चुपके से रात आती है…

चुपके से रात आती है,

सोए दर्द जगाती है,

तन्हाई की धुन बजती है,

पानी में आग लगाती है।

वही गलती फिर मैं करता हूं,

यादों के चेहरे पढ़ता हूं,

रात की दहलीज़ पर पलकें बिछाकर,

इंतज़ार सुबह का करता हूं।

नींद से नहीं कोई शिकवा है,

पुरानी बातें हमें जगाती हैं,

बिस्तर बुलाता रहता है,

रात कुर्सी पे गुज़र जाती है।

जिसने हमको ये रोग दिया,

उसने जाने क्या सोच लिया,

पहले चोट लगी फिर दर्द बढ़ा,

फिर ख़ुद को उसने रोक लिया।

कुछ बूँदें आँखों से छलकती हैं,

कुछ बिन बरसे रह जाती हैं,

संग वक्त के कुछ जख़्म भर जाते हैं,

कुछ लकीरें दिल पे रह जाती हैं।

सूरज भी रोज़ निकलता है,

ज़िदंगी भी रोज़ आज़माती है,

दिमाग दिन के संग चलता है,

रात दिल का साथ निभाती है…

© abhishek trehan

उदास कर रही है कोई वजह धीरे-धीरे…

उदास कर रही है,

कोई वजह धीरे-धीरे,

मुझमें शाम ढ़ल रही है,

बेवजह धीरे-धीरे।

मायूस होकर क्यूँ,

हवा चल रही है,

ये किसको ख़बर है,

वो खफ़ा चल रही है।

कैसे कहें हम,

ये कैसे बताएँ,

ज़िंदगी नाराज़ हमसे,

कौन पहली दफ़ा चल रही है।

पता नहीं है,

होश में आँए, न आँए

पलकें थकने लगीं हैं,

अल-सुबह धीरे-धीरे।

यूँ गुमसुम न बैठो,

चलो फिर से मुस्कुराएँ,

रात होने लगी है,

फिर जवाँ धीरे-धीरे।

दो पल मिले थे,

दो पल बचे हैं,

चलो कुछ लिखें,कुछ मिटाएँ

इस दफ़ा धीरे-धीरे…

© abhishek trehan

ज़िदगी तू अब हमें गिरकर फिर सम्हलने दे…

ज़िदगी तू अब हमें,

गिरकर फिर सम्हलने दे,

खिलौना ना भी दे तो सही,

दिल में हसरतें तो मचलने दे।

सुनते रहे हम वो उम्र भर,

जो तुमने कभी कहा नहीं,

बहुत दूर हम निकल गए,

दिल मगर भरा नहीं।

बेशक कमियां हममें बहुत हैं,

ग़ौर ख़ूबियों पर कभी किया नहीं,

ढूंढ़ते रहे हम अपना अक्स वहां,

जहां दिया कभी जला नहीं।

शहर बहुत बदल लिये,

बदल गए हालात भी,

भागते परछाई के पीछे हम रहे,

वक्त कभी रूका नहीं।

वक्त ने पुराने दर्द का,

इलाज कुछ यूं किया,

ज़ख्म पुराना भर गया,

निशान नया मिल गया।

कह रही है अब ज़िंदगी,

ख़ुद को जरा सम्हाल लो,

जवाब ना भी दे तो सही,

हमें सवाल तो बदलने दे…

© abhishek trehan

जब दर्पण को देखा तो ऐसा लगा…

जब दर्पण को देखा,

तो ऐसा लगा,

जैसे ख़ुद से मिले,

एक अरसा हुआ है।

भटकता रहा हूँ,

मुसाफ़िरों की तरह से,

जैसे मंजिलों के लिए,

कोई तरसा हुआ है।

जिदंगी की उलझनों,

और कशमकश में,

बेमौसम ही कोई,

बादल बरसा हुआ है।

ना दिखती कहीं है,

ना मिलती कहीं है,

क्या दूर मुझसे

मेरा कोई हिस्सा हुआ है।

ठोकरें भी मिली हैं,

नफ़रते भी मिली हैं,

अभी खत्म कहाँ,

ये किस्सा हुआ है,

किस्मत भी शायद,

कुछ रूठी हुई है,

दर्पण भी हमसे,

गुस्सा हुआ है…

© abhishek trehan

दुनिया से छुप-छुपकर ही सही….

