एक शोर जो गुमसुम सा है

भीतर एक शोर जो गुमसुम सा है

कहीं दूर बजती बाँसुरी की धुन सा है

कभी दूर जाता कभी पास आता हुआ

किसी शायर की अधूरी नज़्म सा है।

शहर-दर-शहर भटकता हुआ

ये रेत में पानी के वहम सा है

आईने में अपनें अक्स को ढूंढ़ता

ये इश्क की अधूरी कसम सा है।

सर्दियों की सुबह में नर्म धूप सा

ये घास पे बिखरी शबनम सा है

कभी लहराता, कभी थर-थराता हुआ

ये शोर बहुत बेशरम सा है।

हर बात को दिल से लगाया न करो

हर बात को दिल से लगाया न करो,

अपने अश्कों से इश्क को छिपाया न करो,

जो चला गया उससे अब रिहा रहो,

गुज़रे कल को फिर से बुलाया न करो।

मासूम इश्क को दुनियादारी की समझ नहीं,

बातों में अपनी उसे यूं उलझाया न करो,

बाहर लोग हाथों में नमक लिए घूमते हैं,

हर किसी को ज़ख्म अपने दिखाया न करो।

दुनिया में जज़्बातों की कद्र किसे है,

राज़ अपने हर किसी को बताया न करो,

जिन आंखों में तेरे लिए आंसू न हों,

अपनी किस्मत वहां आजमाया न करो।

हर बात को दिल से लगाया न करो,

कभी सख्त है, कभी नरम सी है

कभी सख्त है, कभी नरम सी है

ये जिंदगी मेरे सनम सी है

कभी बोलती, कभी ख़ामोश सी

ये जिंदगी बस एक वहम सी है।

कभी धूप में जलती रेत सी,

ये जिंदगी बहुत बेरहम सी है

कभी अंधेरी राहों में उम्मीद सी

यें जिंदगी खुदा के रहम सी है।

कभी दूसरों को पैरों तले रौंदती

ये जिंदगी एक झूठे अहम सी है

कभी किसी की यादों में खोई सी

ये जिंदगी एक गहरे जख़्म सी है।

बातों-बातों में जो उसने कही होंगी

बातों-बातों में जो उसने कही होंगी

वो मुलाकातें भी कितनी हसीन रही होंगी

पत्तों पर ओस की बूंदों के मानिंद

साथ उनके शामें भी ढली होंगी

जो समझे नहीं हम तो उनकी क्या ख़ता

बातें उसने इशारों से कही होंगी

ऐ दिल वक्त है संभल जा जरा

वो मेहरबान हर बार नहीं होंगी

एक उनका साथ पाने के लिए

कितनी बातें किसी ने सही होंगी।

जब महफ़िल में जिक्र उनका हुआ होगा

मेरे बारे में भी बातें रही होंगी।

जो मेरी नज़रों से फ़ना हो गई है

जो मेरी नज़रों से फ़ना हो गई है,

वो सूरत किसी के लिए ख़ुदा हो गई है,

चलो आज फिर से देखें उस बेवफ़ा को,

जिस पत्थर पे दुनिया फ़िदा हो गई है।

अर्से के बाद जब देखा उसे तब ये जाना,

वो तब क्या थी और अब क्या से क्या हो गई है।

छू के चली जाती है वो ठंडी हवा के मानिंद,

ये हवा भी अब बेवफ़ा हो गई है।

न खोने का ग़म है न पाने की खुशी,

ये जिंदगी क्यों इतनी बेवजह हो गई है,

ना रातों को चैन है न सुबह को सुकून,

शायद कुबूल किसी की दुआ हो गई है।

वो दर्द भी अच्छा है

एक प्रसिद्ध कहावत है कि जीवन में आपको सबसे ज्यादा प्यार वो करता है जिसे जिंदगी में सबसे ज्यादा चोट लगी होती है। वे लोग शायद आप के साथ दूसरों की तुलना में बेहतर व्यवहार करेंगे यदि उन्होंने पूर्व में चोट खायी है।

ऐसा क्यों होता है? दरअसल जिन लोगों के अपने दिल कभी टूट चुके हों, अक्सर उन्हें पता होता है कि टूटे हुए टुकड़ों को कैसे जोड़ा जा सकता है। यही कारण है कि दूसरों से व्यवहार करते समय ऐसे लोग भावनात्मक रूप से कटौती नहीं करते हैं।

