रास्तों का मैं मुसाफिर हूँ…

रास्तों का मैं मुसाफिर हूँ,

मँज़िलो पे नहीं रूकता,

मँज़िले दग़ा किया करती हैं,

कभी रास्ता नहीं मुकरता।

ये जरूरी नहीं है,

हर बात की वजह हो,

कभी परछाई नहीं है दिखती,

कभी चाँद नहीं निकलता।

हद से गुज़रने की कीमत,

हर बार चुकानी पड़ती है,

सिर्फ़ दर्द सहने से,

नसीब नहीं बदलता।

बातों के भी इस दुनिया में,

होते हैं कई मतलब,

आईना बदलने से,

रकीब नहीं बदलता।

सपनों को जीने के लिए,

नासमझ होना पड़ता है,

समझदारों की दुनिया में,

कोई दिल की नहीं सुनता।

आम हो गई है,

जो ख़ास थी कहानी,

मन की रेत पर अब,

सिर्फ़ तेरा निशान नहीं मिलता…

© abhishek trehan

पहले ख़ुद को लुटाया था…

पहले ख़ुद को लुटाया था,

अब आदत बना ली है,

पहले इश्क चुभता था,

अब इबादत बना ली है।

मिले हैं जख़्म कहाँ से,

अब इसका नहीं है मतलब,

पहले पेड़ कट गया था,

अब कश्ती बना ली है।

जिंदगी से हर कदम पर,

शिकायत यही रही है,

पहले जवाब नहीं मिले थे,

अब शर्तें बढ़ा ली है।

माना थी रात गहरी,

हम फिर भी चल रहे थे,

पहले रास्ता नहीं पता था,

अब गिरकर संभल रहे हैं।

कुछ कोशिशों में कमी थी,

कुछ लकीरों से मलाल है,

खोना नहीं था तुमको,

पाने का नहीं सवाल है।

पहले कुछ नहीं लिखा था,

अब डायरी बना ली है,

पहले तजुर्बे कम मिले थे,

अब शायरी बना ली है…

© abhishek trehan

जुबां को खामोश रखा था…

जुबां को खामोश रखा था,

आँखो से बयां हो गया,

दोनो बराबर ज़िद्दी थे,

इश्क आसान हो गया।

फ़ना होने की इजाज़त थी,

जीने का इंतज़ाम हो गया,

मौसम ने करवट बदली थी,

दिल उनपे मेहरबान हो गया।

डोर से डोर जब जुड़ने लगी,

दूर हर ग़ुमान हो गया,

कल तक जो मेरा हिस्सा था,

किसी और का आसमान हो गया।

ना पाने की बेचैनी थी,

ना खोने का बहाना था,

डूबना ही बस मकसद था,

ख़ुद को ख़ुद से आज़माना था।

अजीब सा कोई रिश्ता था,

अजीब सा कोई फ़साना था,

दिल में तलब उसकी उठती थी,

अपना मुकाम भी बनाना था।

अब दूर बहुत हम आ चुके,

वो किस्सा बहुत पुराना था,

किसी की यादें तंग कर रहीं

नींद का तो बस बहाना था…

© abhishek trehan

उन्हें शिकायत बहुत थी हमसे…

उन्हें शिकायत बहुत थी हमसे,

अब ख़ुद से शिकायत हो गई है,

पहले नफ़रत करने की ज़िद थी,

अब नफ़रत भी इबादत हो गई है।

उन्हें कितनी मोहब्बत थी हमसे,

अब कितनी सआदत हो गई है,

पहले साया भी मंज़ूर नहीं था,

अब अँधेरों की आदत हो गई है।

चेहरा तो अब भी वही है,

शायद सीरत बदल गई है,

पहले फ़ासलों की बहुत तलब थी,

अब नज़दीकियों से रिवायत हो गई है।

कुछ रूह में उतर गया था,

कुछ दिल में रह गया है,

कुछ ख्वाहिशें पूरी हुई हैं,

कुछ मलाल रह गया है।

बंजर नहीं है आँखें,

अभी बाकी कुछ नमी है,

पुरानी चोट भर गई है,

बाकी निशान रह गया है।

पहले इजाज़त नहीं मिली थी,

अब नज़रें मिल रही हैं,

पहले चाँद से इश्क हुआ था,

अब शिकायत चल रही है…

© abhishek trehan

उनसे ये कहना वाजिब नहीं है…

उनसे ये कहना,

वाजिब नहीं है,

चाँद से भी ज्यादा,

प्यारे लग रहे हो।

उनसे अब कहना,

मुनासिब यही है,

जैसे भी हो,

बस हमारे लग रहे हो।

हज़ारों मुश्किलें हैं,

मीलों के फ़ासले हैं,

अंबर में टिमटिमाते,

सितारे लग रहे हो।

शाम ढ़ल चुकी है,

रात चल रही है,

अँधेरों में उम्मीदों के,

सहारे लग रहे हो।

आँखों में सपने हैं,

सपनों की दुनिया है,

दुनिया के सपनों में,

मँज़िलों के किनारे लग रहे हो।

वक्त ठहर गया है,

ज़िदंगी बदल गई है,

इस बदलते हुए मौसम में,

तुम हमारे लग रहे हो…

© abhishek trehan

माँ…

जब जिक्र तेरा हुआ होगा
सजदे पे कोई झुका होगा
जहां पांव तेरे पड़े होंगे
वो मकान घर बना होगा

