकप्रिय रही है.

यहां यह सवाल उठाना लाजिमी है कि मोटिवेशन की कौन सी विचारधारा लोगों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है? लोग किस विचारधारा से ज्यादा प्रभावित होते हैं? बिहेवियरल सांइस के क्षेत्र में हुए शोध से पता चलता है कि अत्यधिक सख्ती एवं अत्यधिक उदारता दोनों ही स्थितियां उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं. कर्मचारियों को नियंत्रण एवं छूट दोनों की आवश्यकता होती है. पर यह कितनी, कब, कैसे हो इसका सही निर्धारण ही कंपनी के HR मैनेजमेंट की काबिलियत को निर्धारित करता है.

लोग ही किसी भी कंपनी या संस्था के सबसे बड़े asset होते हैं. उन्हे नियंत्रित करना और बढ़ावा देना दोनों ही मैनेजमेंट की जिम्मेदारी है. जिस तरह स्वादिष्ट खीर के लिए दूध और चीनी की सही मात्रा में होना आवश्यक है ठीक उसी तरह कर्मचारियों के लिए भी संतुलित मात्रा में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही तरह के मोटिवेशन आवश्यक होते हैं.

जिंदगी के सबक

1- दूसरों को सलाह देना बहुत आसान है लेकिन उन्हें स्वयं पर लागू करना हमेशा मुश्किल होता है।

2- कोई भी व्यक्ति या परिस्थिति परफेक्ट नहीं होती है, आप लोगों और परिस्थितियों से किस तरह निपटते हैं, यही आपके लिए अच्छा चीजों को अच्छा या बुरा बनाता है।

3- हर किसी के साथ अपनी समस्याओं को कभी साझा न करें। कुछ लोग खुश होते हैं कि आपके पास समस्याएं हैं और शेष लोगों को इसकी परवाह नहीं होती है।

4- जिंदगी में ऐसा समय कभी भी नहीं होगा जब आप अपने पास से पूरी तरह संतुष्ट हों।

5- जीवन के हर चरण में आपके मित्र होंगे। लेकिन हर बार वही नहीं होगें।

6- लोग स्वयं को बचाने के लिए कुछ भी और किसी को भी त्याग देंगे- मुझे नहीं लगता कि इसे अधिक एेक्सप्लेन करने की आवश्यकता है।

7- जिंदगी में सफलता अक्सर ज्यादा प्रयास के बजाय लगातार प्रयास से मिलती है।

8- आपके दृष्टिकोण और धैर्य में प्रत्येक समस्या का समाधान छुपा है।

9- कड़ी मेहनत प्रतिभा को पीछे छोड़ देती है यदि प्रतिभा कड़ी मेहनत करना छोड़ देती है।

10- अवचेतन मन की शक्ति बहुत अधिक है, सब कुछ वास्तव में एक विचार के साथ शुरू होता है। हमेशा सोच को सकारात्मक रखिये।

नई शुरूआत

1- आपको हर बार शुरू करने के लिए एक नये दिन की आवश्यकता नहीं होती है, कभी-कभी आपको केवल अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत होती है जिसके बदलते ही परिणाम भी बदल जाते हैं।

2- आज का दिन सिर्फ एक और दिन नहीं है, यह आपके लिए अपने सपनों को सच करने का एक और मौका है।

3- कुछ खास आपका हर दिन इंतजार कर रहा है, आपको बस इसे पहचानना है और इस मौके को पूरी तरह भुनाना है।

4- प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत आपके विचार हैं, इसलिए अच्छा सोचिए और खुद को जीतने के लिए प्रेरित करिए।

5- आपकी पिछली गलतियां आपको परिभाषित नहीं करती हैं। इनका होने मतलब बस आगे के रास्तों पर चलने के लिए आपके मार्गदर्शन करने के लिए है।

6- जो आपने कल पूरा नहीं किया उसके पछतावा में आज मत जागिए, आज आप जो हासिल करेंगे उसके बारे में सोचते हुए जागिए।

7- सब कुछ आपके दिमाग से शुरू होता है और वहीं पर समाप्त होता है। आप जो सोचतें हैं वही आप पर राज करता है।

