दूसरों के दर्द को बांटना ही संवेदना है

जीवन में संवेदनाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। यह संवेदना ही है जो इंसान और मशीन में फर्क करती हैं। आज एेसे बहुत से इंसानी काम हैं जो आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के माध्यम से रोबोट कर सकते हैं। बस यह संवेदनाएं ही हैं जो अभी तक विज्ञान और मशीन के परे हैं।

संवेदनशीलता यानि, दूसरों के दुःख-दर्द को समझना, अनुभव करना और उनके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।

वह जेठ के महीने की एक दोपहर थी जब अविनाश जो कि कस्बे के डाकघर में पोस्टमैन था ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,चिट्ठी ले लीजिये। अंदर से एक लड़की की आवाज आई,आ रही हूँ। लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो अविनाश ने फिर जोर से आवाज लगाकर कहा,अरे भाई! मकान में कोई है क्या, अपनी चिट्ठी ले लो। तपती दोपहर की गर्मी ने अविनाश को कुछ बेचैन कर दिया था।

लड़की ने अंदर से ही उत्तर दिया,पोस्टमैन साहब, दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ। अविनाश ने सोचा लगता है कि इस लड़की को दूसरे की समस्या से कोई लेना-देना नहीं है तभी बार -बार पुकारने पर भी यह जल्दी नहीं आ रही है फिर भी उसने खुद को संभाला और कहा,नहीं, मैं खड़ा हूँ, रजिस्टर्ड चिट्ठी है,रसीद पर तुम्हारे साइन चाहिये। करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। अविनाश इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही, लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज लड़की जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी।

अविनाश अपनी सोच पर शर्मिंदा हुआ और चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। इसके बाद में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, अविनाश एक आवाज देता और जब तक वह लड़की न आ जाती तब तक खड़ा रहता। उस लड़की का नाम आरूषि था। एक दिन अविनाश आरूषि की डाक लेकर आया था तभी आरूषि ने देखा कि अविनाश के पांवों की चप्पलें टूट गई हैं, उसने सोचा कि बिना टूटी चप्पलें पहन कर घर घर जा कर डाक बांटने में अविनाश को कितनी तकलीफ होती होगी। दीपावली नजदीक आ रही थी वह सोच रही थी कि पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ।

उस दिन जब अविनाश डाक देकर चला गया, तब उस आरूषि ने, जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये।

दीपावली के कुछ दिन बाद अविनाश आरूषि की डाक लेकर आया उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई,कौन? पोस्टमैन, उत्तर मिला। आरूषि हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,अंकल, मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह गिफ्ट है। आरूषि ने कहा,अंकल प्लीज़ इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना। बिटिया को मना करके अविनाश उसके दिल को तोड़ना नहीं चाहता था। उसने अनमने भाव से लड़की के हाथ से पैकेट लिया और ठंडा शुक्रिया देकर चला गया।

घर जाकर जब अविनाश ने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे। साथ ही एक पत्र भी था जिसमें सुन्दर हैंडराइटिंग में लिखा था ” एक छोटी सी भेंट उन पैरों के लिए जिनको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है”। उसकी आखों में आंसू आ गए। अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए।

पोस्टमास्टर ने कारण पूछा,तो अविनाश ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,” सर आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?”

पोस्टमास्टर भला व्यक्ति था उसने कहा अविनाश ईश्वर से प्रार्थना है कि वह बिटिया जहां रहे यू हीं खुशियां बिखेरती रहे। वह ईश्वर हमें भी संवेदनाओं से भरा मन प्रदान करे ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें। संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है,अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है। अपनी बात खत्म करते हुए पोस्टमास्टर ने कहा अविनाश ईश्वर ढूंढने से कही नहीं मिलता वह एेसे ही किसी रूप में हमारे सामने आ जाता है और अहसास करा जाता है अपने होने का, वास्तव में जीना इसी का नाम है।

