यादें

एक वो जमाना था
जिसमें खुशियों का ठिकाना था
आसमान छूने की ख्वाईश थी
हर एक सपना सुहाना था।

ना दुनियादारी की बंदिशें थीं
ना दौलत का पैमाना था
बस मिट्टी की खुशबू थी
हर एक दोस्त पुराना था।

मां-पापा की डांट में
प्यार भरा अफसाना था
कागज़ की कश्ती थी
लहरों के उस पार जाना था।

रूठने-मनाने के खेल में
छिपा एक बहाना था
तेज भागती जिंदगी में
दिल बचपन का दीवाना था।

वो हर बात पर इतना उलझते- संभलते क्यों हैं ?

वो हर बात पर इतना उलझते- संभलते क्यों हैं?
 इतना डरते हैं तो फिर मोहब्बत करते क्यों है?
 न पाने की खुशी न खोने का ग़म है,
 वो हर ख्वाईश पे फिर इतना मचलते क्यों हैं?

वक्त की रेत पर पैरों के निशान के मानिंद,
 हर साल फिर मौसम बदलते क्यों हैं?
 जिन्हें डर है दामन पे दाग लग न जाएं,
 वो बारिश में घर से फिर निकलते क्यों हैं?

मुसाफिर ही तो था छोड़कर चला ही गया,
 वो आइना देखकर फिर संवरते क्यों हैं?
 कच्चे धागे सी नाजुक हैं भरोसे की डोरें,
 लोग इसी मुकाम पर आकर फिर फिसलते क्यों हैं?

वो हर बात पर इतना उलझते- संभलते क्यों हैं
 इतना डरते हैं तो फिर मोहब्बत करते क्यों है..

तेरी दुनियादारी से ऊबने लगा हूं मैं..

दुनिया तेरी दुनियादारी से ऊबने लगा हूं मैं,
वो मुझे चांद कहती थी उसी में डूबने लगा हूं मैं,
भटकते रहे उसकी तलाश में शहर-दर-शहर,
हर आईने में उसका अक्स ढूंड़ने लगा हूं मैं।

हर जख्म को दवा मिले ये मुमकिन तो नहीं,
नये दर्द से पुराने दर्द को बदलने लगा हूं मैं,
जो बादल न बरसे तो धरती की क्या ख़ता,
आजकल खुद से ही रूठने लगा हूं मैं।

वो बिखरी है मुझमें बनके खुशबू के मानिंद,
उसके ख्यालों में बसने लगा हूं मैं,
ख्वाबों से मुश्किल होती है हकीकत,
उनसे जुड़कर फिर से टूटने लगा हूं मैं।

खुशियां कम और अरमान बहुत हैं

खुशियां कम और अरमान बहुत हैं

इस शहर में हर कोई परेशान बहुत है

करीब जाकर देखा तो मिलीं उनमें भी कमियां

दूर से तो उसकी शख्शियत आलीशान बहुत है।

कहने को तो नहीं है सच का कोई मुकाबला

लेकिन आज की दुनिया में झूठ की जान-पहचान बहुत है

जरुरत पड़ी उन्हें तो हर शख्श मुकर गया

कहने को तो इस शहर में उनके कद्रदान बहुत हैं।

मुमकिन है वक्त मिटा दे यादों को उनकी

लेकिन कैसे भुला दें उनको जिसके मुझ पर अहसान बहुत हैं

मुश्किल से मिलता है वो जिसे कह सकें हमारा

वैसे तो इस शहर में इन्सान बहुत हैं।

सुना था मिलती हैं मोहब्त के बदले मोहब्तें

जब मेरी बारी आयी तो यें जम़ाना क्यों हैरान बहुत है

जिस शहर में था इश्क का आशियाना

उस शहर में पत्थर के ख़रीदार बहुत हैं।

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा…

यादों की थोड़ी सी मिट्टी लेकर ,

आज उनसे दो अक्स बनाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

आज यारों की महफिल में,

फिर से कुछ रंग जमाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

फिर तोड़कर उन चेहरों को,

उनसे फिर दो शख्श बनाना,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

ताकि तुम में कुछ-कुछ मैं रह जाऊँ,

और मुझ में कुछ-कुछ तुम रह जाओ,

कुछ तुम जैसा, कुछ मुझ जैसा।

आज फिर से पुरानी तस्वीर लेकर,

साथ में कुछ तो वक्त बिताना,

कुछ तुम जैसा कुछ मुझ जैसा।

ताकि तुम में कुछ-कुछ मैं रह जाऊँ,

और मुझ में कुछ-कुछ तुम रह जाओ….

बिना मंज़िल का सफ़र

वो बिना मंजिल के सफर पे था,
वो नाकाम होकर भी किसी की नज़र में था,
अनजानी सी ख्वाईशों से थी उसकी यारियां,
न जाने वो किसके असर में था।

बातों में उसकी थी दुनियादारी की कमी,
वो अपनी ही मौजों की लहर में था,
किसे सुनाता वो अपने चंद पन्नों के ग़म,
पता चला वो तो बुतों के शहर में था।

करता था वो उसकी हर बातों पर यकीं,
न जाने वो किस वहम में था,
कहने को तो छोड़ दिया था उसने भी उसे,
पर वो चेहरा आज भी उसके ज़हन में था।

खो गया था बिखेरकर खुशबू दिशाओं में सभी,
वो गुलाब जो कभी उसके चमन में था,
वो सोया ऐसे कि फिर सहर न हुई,
जिस्म लिपटा हुआ सफेद क़फन में था।

वो बिना मंजिल के सफर पे था
वो नाकाम होकर भी किसी की नज़र में था…

सुना है वो हमको भुलाने लगे हैं….

सुना है वो हमको भुलाने लगे हैं,
जिनको पाने में हमको ज़माने लगे हैं,
वो उलझी सी बातें,वो धुंधले से चेहरे,
सपनों में फिर से आने-जाने लगे हैं।

पकड़कर उंगली जिन्हें चलना सिखाया,
वो रिश्ते ही हमें आज आजमाने लगे हैं,
छोड़ आए थे जिनको हम मंजिल के खातिर,
वो रास्ते फिर से हमें बुलाने लगे हैं।

थक गए थे हम बातों में मिलावट से लेकिन,
वो फिर से हमें मनाने लगे हैं,
पास से न सही, दूर से ही सही,
वो हमें देखकर मुस्कुराने लगे हैं।

क्या बात है, क्यों बदली सी फिज़ा है?
वो नज़रों से नज़रें मिलाने लगे हैं,
जो न सीखे थे जिंदगी में झुकना कभी,
वो सजदे पर सिर झुकाने लगे हैं।