8- यह दिन कभी भी आपके जीवन में कभी वापस नहीं आएगा, उठिए और इससे सर्वश्रेष्ठ हासिल करने का प्रयास कीजिए।

9- हम जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह यह है कि अन्य लोग भी उसी तरह से सोचते हैं, जिस तरह से हम सोचते हैं।

तुलना

आज जाऊं या नहीं जाऊं ? लोग क्या सोचेंगे ? कल उनका सामना कैसे करूंगा ? झूठ बोला नहीं जाता,सच परेशान होता है। असमंजस,दोहरा रास्ता,संकोच.शायद हम सभी ऐसे ही जीते हैं। यह डर है, नकारे जाने का डर, अपमानित होने का डर ,असफल हो जाने का डर ,अज्ञात का डर आदि। कैसे सामना करें ?  क्या फैसला करें ? सही फैसला क्या होता है?  यहाँ विरोधाभास है, सही को गलत और गलत को सही बताने और उसकी व्याख्या करने के सबके अपने नजरिये हैं।

बिहेवियरल सांइस में एक थ्योरी है जिसे इक्विटी थ्योरी कहते हैं, इस के अनुसार व्यक्ति चार तरह से तुलना कराता है – खुद की खुद से, खुद की दूसरों से, दूसरों की खुद से, और दूसरों की दूसरों से। इस तुलना में वो दो कारकों को इस्तेमाल करता है- आन्तरिक और वाह्य कारक  व्यक्ति अपनी सफलता के लिए आन्तरिक और असफलता के लिए वाह्य कारकों को जिम्मेदार मानता है। इन दो कारकों को इस्तेमाल करके वह एक सन्तुलन बना लेता है और उसी के अनुसार उसकी सोच बन जाती है।

जब कभी यह सन्तुलन बिगड़ जाता है  तब वह उत्तेजित, निराश या परेशान हो जाता है।  उसकी परेशानी तब तक रहती है जब तक उसे सन्तुलन बनाने के लिए उचित कारक नहीं मिल जाता है। वह तलाश कराता है इन कारकों की बाहर और भीतर और चैन की तलाश में और बेचैन हो जाता है।उसकी तलाश पूरी होती है जब वह पूरी ईमानदारी से खुद को तलाशता है।


दिन में रात की तलाश, रात में सुबह की तलाश, साथ में अकेलेपन की और अकेलेपन में साथ की तलाश, यही सिलसिला चलता रहता है और हम सब गोल गोल घूमता रहते हैं। हम रोज सफर पर जाते हैं पर शाम को खुद को वहीं पाते हैं। हम रास्ते बदलते हैं, साथ बदलते हैं, मँजिल बदलते हैं,पर हम खुद को नहीं बदलते हैं। हम कभी किस्मत को तो कभी खुद को दोषी ठहराते हैं। बेचैनी बढ़ती जाती है और हम ढूंढते रहते हैं। हम जितना ढूंढते जाते हैं उतना ही खोते जाते हैं ।

जितना गहराई में जाओगे खुद को उतना अकेला पाओगे। आज जो भी फैसला लोगे वो न तो सही और न ही गलत होगा।सब मन का खेल है.निश्चिंत होकर खेलो क्योंकि खेल चलता रहता है और खिलाड़ी बदल जाते हैं।जब इन्सान खुद के लिए ईमानदार हो जाता है तब उसे अपना अक्स साफ दिखने लगता है फिर उसकी मुलाकात होती है खुद से और वो जान जाता है कि अपने दुखों का कारण और निवारण दोनों वह खुद है। इसे ही साइकॉलजी की भाषा में सेल्फ रिलाइजेशन कहते हैं। मैं भी खुद को ढूंढ रहा हूँ आप भी ढूंढिए, किसी ने बताया है ये रास्ता हमारे अंदर से हो कर जाता है…

कौन सफल,कौन असफल ?