इंसानियत

डाक्टर अभिनव का कोलकाता में बड़ा नाम था. वह ह्रदय रोग विशेषज्ञ थे. वे बेहद मिलनसार और मृदुभाषी थे. वे अमीर गरीब सभी के लिए सामान रूप से उपलब्ध थे. रोगी का आधा रोग उनकी दवा से और आधा उनके व्यवहार, उनकी संवेदनशीलता, उनकी प्रेरक बातों से ठीक हो जाता था. बड़ी भीड़ रहती थी उनसे मिलने वालों की, लाइन में बैठा एक बूढ़ा भी अपनी बारी का इंतजार कर रहा था वह ह्रदय की गंभीर समस्या से जूझ रहा था.

लंबे समय के बाद उसका नंबर आ ही गया उसने कमरे में प्रवेश किया और स्टूल पर बैठ गया. आप नाम क्या है डाक्टर ने पूछा उत्तर मिला डाक्टर विनोद तिवारी भूतपूर्व बाल रोग विशेषज्ञ. यह सुनते ही मानो डाक्टर अभिनव को बिजली का झटका लगा हो. उन्होंने उनकी तरफ देखा और भाव शून्य हो गये उनके सामने 30 वर्ष का दृश्य तेजी से घूम गया.

उस दिन बारिश तेज़ हो रही थी, रह रह कर बिजली चमक उठती थी जिसकी रोशनी में उसके माथे पर पसीने की बूँदें दिख जाती थीं. वह पूरी तरह से भीग गया था. पर इन सब बातों से बेखबर वह तेज कदमों से बढ़ता जा रहा था. उसने बाहों में चादर से कोई चीज़ लपेट रखी थी जिसे मजबूती से अपने सीने से चिपकाकर वह तेजी से आगे बढ़ता जा रहा था. खराब मौसम भी उसके इरादों को डिगा नहीं पा रहा था. उसका बच्चा बुखार से तप रहा था और वह उसे लेकर डॉक्टर तिवारी के पास जा रहा था. वह कोलकाता के जाने माने बाल रोग विशेषज्ञ थे.

इस खराब मौसम में उसे कोई साधन नहीं मिल पा रहा था इसलिए वह अपने बच्चे को लेकर पैदल ही डाक्टर के पास जाने के लिए निकल पड़ा था. अपने बच्चे में इंसान की जान बसती है और आज उसकी जान मुश्किल में थी इसलिए बिना किसी बाधा की परवाह किए वह डाक्टर की क्लीनिक तक पहुंच ही गया था. पर लगता था कि किस्मत उसे अभी और आजमाना चाहती थी क्योंकि क्लीनिक बंद हो चुका था और अब उसके पास एकमात्र विकल्प डाक्टर के घर जाकर अपने बच्चे को दिखाना बचा था.

मरता क्या न करता वह बच्चे को गोद में उठाए हुए डाक्टर तिवारी के घर भी पहुंच गया पर मौसम खराब होने के कारण उसे देर हो गई थी और डाक्टर साहब सोने के लिए चले गए थे. बड़ी मनुहार के बाद चौकीदार ने 500 रूपये का नोट उसके हाथ से लेकर अपनी जेब के हवाले किया और डाक्टर को उठाने के लिए चला गया. थोड़ी देर बाद उसे भद्दी गालियाँ सुनाई देने लगीं. जब चौकीदार वापस आया तो उसने कहा डाक्टर ने मरीज को देखने से इंकार कर दिया है. डाक्टर को अपनी नींद में खलल पसंद नहीं आया था और उसने चौकीदार से कहलवा भेजा था कि मरता है तो मर जाए पर मेरी नींद में दुबारा बाधा मत डालना.

आज इतिहास खुद को दोहरा रहा था. वही डाक्टर तिवारी जिन्होंने कभी उसे मरने के लिए छोड़ दिया था आज स्वयं गंभीर रोग से पीड़ित होकर डाक्टर अभिनव के सामने बैठे थे. डाक्टर अभिनव का मन कड़वाहट से भर गया था . एक पल के लिए उन्हें लगा कि वह उसका इलाज नहीं कर सकते. उनका मन तीस साल की अपनी सारी पीड़ा को बीमार डाक्टर तिवारी के सामने निकाल देना चाहता था. वह उनको मजबूरी और लाचारी का अहसास करा देना चाहता था. आज डाक्टर अभिनव के पास मौका था डाक्टर तिवारी के अहंकार को चूर चूर कर देने का.

