कभी हम पूछ लेंगे ,कभी तुम पूछ लेना

कभी हम पूछ लेंगे ,कभी तुम पूछ लेना

कभी हम चुप रहेंगे, कभी तुम कुछ न कहना,

कभी आएंगी मुश्किलें ,कभी नये सबक भी मिलेंगे

कुछ हम सीख लेंगे, कुछ तुम सीख लेना।

जब चलोगे संग सफ़र पर तब धूप भी मिलेगी,

कहीं हम ठहर लेंगे ,कहीं तुम ठहर लेना,

जब परवान चढ़ेगी मोहब्बत तो सवाल भी उठेंगे,

कहीं हम बोल देंगे ,कहीं तुम बोल देना।

जब बढ़ेंगी बेताबियां तो फिसलन भी बढ़ेगी,

कभी हम थाम लेंगे, कभी तुम थाम लेना

बनके अक्स तेरा अब तुझमें ही रहेंगे,

कभी हम देख लेंगे, कभी तुम देख लेना।

जब दर्पण को देखा तो ऐसा लगा

जब दर्पण को देखा तो ऐसा लगा,

जैसे ख़ुद से मिले एक अरसा हुआ है,

भटकता रहा हूँँ मुसाफ़िरों की तरह से,

जैसे मंजिलों के लिए कोई तरसा हुआ है।

जिदंगी की उलझनों और कशमकश में,

बेमौसम ही कोई बादल बरसा हुआ है,

ना दिखती कहीं है, ना मिलती कहीं है,

क्या दूर मुझसे मेरा कोई हिस्सा हुआ है?