ऐसा नहीं है कि हर कोई सफल होना चाहता है , अधिकांश लोग अपनी दुनिया में ही इतने खोए हुए हैं कि उसके अतिरिक्त उन्हें कुछ सोचने की इच्छी ही नहीं होती है। लेकिन वास्तव में सफल लोगों में कुछ हासिल करने की प्रबल इच्छा होती है उनके दिमाग में उनके लक्ष्य स्पष्ट होते हैं।

यदि आपके पास कीमती पेन नहीं है, बढ़िया कागज और मेज नहीं है, तो क्या आप कुछ नहीं लिखेंगे? यदि आपके पास अच्छे कपडे और बढ़िया कार नहीं हैं, तो क्या आप उन्नति नहीं करेंगे? यदि आपके घर के इर्द-गिर्द शोर होता है, तो क्या आप कुछ भी नहीं करेंगे? यदि हमारी लाइफ स्टाइल, भोजन आदि ऊंचे स्टैन्डर्ड की नहीं है, तो क्या हम निराशा से भर जायेंगे?

निराश मत होइये यदि हमारे पास बढ़िया मकान, अच्छे कपडे, बढ़िया कार इत्यादि ऐश्वर्य की वस्तुएँ नहीं हैं। ये हमारी उन्नति में बाधक नहीं हैं। उन्नति की मूल वस्तु-महत्वाकाँक्षा है। जो न जाने मन की किस अतल गहराई में छिपी पड़ी है। आत्म-परीक्षण कीजिये और इसे खोजकर निकालिये।

सफलता की गारंटी कभी नहीं होती है। सफल और असफल लोगों के बीच एक मौलिक अंतर यह है कि जो लोग सफल होते हैं वे नम्रता से अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं ऐसे व्यक्ति अपनी गलतियों से सीखते हैं और आगे बढ़ते हैं।

दुनिया को चलाने और सुधारने की जिम्मेदारी हमारी नहीं है। पर जीवन में हमारे जो कर्तव्य हैं उन्हें सच्चे मन से पूरा करने का प्रयास करना निश्चय ही हमारी जिम्मेदारी है। अपने आपको व्यवस्थित करके हम दुनिया के संचालन और सुधार में अपनी ओर से सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

सफलता पाने के लिए एक बहुत सरल दृष्टिकोण यह भी है कि यदि आप केवल कुछ चीजों के साथ पर्याप्त मात्रा में खुश हैं तो सफलता आसानी से मिल जाएगी। इसके लिए हमें उन चीज़ों को पाने के लिए खुद को चोट पहुँचाने से बचना चाहिये जिनकी हमें ज़रूरत नहीं है, हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके भी सफल हो सकते हैं। हांलाकि बहुत से लोग इसे समझ नहीं सकते हैं और आपको अपने दृष्टिकोण से असफल मान सकते हैं, लेकिन सफलता के लिए इस दुनिया में कौन किसकी परवाह करता है?

वक्त बदलता है

काल से ताकतवर कुछ भी नहीं होता। इसके आगे सब बेबस हो जाते हैं। जीवन, परिस्थितियां,घटनाएं सबकुछ काल के अधीन होती हैं। जब वक्त बदलता है तो यह परिस्थितियों को रूपांतरित कर देता है।

यह इंसान की फितरत होती है कि जब वक्त अच्छा होता है तब वो सबकुछ आसान समझता है और बुरे वक्त का ख्याल करना ही नहीं चाहता है।

जब सूर्य उदय या अस्त होता है दोनों समय उसका रंग लाल होता है। केवल दिशा का फर्क आने वाले समय को निर्धारित करता है। यह बताता है कि सुबह होगी या फिर अंधेरी रात आयेगी, दोनों ही स्थितियों में सूरज का रंग और आकार एक जैसा होता है।

हम समझते हैं कि अन्य और बहुत सी चीजों की तरह कल के बारे में भी पूर्वानुमान किया जा सकता है जबकि वास्तविकता यह है कि कोई भी नहीं जानता है कि अगले पल क्या होने वाला है।

लोग सोचते हैं कोई बीमारी या दुर्घटना हो भी गई तो मेरे पास उससे निपटने के लिए कई साधन हैं पर समय का ऊँट किस करवट बैठेगा,यह किसी को पता नहीं होता।

इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके कितने अनुभवी हैं और उन अनुभवों ने आपको क्या सिखाया है, जीवन हमेशा आपको एक अप्रत्याशित झटका देता है जिसके लिए अक्सर आप तैयार नहीं होते हैं।