डाक्टर अभिनव के पिता ने बड़ी कठिनाइयों और मुश्किलों से उन्हें यहां तक पहुंचाया था. उनका कुछ समय पहले अल्प आयु में ही ह्रदय रोग के कारण स्वर्गवास हो चुका था. वह हमेशा डाक्टर अभिनव के दिल में बसते थे. अपने पिता की एक तस्वीर उन्होंने अपने हास्पिटल के कमरे में अपनी कुर्सी के सामने दीवार पर लगा रखी थी. डाक्टर अभिनव की नजरें अपने पिता की तस्वीर पर गयीं उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी उन्हें अपने बेटे पर नाज़ था. डाक्टर अभिनव ने डाक्टर तिवारी के साथ भी वही व्यवहार किया जैसा वह अन्य मरीजों के साथ करते थे. बूढ़े डाक्टर तिवारी उन्हे धन्यवाद देते हुए लड़खड़ाते हुए कदमों से बाहर चले गए.

डाक्टर अभिनव भी अब मरीजों को देखने के बाद उठकर घर जाने लगे. उन्होंने अपना बैग उठाया और पिता की तस्वीर को प्रणाम किया. उन्हें महसूस हुआ कि तस्वीर में मुस्कान गहरी और आंखों की चमक बढ़ गई है. उन्होंने अपने पिता के बेटे होने के फर्ज को अदा कर दिया था.

यदि मैं तुम्हारी जगह पर होता

हमारे जानने वाली एक महिला इस बात से बेहद परेशान थी कि उनका चार साल का बेटा अक्सर दूसरों के यहाँ से कुछ भी जो उसे अच्छा लगता वो सामान घर उठा कर ले आता कभी दूसरे बच्चों के खिलौने उठा लाता तो कभी उनकी पेन्सिल या किताबें उठा लाता। उसकी इस आदत से परेशान वो उसको डांटती उस पर गुस्सा होती पर बच्चे के व्यवहार में कोई परिवर्तन न होते देख उन्होंने child psychologist से मदद मांगी उन्होंने उनसे खुद को बच्चे के स्थान पर रखकर सोचने की सलाह दी और समझाया कि बच्चों को अपनी और दूसरों की चीजों का अन्तर मालूम नहीं होता,इसलिए अच्छी लगने पर कोई भी चीज उठा लेना चाहे वो किसी और की क्यों न हो,इसमें उन्हें बुराई नजर नहीं आती।

बच्चों का मानना है कि दुनिया की हर चीज अपनी है जिसे वे जब चाहे ले सकते हैं हालांकि 6 वर्ष की उम्र तक आते आते वे अपनी और दूसरों की चीजों में अन्तर करना जान जाते हैं। उन्होंने उन महिला को समझाया कि जब भी बच्चा दूसरों की चीज उठाकर घर ले आए तो उन्हें बच्चे को डाटने की बजाय खुद को बच्चे की जगह रखकर सोचना चाहिए और उसे धैर्य के साथ समझाना चाहिए, उसे गलती का एहसास कराना चाहिए कि जो चीज वो अपनी समझ कर उठा लाया है वो उसकी नहीं है और उसे उस चीज को वापस करना होगा और जब वो वह चीज वापस कर दे तो उसकी तारीफ करनी चाहिए एेसा करने पर बच्चे में सुधार होगा और यह सुधार डर के कारण नहीं होगा।

