बड़ी मासूम है वो सूरत…

sea sunny beach sand
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बड़ी मासूम सी है सूरत
बड़ा मासूम है वो चेहरा
सपनों को है सच समझती
उसका हर ख्वाब है सुनहरा

खुश्बू सी महकती है
सारे घर में चहकती है
मेरी आवाज़ से मेरे मन को
वो न जाने कैसे परखती है

आई है बनके किस्मत
करने दूर सब अँधेरा
बेटी है रहमत खुदा की
और खुशियों का नया सवेरा

आँखें हैं उसकी हँसती
बातों में खुशियाँ हैं बसती
सस्ते है दर्द सारे
सलामत रहे घर ये मेरा

आती है जब भी मुश्किल
वो थामती है हाथ मेरा
नन्हीं ऊँगलियों ने लिख दिया है
खुशियों का नया बसेरा

करता हूँ तेरा शुक्राना
ख़ुदा कर्ज़दार हूँ मैं तेरा
दुनिया मागँती है चाँद-तारे
मैं माँगू बस उसका चेहरा…
© trehan abhishek

लोग रखते हैं कैद सीने मे…

woman shaping heart with hands
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लोग रखते हैं,

कैद सीने में,

हमने सिर पर,

चढ़ा लिया है।

वो कहते हैं,

इश्क में सब जायज़ है,

हमने अपना,

दायरा बढ़ा लिया है।

अगर मिलो तो,

तुमसे कह दें,

जो न मिलो तो,

महसूस करना।

चाँद निकले,

तो हाँ समझना,

ना निकले,

तो समझो पहरा बढ़ा दिया है।

दोस्ती हो या बंधन,

साथ तुम निभाना,

हाथों में हाथ लिया है,

रिश्ता गहरा बना लिया है।

अपनी यादों की तहों में,

हमें तुम छुपा लो,

वक्त ने अँगुलियों से,

नया चेहरा बना लिया है…

© abhishek trehan

माना वो आवारा था…

मन…

ठहर जा रे मना,

क्यूँ भागे है चहुँ-दिशा,चहुँ-ओर,

मुँडेर पर पहरा बैठा दिया,

कहाँ थमा है,मन का शोर।

तन को तन से बाँध दिया,

मन को बाँध सके ना कोई डोर,

कच्चे दुनिया के सब धागे हैं,

बस गाँठें हैं हर ओर।

मैं आज,तुम कल हुई,

जैसे लहरें बाँटे नदी के दो छोर,

पल दो पल का है फासला,

दरम्यां फैला अँधेरा है घनघोर।

आँखों से आँखें यूँ उलझ गई,

जैसे पतंग से उलझे डोर,

हलचल सी दिल में मच गई,

जैसे दरिया में उठे हिलोर।

जब बोध हुआ तब ख़बर हुई,

बीत गया वो दौर,

रेत थी मुट्ठी से फिसल गई,

मिला ना कोई ठौर।

ज़िदंगी लगी है दांव पर,

बाज़ी पे नहीं है कोई जोर,

रूद्र तो मेरा भोला है,

विधि का विधान है बहुत कठोर…

© abhishek trehan

ज़िदंगी गुज़र रही है…

ज़िदंगी गुज़र रही है,

सब किरदार निभा रहे हैं,

सच का नहीं कोई पता है,

लोग बातें बना रहे हैं।

कोई कहता है सच नशा है,

कोई कहता है सच सज़ा है,

जिनको अपनी ख़बर नहीं है,

सच उनके लिए हवा है।

रातों का ख्वाब कह लो,

या दिल का अरमान बना लो,

बदलता सच नहीं है,

दूसरा तरीका तुम आज़मा लो।

दूर कहीं पर शायद,

एक दिया जल रहा है,

हवाएं नज़र रख रही हैं

थोड़ा अँधेरा पिघल रहा है।

कुछ ख़ुद पर बीत रही है,

कुछ दूसरों को परख़ रहे हैं,

हकीकत सिर्फ वही नहीं है,

जो लोग समझ रहे हैं।

जो बुझ रही है आग सीने में,

उसे क्या फिर से मैं जला लूँ

लोग सच का पता पूछते हैं

क्या आईना उन्हें दिखा दूँ…

© abhishek trehan

जिक्र तेरा अपने लफ्ज़ों में हर बार करूँगा…

जिक्र तेरा अपने लफ्ज़ों में

हर बार करूँगा

कभी सुबह करूँगा

कभी शाम करूँगा

शौक तो नहीं है

जज़्बातों की नुमाईश का हमें

तुम्हें जो पसंद है

उसी जरिये से बात करूँगा

रूह तो रंगी थी

अब शब्दों को भी रंग लिया है

कभी ख्वाबों में भी मिले तो