समय के साथ प्राथमिकताएं बदलतीं हैं, विफलताओं से मत डरिये, कभी-कभी असफल होने का मतलब सीखने में पहला प्रयास होता है। जो बीत गया वो आपके दिमाग में है और जो होना है वो आपके हाथ में है।

आवश्यकता है चीजों को गौर से देखने की और समझने की प्रकृति भी यही संदेश देती है कि हर उगने वाले सूरज के साथ ढलने वाला सूरज भी साथ होता है अजीब बात है कि दोनों देखने में एक जैसे लगते हैं और दोनों का रंग और आकार भी एक जैसा होता है।

जो उलझाता है वही सुलझता है

जीवन में हमें क्या नहीं करना चाहिए यह बताने को बहुत लोग मिल जाते हैं, पर क्या करना चाहिए इसका जवाब बहुत कम लोगों के पास होता है। ऐसे लोग जीवन में मुश्किल से मिलते हैं और कभी-कभी तो हम ऐसे इंसान को पहचान ही नहीं पाते हैं।

हमें लगता है कि दूसरा व्यक्ति ही हमें वह सब कुछ दे सकता है जिससे हमें शांति मिल जाएगी। हमारी उम्मीद अक्सर टूट जाती है क्योंकि हम यह भूल जाते हैं कि कोई भी व्यक्ति हमें वही दे सकता है जो कि उसके खुद के पास हो। हम जिसे दूसरे व्यक्ति में ढूंढ रहे हैं वो भी किसी तीसरे व्यक्ति में उसे तालाश कर रहा है और तीसरा व्यक्ति किसी चौथे व्यक्ति को ढूंढ रहा है इस तरह यह अंतहीन सिलसिला जारी है।

कोई किसी को वही दे सकता है जो खुद उसके पास हो। किसी को शांति वही दे सकता है जो खुद स्थिर हो। किसी को हिम्मत वही दे सकता है जो खुद पथरीली राहों पर चला हो। किसी को रास्ता वही बता सकता है जो खुद सफर पर निकला हो। बिना अनुभव का ज्ञान तो बस उधार की जानकारी होता है जिसका सहारा लेकर किसी तरह समस्या को कुछ समय के लिए टाला तो जा सकता है पर उसका पूर्ण समाधान नहीं किया जा सकता है।

एक मकड़ी ने कमरे में जाला लगाने की सोची वह सही जगह की तलाश करने लगी उसने चिड़िया से सलाह मांगी चिड़िया ने कहा जाला कहीं भी लगाना पर खिड़कियों से दूर रहना क्योंकि जब हवा चलेगी तो जाला टूट जाएगा। मकड़ी ने बात मानकर कमरे के एक कोने में जाला बुनना शुरू ही किया था कि एक बिल्ली आ गयी उसने कहा यहां जाला बुनना बेकार है क्योंकि इस कोने में मक्खियाँ नहीं आती हैं तो फिर तुम्हारे जाले में फंसेगा कौन? तुम अलमारी के पीछे जाला बुनों वो जगह तुम्हारे मुफीद रहेगी।

मकड़ी ने अब अलमारी के पीछे ठिकाना बनाने लगी तो अलमारी में रहने वाली दीमक ने कहा यह अलमारी दीमक लगने के कारण खराब हो गई है और थोड़े समय बाद इसे कबाड़ी ले जाएगा तुम कहीं और चली जाओ। मकड़ी की तालाश जारी है।

आवश्यकता है खुद पर भरोसा करने की और बिना विचलित हुए लगातार कोशिश जारी रखने की,क्योंकि एेसा करने पर हमें अनुभव प्राप्त होता है और जब हमें जानकारी और अनुभव दोनों मिल जाते हैं फिर हमें अपनी समस्या का समाधान भी मिल जाता है ।

बेस्ट गिफ्ट

best gift cap

रूद्राक्ष के जीवन में सबसे मुश्किल पल तब आए थे जब डाक्टरों ने उसे बताया था कि उसका ट्यूमर कैंसरस हो चुका है। हालांकि कैंसर अभी प्रारंभिक अवस्था में था जिसका इलाज सर्जरी और कीमोथेरेपी द्वारा संभव था। रूद्राक्ष के लिए जीवन के इस कटु सत्य को स्वीकार कर लेना आसान नहीं था और उसने कुछ महीनों तक यह बात अपने परिवार से छुपाए रक्खी थी। पर सत्य तो भावनाओं के परे होता है और लाख छिपाने पर भी एक दिन बाहर आ ही जाता है।