यह संभव है कि कुछ अच्छे लोग निराशावादी होते हों लेकिन समय के साथ, वे आम तौर पर सीखते हैं कि कठिन रास्तों पर चलते हुए सकारात्मक कैसे बनें? अच्छे लोग कभी नहीं चाहते हैं कि दूसरों को भी वो चोट लगे जिस तरह की चोट उन्हें लगी हैं।

ऐसा हो सकता है कि अच्छे लोगों को को उनकी शारीरिक बनावट,रंग-रूप या फिर शारीरिक अक्षमता के लिए परेशान किया जाता हो, फिर भी समय के साथ वे लोगों को माफ करके आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यह पीड़ा महसूस करने की तरह है, वे कभी भी किसी और को ऐसा ही दर्द नहीं होने देना चाहते हैं।

दूसरों को परेशान करने के बजाय, अच्छे लोग असंवेदनशीलता की चक्रीय प्रकृति को तोड़ते हैं। वे प्रशंसा और प्रोत्साहन के शब्द कहते हैं। वे चाहते हैं कि दूसरों को उनकी बदसूरती और चोटों को दिखाने के बजाय उनमें गुणों की सुंदरता और आत्मविश्वास महसूस हो। वे पहले से ही जानते हैं कि यह सब सहना कैसा है, और वे अपने सबसे खराब दुश्मनों पर भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहते हैं।

अच्छे लोग बचे रहना पसंद करते हैं जो दूसरों को भी बचे रहने में सहायता करते हैं। ऐसे लोग किसी भी परिस्थिति में और किसी भी स्थिति से अपना रास्ता निकाल सकते हैं। उनकी चोटों के निशान सबूत हैं कि वे पहले भी ऐसी पीड़ा से गुजर चुके हैं।

जीवन की दौड़ में, अधिकांश लोग आमतौर पर केवल खुद पर ध्यान देते हैं लेकिन कुछ लोग हैं जो इस तरह के संघर्षों से गुजर चुके हैं, ये लोगों के जख्मों को सहलाते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं और अपने साथ चलने के लिए दूसरों को प्रेरित करते हैं।

ऐसे लोग मदद करने वाले हाथ बन जाते हैं जैसा कि वे कभी खुद के लिए चाहते थे। शायद जीना इसी का नाम है।

यह बातें फिर बताएगा कौन

मैं रूठा, तुम भी रुठ गए,

फिर मनाएगा कौन?

आज दरार है, कल खाई होगी,

फिर भरेगा कौन?

मैं चुप, तुम भी चुप,

इस चुप्पी को फिर तोडेगा कौन?

छोटी बात को लगा लोगे दिल सें,

तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन?

दु:खी मैं भी और तुम भी बिछडकर,

सोचो हाथ फिर बढाएगा कौन?

न मैं राजी, न तुम राजी,

फिर माफ करनें का बडप्पन

दिखाएगा कौन?

डूब जाएगा यादों में दिल कभी,

तो फिर धैर्य बंधाएगा कौन?

एक अहम् मेरे, एक तेरे भीतर भी,

इस अहम् को फिर हराएगा कौन?

जिंदगी किसको मिली है सदा के लिए,

फिर इन लम्हों में अकेला रह जाएगा कौन?

मूंद ली दोनों में से अगर किसी दिन,

एक ने आँखे ….

तो कल इस बात पर फिर

पछतायेगा कौन?

शब्दों के घाव गहरे होते हैं

आज के युग मे इंसान को क्रोध बहुत जल्दी आता है. गुस्सा एक तरह का मनोविकर है जिसका मुख्य कारण तनाव पूर्ण जीवनशैली है. क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो सबसे पहले खुद को जलती है कहते है क्रोध करने वाले इंसान को उसका क्रोध स्वय सज़ा देता है.

आज बहुत दिनो की बारिश के बाद आज मौसम साफ हुआ था .पर समीर अपने कमरे मे उदास बैठा था उसकी आज ऑफीस मे फिर से किसी से किसी बात पर बहस हुई थी उसका मान गुस्से से भरा हुआ था. यू तो समीर एक होशियार और मेहनती कर्मचारी था पर उसके भीतर एक ही कमी थी कि उसे क्रोध बहुत जल्दी आता था.