इश्क बेशुमार करूँगा

सुकून सा मिलता है

तुम्हें सोचने से भी हमें

तुम्हें ही गँवाया था

तुम्हें ही आबाद करूँगा

जरूरी नहीं है इश्क मेरा

तुम्हें दिखाई दे

तुम हाथ दिल पे रखना

मैं आवाज करूँगा

आदत लगी है तुम्हारी

पता है ख़ुदा तुम नहीं हो

सलामत रहे दुनिया तुम्हारी

यही फ़रियाद करूँगा…

© abhishek trehan

गुज़र गया है आज भी…

गुज़र गया है आज भी…

गुज़र गया है आज भी,

यूँ ही बेवजह ही,

ना ही पुराना फिर हुआ,

ना ही हुआ कुछ नया ही।

मायूस हैं क्यूँ लम्हे,

बेबस है क्यूँ निगाहें,

ढूंढ़ती है जिसको मँज़िलें,

वो कहाँ मिला ही।

ये ज़िदंगी धूप में जलकर,

बेज़ार हो रही है,

टुकड़ों-टुकड़ों में बंटकर,

ख़ुशियाँ हजार हो रही हैं।

दिल में कोई कसक है,

कोई खुमारी छा रही है,

लफ्ज़ों की जरूरत नहीं है,

ख़ामोशियाँ शोर मचा रही हैं।

सच को है सबने देखा,

पर रास नहीं आया,

तुम्हें झूठ का पता था,

फिर दिल से क्यूँ लगाया।

कोशिशें बहुत की हैं,

पर मिला कुछ कहाँ ही,

ना ही रात हमें मिली,

ना ही हिस्से में आई सुबह ही…

© abhishek trehan

चुपके से रात आती है…

चुपके से रात आती है,

सोए दर्द जगाती है,

तन्हाई की धुन बजती है,

पानी में आग लगाती है।

वही गलती फिर मैं करता हूं,

यादों के चेहरे पढ़ता हूं,

रात की दहलीज़ पर पलकें बिछाकर,

इंतज़ार सुबह का करता हूं।

नींद से नहीं कोई शिकवा है,

पुरानी बातें हमें जगाती हैं,

बिस्तर बुलाता रहता है,

रात कुर्सी पे गुज़र जाती है।

जिसने हमको ये रोग दिया,

उसने जाने क्या सोच लिया,

पहले चोट लगी फिर दर्द बढ़ा,

फिर ख़ुद को उसने रोक लिया।

कुछ बूँदें आँखों से छलकती हैं,

कुछ बिन बरसे रह जाती हैं,

संग वक्त के कुछ जख़्म भर जाते हैं,

कुछ लकीरें दिल पे रह जाती हैं।

सूरज भी रोज़ निकलता है,

ज़िदंगी भी रोज़ आज़माती है,

दिमाग दिन के संग चलता है,

रात दिल का साथ निभाती है…

© abhishek trehan

उदास कर रही है कोई वजह धीरे-धीरे…

उदास कर रही है,

कोई वजह धीरे-धीरे,

मुझमें शाम ढ़ल रही है,

बेवजह धीरे-धीरे।

मायूस होकर क्यूँ,

हवा चल रही है,

ये किसको ख़बर है,

वो खफ़ा चल रही है।

कैसे कहें हम,

ये कैसे बताएँ,

ज़िंदगी नाराज़ हमसे,

कौन पहली दफ़ा चल रही है।

पता नहीं है,

होश में आँए, न आँए

पलकें थकने लगीं हैं,

अल-सुबह धीरे-धीरे।

यूँ गुमसुम न बैठो,

चलो फिर से मुस्कुराएँ,

रात होने लगी है,

फिर जवाँ धीरे-धीरे।

दो पल मिले थे,

दो पल बचे हैं,

चलो कुछ लिखें,कुछ मिटाएँ

इस दफ़ा धीरे-धीरे…

© abhishek trehan

ज़िदगी तू अब हमें गिरकर फिर सम्हलने दे…

ज़िदगी तू अब हमें,

गिरकर फिर सम्हलने दे,

खिलौना ना भी दे तो सही,

दिल में हसरतें तो मचलने दे।

सुनते रहे हम वो उम्र भर,

जो तुमने कभी कहा नहीं,

बहुत दूर हम निकल गए,

दिल मगर भरा नहीं।

बेशक कमियां हममें बहुत हैं,

ग़ौर ख़ूबियों पर कभी किया नहीं,

ढूंढ़ते रहे हम अपना अक्स वहां,

जहां दिया कभी जला नहीं।

शहर बहुत बदल लिये,

बदल गए हालात भी,

भागते परछाई के पीछे हम रहे,

वक्त कभी रूका नहीं।

वक्त ने पुराने दर्द का,

इलाज कुछ यूं किया,

ज़ख्म पुराना भर गया,

निशान नया मिल गया।

कह रही है अब ज़िंदगी,

ख़ुद को जरा सम्हाल लो,

जवाब ना भी दे तो सही,

हमें सवाल तो बदलने दे…

© abhishek trehan