यह मानव का स्वभाव है कि अक्सर हम निर्णय लेते वक्त भावनाओं में बह जाते हैं। यह emotions क्रोध, दया, sympathy,पूर्वाग्रह या prejudice हो सकते हैं। एेसे में हमारे निर्णय के गलत होने की संभावना बढ़ जाती है। पर खुद को भावनाओं या emotions से मुक्त रखना बड़ा ही मुश्किल काम है। मानव मन है ही एेसा जो भावनाओं और संवेदनाओं से भरा हुआ है और भावनाओं पर नियंत्रण रखना नामुमकिन नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर है।


अंग्रेजी में एक कहावत है When you take decision put yourself in another shoe.यानी निर्णय लेते वक्त खुद को दूसरे के स्थान पर रखना चाहिए। बड़ी ही practical बात है दूसरे व्यक्ति की मनोदशा समझने का इससे अच्छा तरीका हो ही नहीं सकता। जब हम खुद को दूसरे के स्थान पर रखते हैं तो दूसरे व्यक्ति की मनोदशा के साथ हमें उन परिस्थितियों को भी समझने में मदद मिलती है जिसके प्रभाव में व्यक्ति वर्तमान में में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। फिर जब हम दूसरे व्यक्ति के बारे में निर्णय लेते हैं तो उसके सही होने की संभावना बढ़ जाती है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि एेसा करने में या सोचने में हमें अपनी भावनाओं से मुक्त भी नहीं होना पड़ता है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि आपको को किसी की बात सुनकर गुस्सा आ गया है और बदले में आप भी क्रोध में आकर प्रतिक्रिया व्यक्त करने जा रहे हैं तो आपकी प्रतिक्रिया के सही होने की संभावना बढ़ जाएगी यदि आप खुद को सामने वाले के स्थान पर रखकर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।


यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो क्या होता, क्या हमारी दुनिया एेसी होती, क्या मैं और भी बेहतर होता, क्या जिदंगी और भी अच्छी होती… इन सभी के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है पर एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो आपके निर्णय बेहतर होते और आपको उन निर्णय निर्णयों पर अफसोस भी कम होता क्योंकि जब आप दूसरों के स्थान पर खुद को रखकर निर्णय लेते हैं तो दरअसल आप दूसरों के बारे में नहीं बल्कि खुद के बारे में निर्णय लेते हैं और आपके बारे में आपसे बेहतर कौन जानता है यही कारण है कि आपके निर्णय के सही होने की संभावना बढ़ जाती है…

अंतर्मुखी स्वभाव

1- दूसरों के लिए आपको और आपके विकल्पों को समझना मुश्किल होता है। यहां तक कि आपके परिवार के निकटतम सदस्यों और दोस्तों को भी आपके दिमाग के अंदर क्या चल रहा है, इसका पता नहीं होता।

2- किसी चीज़ को जरूरत से ज्यादा सोचना अंतर्मुखी स्वभाव के व्यक्तियों की सबसे बुरी आदतों में से एक है। अधिकतम समय आपके दिमाग में कुछ न कुछ चलता रहता है। आप हमेशा अपने भविष्य, करियर, आदतों और कई दूसरी चीजों के बारे में सोचते रहते हैं।

3- अंतर्मुखी स्वभाव के लोग अपना समय एकांत में बिताना पसंद करते हैं और अक्सर कम बोलने वाले होते हैं। अधिकांश समय इन्हें दूसरों को समक्ष अपनी भावनाओं को व्यक्त करने या कहने में हिचकिचाहट महसूस होती है।

4- दूसरों से मदद लेने के मामले में शर्मीले स्वभाव के लोगों की स्थिति अत्यंत दयनीय होती है। दूसरों की मदद लेने में वे बुरा महसूस करते हैं और कई बार सोचते हैं।

5- जब अंतर्मुखी स्वभाव के लोगों के मन में कोई संदेह होता है तो वे सीधे सवाल नहीं पूछते हैं, वे केवल यह सोचते हैं कि उन्हें पूछना चाहिए या नहीं, फिर कुछ बार सोचने के बाद वे इसे छोड़ने का फैसला करते हैं और अन्य स्रोतोंं के माध्यम से अपने डाउट क्लीयर करते हैं।