छोटी छोटी बातों में अपना टेम्पर लूज कर देना समीर का स्वभाव बन गया था.अपनी इस आदत से स्वयं समीर भी परेशान था और इस आदत से छुटकारा पाना चाहता था .पर यह सब इतनी तेजी से होता था कि वो कुछ भी सोच समझ नहीं पाता था .उसने बहुत कुछ सीखा था पर क्रोध पर नियंत्रण करना वो नहीं सीख पाया था

बहुत प्रयास करने के बाद भी जब उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तो उसने अपने मित्र अनुराग से मदद माँगी. अनुराग समीर को लेकर मठ मे अपने गुरुजी के पास गया समीर ने गुरुजी से अपनी समस्या बतायी और सहयता करने की अपील की.

समीर की बात सुन कर गुरुजी मुस्कुराने लगे उन्होने समीर को कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना.

पहले दिन समीर ने छोटी छोटी बातों में दिनभर में बीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी. पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया. और फिर एक दिन ऐसा आया समीर ने पूरे दिन में एक बार भी अपना टेम्पर लूज नहीं किया.

जब उसने अपने मित्र अनुराग को ये बात बताई तो वह उसे लेकर फिर आश्रम गया जहा समीर की बात सुनकर गुरुजी ने कहा आज से, अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो उस दिन इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना.

समीर ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब समीर ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने मित्र अनुराग को ख़ुशी से ये बात बतायी.

कुछ दिनों बाद गुरुजी अनुराग के साथ समीर के घर आये और उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो. अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था.जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं.

गुरुजी के जाने के बाद समीर फिर से बाड़े के पास गया और बाड़े में हुए छेदों पर हाथ फेरने लगा उसे यह महसूस हो रहा था कि मानों ये बाड़े के छेद न होकर लोगों के ह्दय थे जिन्हें उसने अपनी बातों से छलनी कर दिया था. गुरुजी के जाने के बाद समीर फिर से बाड़े के पास गया और बाड़े में हुए छेदों पर हाथ फेरने लगा उसे यह महसूस हो रहा था कि मानों ये बाड़े के छेद न होकर लोगों के ह्दय थे जिन्हें उसने अपनी बातों से छलनी कर दिया था. उसकी आखों मे आसू आ गये थे .समीर ने मन ही मन गुरुजी को धन्यवाद दिया और निश्चय किया कि वो अब क्रोध करके इस बाड़े में और कील नहीं ठोकेंगा.

इसलिए अगली बार आप भी अपना टेम्पर लूज करने से पहले ज़रूर सोचियेगा कि क्या आप भी उस बाड़े में और कीलें ठोकना चाहते हैं!

विजेता

जगदीश सिंघानिया एक सफल बिजनेसमैन होने के साथ-साथ एक बेहतरीन इंसान भी थे। उनका जीवन मेहनत और सेवा की अद्भुत मिसाल था। उन्हें बिजनेस में जो भी लाभ होता उसका एक बडा हिस्सा वे समाज सेवा के कार्यों में खर्च करते थे।

उन्होंने अपने दिवंगत पिता के नाम से एक ट्रस्ट की स्थापना की थी जिसके माध्यम से अनेक अस्पताल, स्कूल कालेज, मंदिर आदि का संचालन होता था। अहंकार तो मानो उन्हें छू भी नहीं गया था पीड़ित मानवता की सेवा व सहायता को मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म मानते थे।

आज उनके ट्रस्ट द्वारा संचालित एक कालेज में वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिसका शीर्षक था ‘प्राणिमात्र की सेवा’ इस प्रतियोगिता में बतौर मुख्य अतिथि जगदीश सिंघानिया को आमंत्रित किया गया था।

प्रतियोगिता समय पर प्रारंभ हुई जिसमें बोलने के लिए कई विद्यार्थी मंच पर आए और एक से बढ़कर एक भाषण देकर भी गए, जब पुरूस्कार देने का समय आया तो सभी निगाहें निर्णायक मंडल की ओर उठ गयीं, सभी को विजेता का बेसब्री से इंतजार था तभी सिंघानिया अचानक अपनी कुर्सी पर से उठे और निर्णायक मंडल के पास जाकर कुछ कहने लगे।

कुछ देर बाद सिंघानिया पुरूस्कार देने मंच पर पहुंचे गए और उन्होंने स्वयं उन्होंने प्रतियोगिता के विजेता के नाम की घोषणा की, उन्होंने प्रतियोगिता का विजेता एक एेसे छात्र को घोषित किया था जो प्रतियोगिता में सम्मिलित ही नहीं हुआ था। यह देखकर प्रतिभागियों और कुछ शिक्षकों में भी रोष के स्वर उठने लगे। उनमें से कुछ मिलीभगत का आरोप भी लगाने लगे।