वो कितनी बार जगी होगी
जब चैन से तू सोया होगा
वो कितनी बार उठी होगी
जब रात में तू रोया होगा

रोकर भी दुआ दी होगी
जब तूने दिल उसका तोड़ा होगा
वो टूटकर फिर बिखरी होगी
जब तूने घर उसका छोड़ा होगा

देकर आँसू उसकी आँखों में
तू बाहर पत्थरों में खोया होगा
देख कर तेरी नासमझी को
ख़ुदा भी तुझ पर रोया होगा…
© abhishek trehan

तुम अगर साथ होते तो कुछ और बात होती…

तुम अगर साथ होते,

तो कुछ और बात होती,

ना दिन कभी ढ़लता,

ना ख़त्म रात होती।

ना ख़्वाब कोई अधूरा,

हमें तंग करता,

ना दिल कभी भरता,

ना ख़त्म बात होती।

आँखों में तेरा चेहरा,

दिल में उम्मीद तेरी होती,

मैं अंजाम बनता,

तुम शुरूआत होती।

कुछ सिलसिले शुरू होकर,

फिर ख़त्म नहीं होते,

कभी मौसम बदलते,

कभी बरसात होती।

तुम हवा में महकती,

मैं ख़ुशबू तेरी होता,

तारों की चादर तले,

अपनी मुलाकात होती।

तेरे संग फिर सफ़र की,

कोई हद नहीं होती,

मैं गीत कोई लिखता,

तुम अल्फाज़ होती…

© abhishek trehan

मिसाल बन गई वो ज़माने के लिए…

मिसाल बन गई वो,

ज़माने के लिए,

जब परवाह दुनिया की छोड़कर,

निकली वो कमाने के लिए।

चेहरे की चमक छोड़ दो,

उसकी हथेलियों को तुम पढ़ो,

लकीरें ने भी ख़ुद को बदल लिया,

साथ उसका निभाने के लिए।

ख्वाबों की फिक्र ने बढ़ा दिये,

अपनों से फ़ासले,

दूरियां भी कम पड़ गई,

हौसला आज़माने के लिए।

दर्द भी जो मिले थे,

काम औरों के आ गए,

आँसू भी जहां गिरे,

अँधेरों को खा गए।

चुप थी जब तलक वो,

दुनिया ने पत्थर समझ लिया,

साबित कर दिया जब खुद को,

लोगों ने नश्तर समझ लिया।

कभी परवाह नहीं की है,

ज़माने ने ख़ाक की,

हवा में ख़ुशबू बनकर वो बिखर गई

जो वजह थी राख की…

© abhishek trehan

उठती नहीं निगाह अब किसी और की तरफ़…

उठती नहीं निगाह अब,

किसी और की तरफ़,

पाबंद कर गई है मुझे,

कोई नज़र इस कदर।

होकर भी दूर हमसे,

दूर वो लगती क्यूं नहीं,

मिलती भी वो कहां है,

जिसे ढूंढू मैं दर-ब-दर।

वो रात की शायरी है,

मैं सुबह की हूं गज़ल,

वो लफ़्ज़ों की झील गहरी,

मैं उस झील का कमल।

अंजाम भी वही है,

सरंजाम भी वही है,

वो ओस है सुबह की,

मैं प्यासा सा हूं शजर।

कोई आहट भी नहीं है,

कोई सरसराहट भी नहीं है,

आईने को भी शायद,

किसी की लग गई है नज़र।

सबकुछ मिल गया है,

बस कुछ रह गया है,

वो मेरा ही है हिस्सा,

जिससे मैं हूं बेख़बर…

*शजर- पेड़,वृक्ष

© abhishek trehan

वो रोश्नी से बनी थी,रफ़्ता-रफ़्ता ख़त्म हो गई..

वो रोश्नी से बनी थी,

रफ़्ता-रफ़्ता ख़त्म हो गई,

मैं अंधेरों से बना था,

बेवजह बरकरार रह गया।

वो मोम सी नाज़ुक थी,

पिघलकर फिर से जुड़ गई,

मैं पत्थर सा कड़ा था,

टूटकर कर्ज़दार हो गया।

वो गुड़ की डली थी,

सबकी ज़ुबां पर चढ़ गई,

मैं सच का सबब था,

गुनाहगार हो गया।

परछाई बनकर चल रहा था,

किसी को ख़बर नहीं हुई,

एक ठोकर क्या लगी,

मैं अख़बार हो गया।

वो मौजूद था मेरे अंदर,

कभी पता नहीं चला,

वो तारा क्या बना,

इश्क बेशुमार हो गया।

उसने चाहत में डूबने की,

कभी परवाह नहीं की,

मैं दिल की गहराईयों में उतरकर,

ख़रीदार हो गया…

© abhishek trehan