ठोकरेंं भी मिली हैं,नफ़रते भी मिली हैं

अभी खत्म कहाँँ ये किस्सा हुआ है,

किस्मत भी शायद कुछ रूठी हुई है,

दर्पण भी हमसे गुस्सा हुआ है।

जिस्म साथ रहता है, सांसें छूट जाती हैं

जिस्म साथ रहता है, सांसें छूट जाती हैं

यादें साथ रहती हैं, बातें छूट जाती हैं

इस रंग बदलती दुनिया का भरोसा नहीं है

नीव महफ़ूज रहती है,इमारतें टूट जाती हैं।

इश्क में भी उनके गज़ब की कशिश है,

रोता कोई है, आखें किसी की सूज जाती हैं

गहरे पानी के जैसी मोहब्बत है अपनी

वादे याद रहते हैं, कसमें टूट जाती हैं।

बेहोशी की बातों की कोई कीमत नहीं है,

ख़ुमार उतर जाता है, कहानियां छूट जाती हैं

जाना है एक दिन सबको यहां से,

नाम मिट जाता है, निशानियां छूट जाती हैं।

बड़ी मुश्किलों से कोई जिंदगी में फिर आया है

बड़ी मुश्किलों से कोई जिंदगी में फिर आया है,

बड़ी मुश्किलों से रूठे ख़ुदा को फिर मनाया है,

बनके रोशनी मेरी जिंदगी में झिलमिलाना तुम,

बड़ी मुश्किलों से हवाओं में दिया फिर जलाया है।

अगर साफ हो नीयत तो मौके फिर मिल जाते हैं,

कभी बिना शोर के भी बादल बरस जाते हैं,

सूनी आंखों में कोई सपना फिर सजाया है,

बड़ी मुश्किलों से गुमसुम यार को फिर हंसाया है।

कभी यादों के किसी मोड़ पर मिल जाना तुम,

बना के घर मुझे उसी में ठहर जाना तुम,

तिनका-तिनका जोड़कर एक आशियाना बनाया है,

बड़ी मुश्किलों से आखों में आंसूओं को फिर छिपाया है।

कदम-कदम पे जिदंगी में मुश्किलें मिलती हैं,

कभी धोखे कभी साजिशों से दुनिया छलती है,

कभी किस्मत ने कभी मंज़िलों ने बहुत आज़माया है,

बड़ी मुश्किलों से खुद को खोकर तुम्हें फिर पाया है।

बड़ी मुश्किलों से कोई जिंदगी में फिर आया है,

बड़ी मुश्किलों से रूठे ख़ुदा को फिर मनाया है।

कभी इस तरह से कभी उस तरह से

कभी इस तरह से कभी उस तरह से,

कभी तुम मिलो बादलों की तरह से,

नए मौसम की पहली बारिश के जैसी,

मुझमें तुम बहो पानियों की तरह से।

कभी हसरतों में कभी उल्फतों में,

कभी नींद में थपकियों की तरह से,

अगर कभी मैं तुमसे जुदा हो भी जाऊं,

मुझे याद करना हिचकियों की तरह से।

कभी तन्हाईयों में कभी परछाईयों में,

कभी राह चलते मुसाफिरों की तरह से,

तेरा साया बनकर संग तेरे मैं रहूंगा,

मुझे ज़माने में ढूंढ़ लेना मुहाजिरों की तरह से।

हर अधूरी तालाश का कोई मुकाम होना चाहिये

हर अधूरी तालाश का कोई मुकाम होना चाहिये,

हर गहरे दर्द का कोई ईनाम होना चाहिये,

मिल ही जाएगा वो कभी जिसको दिल है ढूंढ़ता,

इस शहर में कहीं उसका भी मकान होना चाहिये।

इस जम़ाने में हर किसी को मंजिलें मयस्सर कहां,

हर नाकाम पहल का भी कोई अंजाम होना चाहिये,

देखो क्या कह रही है बदलते मौसम की ठंडी हवा,

हद से गुज़र जाने पर मुश्किलें भी आसान होनी चाहिये।

बरसों से दिल में ख़ामोश जैसे कोई गहरा राज़ हो छिपा,

लफ्ज़ों से परे आखों की भी कोई ज़ुबान होनी चाहिये,

जहां हर दर्द को दवा मिले हर दुआ को मिले हौसला,

हर शहर में उम्मीद की कोई ऐसी दुकान होनी चाहिये।

जो भी हुआ अच्छा हुआ

जो भी हुआ अच्छा हुआ,

ख़त्म पुराना एक किस्सा हुआ,

जिसमें कभी समाया था वजूद मेरा,

दूर मुझसे आज मेरा वो हिस्सा हुआ।

वो अपनी ही धुन में खोई रही,

कोई बेमतलब ही रूसवा हुआ,

आग और पानी जैसा प्यार था अपना,

किस हक़ से फिर आज वो गुस्सा हुआ।

सूरत को सीरत पर तरजीह मिली,

हुस्न महंगा इश्क सस्ता हुआ,

कैसे मिलता दिल को करार,

ख़ुद से मिले भी एक अरसा हुआ।

मुझमें वो शामिल कुछ इस तरह है

मुझमें वो शामिल कुछ इस तरह है,

वो है जीने का मकसद और वजह है,

दुआ में होकर भी क्यों मिलती नहीं है,

क्या हवा को पता है वो रहती कहां है?

उड़ते बादलों के जैसी फितरत है उसकी,

पल भर में वो यहीं है पल भर में वो वहां है,

मैं भागता हूं उसके पीछे धूप के जैसा,

परछाई के जैसी वो ठहरती कहां है?

मुझमें ढ़ल रही है वो सर्द रातों के जैसी,

बिना धुएं के आग जलती कहां है,

दो सीधी लकीरों जैसी किस्मत है अपनी,

जो साथ दिखती तो हैं पर मिलती कहां है?

तेरे मिलावटी इश्क से तो दिल की दूरियां ही अच्छी हैं

तेरे मिलावटी इश्क से तो ,

दिल की दूरियां ही अच्छी हैं,

इस ज़माने की झूठी तसल्लियों से तो,

मेरी मजबूरियां ही अच्छी हैं।

दर्द को कब परवाह कि तुम कांटा या ग़ुलाब हो,

झूठ की मीठी ख़ुराक से तो,

सच की कड़वी गोलियां ही अच्छी हैं।

हर हमराज़ हमनवा बने ये मुमकिन कहां,

नकाब के पीछे छिपे चेहरों से तो,

पीठ पे छूरियां ही अच्छी हैं।

छूटे हुए तीर को हवाओं का इल्म नहीं,

बेकसूर के शिकार से तो,

हाथ में चूड़ियां ही अच्छी हैं।

हर सवाल का जवाब हो ये कहां लिखा,

बेकार की गलतफहमियों से तो,

उलझी पहेलियां ही अच्छी हैं।

तेरे मिलावटी इश्क से तो,

दिल की दूरियां ही अच्छी हैं,

इस ज़माने की झूठी तसल्लियों से तो,

मेरी मजबूरियां ही अच्छी हैं।

जाते-जाते न जाने क्यूं एक लम्हा ठहर गया

जाते-जाते न जाने क्यूं लम्हा एक ठहर गया,

देकर दर्द जुदाई का न जाने किस शहर गया,

हंसते हैं वो इस तरह से मानो कुछ हुआ ही नहीं,

आग लगी थी कहीं पर, पानी कहीं पर बह गया।

गहरे तजुर्बे दे गये इश्क के वो चार दिन,

आधा भरा था पैमाना, आधा खाली रह गया,

जाते हुए लम्हों मुझ पर कुछ इल्जा़म तो कहो,

कागज़ पे कुछ लिखा था, कुछ अधूरा रह गया।

पता चला है हाल उनके हमसे जुदा नहीं,

आसुओं की बारिश में सारा ख़ुमार बह गया,

हर मोड़ को मज़िल मिले ये मुमकिन कहां,

जख़्म पुराने भर गए, दाग़ दामन पे रह गया।