दुनिया से छुप-छुपकर ही सही

थोड़ा ख़ुद के लिए भी जिया करो

किसी को तेरी फिक्र नहीं

अपनी परवाह ख़ुद किया करो

एक दूसरों की ख़िदमत के सिवा

दुनिया में और भी काम हैं

कुछ ख्वाहिशें सीने में दफ़न हैं

कुछ पल उन्हें भी दिया करो

हँसते रहे तुम हर दफ़ा

शिकवा कभी किया नहीं

हर बार मन मसोस लिया

कभी किसी से कुछ कहा नहीं

कह रही है ज़िदंगी

ख़ुद को जरा सम्हाल लो

दूसरों के लिए बहुत जी लिए

थोड़ा ख़ुद के लिए भी जिया करो

साँसे खर्च हो रहीं

पाबंद ज़िदंगी का हिसाब है

वक्त बहुत कम है

कोरी सपनों की अभी किताब है

एक जनम काफ़ी नही

हर जनम में तुम मिला करो

मैं तुम्हारा कर्ज़दार हूं

इस कर्ज़ से मुझे रिहा करो…

© abhishek trehan

चुपके से रात आती है…


चुपके से रात आती है,

सोए दर्द जगाती है,

तन्हाई की धुन बजती है,

पानी में आग लगाती है।

वही गलती फिर मैं करता हूं,

यादों के चेहरे पढ़ता हूं

रात की दहलीज़ पर पलकें बिछाकर

इंतज़ार सुबह का करता हूं।

नींद से नहीं कोई शिकवा है,

पुरानी बातें हमें जगाती हैं,

बिस्तर बुलाता रहता है,

रात कुर्सी पे गुज़र जाती है।

जिसने हमको ये रोग दिया,

उसने जाने क्या सोच लिया,

पहले चोट लगी फिर दर्द बढ़ा,

फिर ख़ुद को उसने रोक लिया।

कुछ बूँदें आँखों से छलकती हैं,

कुछ बिन बरसे रह जाती हैं,

संग वक्त के कुछ जख़्म भर जाते हैं,

कुछ लकीरें दिल पे रह जाती हैं।

सूरज भी रोज़ निकल रहा है,

ज़िदंगी भी रोज़ आज़माती है,

दिमाग दिन के संग चलता है,

रात दिल का साथ निभाती है…

© abhishek trehan

दूर अब बहुत आ चुका हूं मैं…

दूर अब बहुत,

आ चुका हूं मैं,

रात को भी दिन,

बता चुका हूं मैं।

हादसे लेकिन अभी,

ख़त्म कहां हुए,

हादसों को भी आदत,

बना चुका हूं मैं।

कहाँ से लाऊँ लफ़्ज़ वो,

जो तुम्हें सुनाई दे,

पलकों को तुम मूंद लो,

शायद सच दिखाई दे।

पहले तो बस चाहत थी,

अब मजबूरी हो गई है,

तेरे इश्क की तलब क्या लगी,

ज़िदंगी जरूरी हो गई है।

उन्हें हमारी फिक्र नहीं,

मैं शुक्रगुज़ार हूं,

रिश्तों की आंच में हाथ बहुत,

जला चुका हूं मैं।

ये बस दिल जानता है,

या जानता हूं मैं,

हमने तुम्हें खोया है,

या खुद को पा चुका हूं मैं…

© abhishek trehan

रास्तों का मैं मुसाफिर हूँ…

रास्तों का मैं मुसाफिर हूँ,

मँज़िलो पे नहीं रूकता,

मँज़िले दग़ा किया करती हैं,

कभी रास्ता नहीं मुकरता।

ये जरूरी नहीं है,

हर बात की वजह हो,

कभी परछाई नहीं है दिखती,

कभी चाँद नहीं निकलता।

हद से गुज़रने की कीमत,

हर बार चुकानी पड़ती है,

सिर्फ़ दर्द सहने से,

नसीब नहीं बदलता।

बातों के भी इस दुनिया में,

होते हैं कई मतलब,

आईना बदलने से,

रकीब नहीं बदलता।

सपनों को जीने के लिए,

नासमझ होना पड़ता है,

समझदारों की दुनिया में,

कोई दिल की नहीं सुनता।

आम हो गई है,

जो ख़ास थी कहानी,

मन की रेत पर अब,

सिर्फ़ तेरा निशान नहीं मिलता…

© abhishek trehan

पहले ख़ुद को लुटाया था…

पहले ख़ुद को लुटाया था,

अब आदत बना ली है,

पहले इश्क चुभता था,

अब इबादत बना ली है।

मिले हैं जख़्म कहाँ से,

अब इसका नहीं है मतलब,

पहले पेड़ कट गया था,

अब कश्ती बना ली है।

जिंदगी से हर कदम पर,

शिकायत यही रही है,

पहले जवाब नहीं मिले थे,

अब शर्तें बढ़ा ली है।

माना थी रात गहरी,

हम फिर भी चल रहे थे,

पहले रास्ता नहीं पता था,

अब गिरकर संभल रहे हैं।

कुछ कोशिशों में कमी थी,

कुछ लकीरों से मलाल है,

खोना नहीं था तुमको,

पाने का नहीं सवाल है।

पहले कुछ नहीं लिखा था,

अब डायरी बना ली है,

पहले तजुर्बे कम मिले थे,

अब शायरी बना ली है…

© abhishek trehan