6- अंतर्मुखी स्वभाव के लोग जानते हैं कि लोग उन्हें छोटी-छोटी बातों में बेवकूफ बनाने की कोशिश करते हैं फिर भी वे इसे लेकर चिंतित नहीं होते क्योंकि वे बहस करना पसंद नहीं करते हैं। दूसरों से धोखा खाना उनकी अक्षमता नहीं है बल्कि यह दूसरों पर हर बार भरोसा करने और माफ कर देने की उनके दिल की दयालुता है।

7- शर्मीले स्वभाव के लोग सबसे दुर्भाग्यशाली एक तरफा प्रेमी होते हैं। यहां तक कि उनके सबसे अच्छे दोस्त को भी पता नहीं होता कि वो प्यार में हैं।

8- अंतर्मुखी और शर्मीले स्वभाव वालों के पास कई भावनाओं के लिए एक ही चेहरा होता है क्योंकि ये अंदर ही रोते हैं, अंदर ही हंसते हैं, अंदर ही प्यार करते हैं और अंदर ही नफरत करते हैं।

9- अंतर्मुखी और शर्मीले स्वभाव के लोगों के जीवन की कहानी में हर भूमिका के लिए उनके पास बहुत कम लोग होते हैं और जब वे उनमें से किसी को खो देते हैं, तो उन्हें बहुत गहराई से दर्द देता है और उन घावों को ठीक होने में कई साल लग जाते हैं।

10- अंतर्मुखी और शर्मीले स्वभाव के लोगों को असमाजिक,अपनी दुनिया में केंद्रित,अहंकारी और ऐसे अन्य विशेषणों से नवाजा जाता है क्योंकि वे ज्यादा कुछ बोलते नहीं हैं और सामाजिक घटनाओं में शरीक होने से बचते हैं।

फिनिशिंग लाइन

परिवर्तन जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। यह अनवरत जारी रहने वाली प्रक्रिया है, परिवर्तन हमारे चाहने या न चाहने पर निर्भर नहीं होता ये तो बस होता रहता है। परिवर्तन मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं macro और micro जो परिवर्तन हमे और दूसरों को होते हुए दिखाई देते हैं जैसे उम्र के साथ होने वाले परिवर्तन, रहन सहन में होने वाले परिवर्तन, वेशभूषा में और खानपान में होने वाले परिवर्तन आदि को macro changes कहा जाता है वहीं जो परिवर्तन सूक्ष्म होते हैं जैसे विचारों में होने वाले परिवर्तन, व्यवहार में होने वाले परिवर्तन आदि को micro changes कहा जाता है। हम अक्सर macro changes को तो नोटिस करते हैं, पर micro changes को नोटिस नहीं कर पाते हैं। जो सूक्ष्म है उसे देख पाना आसान नहीं होता है।

जीवन में होने वाले परिवर्तन सकारात्मक भी होते हैं और नकारात्मक भी जो परिवर्तन जीवन में अनुकूल परिस्थितियां लाते हैं उन्हें सकारात्मक और जो परिवर्तन प्रतिकूल परिस्थितियां लाते हैं उन्हें नकारात्मक परिवर्तन कहते हैं। हममे से ज्यादातर लोग परिवर्तन पसंद नहीं करते और इसके लिए तैयार भी नहीं होते हैं, क्योंकि हमें हमेशा एक अज्ञात का डर होता है जिसे fear of unknown कहते हैं।

कम ही लोग होते हैं जो इस डर को जीत पाते हैं जो इस डर के आगे बढ़ पाते हैं उन्हें परिवर्तन पसन्द होता है और ऐसे लोग देश और दुनिया में परिवर्तन लाते हैं इन्हें change agents कहते हैं। परिवर्तन लाने में हमेशा विरोध का सामना करना पड़ता है कभी यह विरोध खुद के भीतर से तो कभी बाहर से होता है।