रूद्राक्ष का एक छोटा-सा हँसता खेलता हुआ परिवार था। उसकी पत्नी वेदिका स्कूल में पढ़ाती थी उसी स्कूल में उसका दस वर्ष का बेटा प्रखर और पांच साल की बेटी ऊर्जा भी पढते थे। उनके जीवन की गाड़ी हंसी खुशी निर्बाध गति से आगे बढ़ रही थी पर रूद्राक्ष की बीमारी ने मानों खुशियों पर अचानक ब्रेक लगा दिये थे।

कैंसर की इस बीमारी ने रूद्राक्ष को शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक रूप से तोड़ दिया था। अपनी परेशानी में परेशान रूद्राक्ष थोड़ा चिड़चिड़ा भी हो गया था और छोटी छोटी बातों पर बच्चों को झिड़क देता था। कुछ दिन अस्पताल में रहकर कीमोथेरेपी कराकर रूद्राक्ष जब घर वापस आया तब बच्चों ने देखा कि उनके पापा बेहद थके हुए और उदास लग रहे हैं और उनके सिर के बाल भी झड़ गए हैं।

कुछ दिनों बाद प्रखर का जन्मदिन था। उस दिन सुबह रूद्राक्ष ने प्रखर को अपने पास बुलाकर ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद दिया और कुछ रुपये देते हुए कहा बेटा शाम को माँ के साथ जाकर केक और गिफ्ट ले आना।
प्रखर जानता था कि घर में पैसों की कितनी किल्लत है, उसने उसमें से 100 रूपये लेकर अपनी जेब में रख लिए और बाकी पैसे लेकर वह वेदिका के पास गया और बोला मां ये पैसे रख लो इस बार हम केक की जगह हलवे से काम चला लेगें, यह पैसा पापा की दवा में काम आ जाएगा। यह कहकर वह चला गया।

शाम को प्रखर जब घर आया तो उसने सिर पर एक बड़ी सी कैप लगा रखी थी। जब वेदिका ने पूछा यह कैप कहां से आयी? तो प्रखर ने मुस्कराते हुए कहा मां यही मेरा बर्थडे गिफ्ट है फिर उसने माँ से मोबाइल मांगा और बोला पापा के साथ एक सेल्फी लेनी है। वह रूद्राक्ष के कमरे में गया उसने देखा कि वो गहरी नींद में सो रहे हैं उसने चुपचाप सेल्फी ली और उसे फेसबुक पर अपलोड कर दिया।

कुछ देर बाद वेदिका ने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर देखा कि प्रखर ने अपने पापा के साथ जो सेल्फी ली थी उसमें रूद्राक्ष के सिर पर वही कैप है जो कुछ देर पहले प्रखर लाया था ,पिछले साल की फोटो के साथ उसने इस फोटो को अपलोड किया था और लिखा था कि ” मेरे पापा आज भी उतने ही अच्छे लगते हैं जितने पहले लगते थे , मैं और मेरी बहन उनसे आज भी उतना ही प्यार करते हैं, मैं आज भी उनकी तरह बनाना चाहता हूं.. गेट वेल सून पापा.. भगवान करे मेरे पापा को मेरी भी उमर लग जाए।”

वेदिका मोबाइल लेकर रूद्राक्ष को दिखाने के लिए कमरे में गयी उसने देखा प्रखर वहीं बेड पर सो गया था। वह कैप रूद्राक्ष अपने हाथों में लिए अपने मोबाइल पर पोस्ट पढ रहे थे। उनकी आखों से आंसू लगातार बह रहे थे, यह बेस्ट गिफ्ट था जो अपने जन्मदिन पर प्रखर ने अपने पापा को दिया था।

उम्मीदें खत्म नहीं होती हैं

समीर एक कंपनी के सेल्स विभाग में कार्यरत है. उसके ऊपर टार्गेट अचीव करने का दबाव है. एेसा भी नहीं है कि टार्गेट पहली बार मिले हों, उसने पहले भी टार्गेट पूरे किये हैं और उच्च अधिकारियों से प्रशंसा भी प्राप्त की है. पर इस बार बात कुछ अलग है, उसे लग रहा है कि वो इस बार टार्गेट अचीव नहीं कर पाएगा. उसका मन काम में नहीं लग रहा है. वह खोया खोया सा रहने लगा है. वह एक अज्ञात से भय से भयभीत है. निश्चित रूप से समीर के जीवन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.