उन्हें शांत कराते हुए जगदीश सिंघानिया बोले मेरे प्रिय मित्रों एवं विधार्थीयों मुझे पता है कि इस विद्यार्थी के विजेता के रूप में चयन से आप सभी आश्चर्यचकित एवं शंकित हैं परंतु इससे पहले कि आप किसी नतीजे पर पहुंचे मैं आपको बताना चाहता हूं कि आप के कालेज के मुख्य गेट से अंदर आते समय मैने वहां एक कुत्ते को घायल अवस्था में देखा जिसके मुहं से लगातार खून बह रहा था।

हम सभी ने उसी गेट से अंदर प्रवेश किया पर किसी ने भी उस कुत्ते की ओर आंख उठा कर भी नहीं देखा। यही छात्र एकमात्र ऐसा था जिसने बिना प्रतियोगिता की परवाह किए वहां रूककर उस कुत्ते का उपचार किया,उसे पानी पिलाया और उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़कर आया।

सिंघानिया कह रहे थे कि सेवा-सहायता व्याख्यान का विषय नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की कला है। जो अपने व्यवहार और आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, उसका ज्ञान, उसका भाषण कितना भी ओजस्वी क्यूं न हो, उसकी कथनी और करनी में फर्क होता है। एेसा ज्ञान जो व्यवहार और आचरण में न उतर सके वह अधूरा और उधार का ज्ञान होता है और एेसा ज्ञान पुरूस्कार पाने के योग्य नहीं होता है।

सत्य का पता चलते ही असंतुष्ट विधार्थीयों और शिक्षकों की गर्दन शरम से नीची हो गई और वे पुरस्कृत विधार्थी के व्यवहार के प्रति नतमस्तक हो गए। वे समझ चुके थे कि सच्चे अर्थों में विजेता वही है जिसकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है।

आँसू

आँसू भी अभिव्यक्ति का एक माध्यम हैं। ये भावनाओं के अतिरेक को दर्शाते हैं। जब मानवीय संवेदनाएं अपने चरम पर पहुंच जाती हैं तो अपने आप को आंसुओं के माध्यम से अभिव्यक्त करती हैं।

मानवीय बुद्धि तर्क प्रधान और मन भावना प्रधान है। तर्क की भाषा वाणी तो मन की भाषा मौन है जो कि आँसूओं के माध्यम से व्यक्त होती है।

जैसा कि हम समझते हैं पर आँसू अनिवार्य रूप से दुखों का कारण नहीं होते हैं। दुख के अलावा करूणा में, आनंद में, हर्ष के अतिरेक में और कृतज्ञता में भी आंसू बहते हैं।

जब ह्रदय की संवेदनाएं और भावनाएं अपने चरम पर पहुंच जातीं हैं तब खुद को संभाले रहना मुश्किल हो जाता है। जब सुख और दुख की लहरें पूरी ताकत के साथ उफान मारती हैं तो सब्र का बांध टूट जाता है और भीतर जो कुछ है वह आंसू बनकर निकलने लगता है।

आँसूओं का भावनाओं और संवेदनशीलता से गहरा रिश्ता है। जिसके दिल में दूसरों के लिए संवेदना और प्रेम है उसकी आँखों से आँसू उतनी ही जल्दी बहते हैं। कुछ लोगों के दिलों में संवेदनाओं और भावनाओं के प्रति गहरी उदासीनता होती है, एेसे व्यक्तियों का दिल पत्थर का होता है और आखों के आँसू सूख जाते हैं।

आंसुओं का संबंध न तो दुख से है और न सुख से है। इनका रिश्ता तो बस भावनाओं के अतिरेक से है। जब ह्रदय पर कोई चोट पड़ती है, जब कोई अज्ञात भाव मन को छूता है, जब उम्मीद की कोई किरण ह्रदय को स्पर्श करती है तब दिल की गहराईयों में कुछ हलचल सी मचती है जो मन में पीड़ा अथवा आनन्द का तूफान ला देती है तब एेसी भावनाएं संभाले नहीं संभलती हैं और उनकी अभिव्यक्ति आँसूओं के रूप में होती है।