वैशाली उसी कंपनी के अकाउंट्स सेक्शन में कार्यरत है. वह हमेशा ऊर्जा और उत्साह से भरपूर रहती है. वह दिये गये काम को अक्सर डेडलाइन से पूर्व ही कम्प्लीट कर लेती है. वह भविष्य को लेकर पूरी तरह आशान्वित है. उसका आत्मविश्वास उसके चेहरे पर दिखता है. वैशाली अपने जीवन से खुश और संतुष्ट है.

एक सी परिस्थितियां, एक सा माहौल, एक से अवसर, एक सा वर्क-कलचर किसी को प्रेरित करता है तो किसी को निराशा से भर देता है. किसी में उम्मीद जगाता है तो कोई उसी माहौल में नाउम्मीद हो जाता है. समीर और वैशाली दोनों की शिक्षा का स्तर, संख्यातमक, तार्किक और कम्यूनिकेशन स्किल्स एक से हैं फिर भी एक जीवन से खुश और दूसरा निराश है.

समीर की यह स्थिति उसके लिए खतरनाक है. ज्यादा समय तक वह काम को टाल नहीं सकता है. टार्गेट अचीव न करने की स्थिति में उसकी नौकरी संकट में पड़ सकती है. वहीं दूसरी तरफ इस बात की पूरी संभावना है कि वैशाली को इस बार के अप्रेजल में प्रमोशन मिलेगा. वैशाली के काम से उच्च अधिकारी संतुष्ट हैं.

समीर की हताशा और वैशाली के उत्साह के पीछे अनेकों कारण हो सकते हैं जिनकी तुलना नहीं की जा सकती है. फिर भी एक बड़ी वजह नजरिये की है. किन्हीं कारणों और परिस्थितियों के कारण समीर का नजरिया नकारात्मक हो गया है और इसका उसके आत्मविश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है. उसे अपनी समस्याएं पहाड़ जैसी नजर आ रही हैं. उसका सारा ध्यान समस्याओं का सामना करने में नहीं बल्कि उनको टालने में लगा हुआ है. निश्चित रूप से समीर का यह नजरिया उसे ज्यादा दिन तक बचा नहीं पाएगा.

समीर को इस स्थिति से बाहर कौन निकाल सकता है? निश्चित रूप से उसे अपनी सहायता स्वयं करनी पड़ेगी. उसे अपना खोया हुआ आत्मविश्वास पाने में अपने करीबी लोगों की भी आवश्यकता पड़ेगी. वह यह कैसे कर सकता है? इसका सबसे बेहतर तरीका है अपने बेसिक्स की तरफ वापस लौटना, अपनी ताकत को पहचानना, जो आपके करीब हैं उनसे अपनी बात शेयर करना और उनका समर्थन हासिल करना.

समीर की तरह हम सभी की जिंदगी में भी एेसी परिस्थितियां आती रहती हैं जब हम जिदंगी में बहुत निराश हो जाते हैं. तब भी कुछ ऐसा है जो हमें प्रेरित कर सकता है. उस कठिन समय में आवश्यकता होती है खुद को पहचानने की, अपनी ताकत को बटोरने की,उस समय आवश्यकता होती है जिजीविषा की, जीवटता की और जिन्दगी को जीने की. जब भी आपके सामने एेसा वक्त आ जाए तो खुद को यह याद दिलाते रहिये कि- जब सब कुछ समाप्त हो जाता है फिर भी एक चीज बची रहती है उसे भविष्य कहते हैं. आपका भविष्य आपके हाथ में है उसे कोई नहीं छीन सकता है. यही मोटिवेशन का मूल आधार  है.