जीवन में होने वाले बड़े परिवर्तन अकस्मात होते हैं जिसके लिए हम तैयार नहीं होते हैं और जब ये परिवर्तन होते हैं तो अक्सर जीवन बदल जाता हैं। परिवर्तन में अवसर भी होता है और भय भी होता है जो इसमें अवसर देखते हैं वो आगे बढ़ जाते हैं और जो परिवर्तन से भयभीत हो जाता है वो वहीं रह जाता है जहां वो पहले था।

विकास या development भी एक तरह का परिवर्तन ही होता है जिसे सकारात्मक या positive development कहा जा सकता है और जब यह परिवर्तन सतत या continuous होता है तो इसे ही समावेशी विकास या sustainable development कहते हैं।  क्या कोई भी development सम्पूर्ण या 100% हो सकता है?

एक मशहूर एयरवेज का sustainable process development प्रोग्राम की accuracy 99.96% पहुंच चुकी है जिसका मतलब यह हुआ हर 10000 उड़ान में से 4 उड़ान के दुर्घटनाग्रस्त होने की संभावना होती है। सोचिए हर बार जब उड़ान भरी जाती है तब कितने इन्सानों की जिंदगी दावं पर लगी होती है पर यह संभावना कभी भी 100% नहीं हो सकती क्योंकि हर साल इसमें नये कारक या variables जुड़ जाते हैं जो पुराने कारकों से पूरी तरह भिन्न होते हैं।

यह लगातार दौड़ी जाने वाली ऐसी रेस है जिसकी कोई फिनिशिंग लाइन नहीं होती है। इसका मतलब यह भी है कि जीवन में कोई भी परिवर्तन स्थायी या पूर्ण नहीं होता यह लगातार चलने वाली अंतहीन प्रक्रिया है जिसका कोई अंत नहीं है। Management की भाषा में इसे ही TQM या Total Quality Management कहते हैं।


उम्मीदें

जब कोई इंसान टूटता है तो केवल उसका दिल ही नहीं टूटता है बल्कि उसके साथ-साथ बहुत कुछ है जो टूट जाता है।

बहुत सारी उम्मीदें टूट जाती हैं।

दूसरों पर से भरोसा टूट जाता है।

उस व्यक्ति की छवि टूट जाती है।

बहुत से सपने टूट जाते हैं।

चीजों को देखने का नजरिया टूट जाता है।

हमारा आत्मविश्वास टूट जाता है।

दिल हमेशा वह पाना चाहता है जो कि वह चाहता है। समस्या मन को चुप रखने में होती है। और दिल और दिमाग की यह लड़ाई हमेशा ही सबसे कठिन होती है।

यह दर्द लोगों में एक शून्य बनाता है और उस शू्न्य को भरने के उनके पास 3 विकल्प होते हैं-

उदासीनता या अवसाद, और इसे खुद को नष्ट करने दें।

नफरत या खुशी, और इसे खुद को परिभाषित करने दें।

मिलने वाले सबक, और इसे खुद को मजबूत करने दें।

जो भी विकल्प आप चुनिये, आप पहले जैसै व्यक्ति कभी भी नहीं होंगे।

दिल का टूटना किसी लकड़ी से कील निकालने जैसा है। कील अपने निशान लकड़ी पर छोड़ जाती है और वह लकड़ी कभी भी पहले जैसी नहीं रह जाती है।

जीनियस

अल्बर्ट आइंस्टीन अपने काम में इतना डूबे रहते थे कि उनका ध्यान अपनी वेशभूषा पर कम ही रहता था उनकी पत्नी अक्सर उनसे कहा करती थीं कि जब भी वो काम जाएं तो उन्हें प्रोफेशनल कपड़े पहनने चाहिए ऐसा कहने पर वह प्रत्युत्तर में कहते थे ” मुझे ऐसा क्यों करना चाहिए वहां तो हर कोई मुझको जानता है।”

एक बार जब आइंस्टीन को एक बड़ी कॉन्फ्रेंस में जाना था तो उनकी पत्नी ने उनसे पुनः एक बार आग्रह किया कि आप कॉन्फ्रेंस में प्रोफेशनल कपड़े पहन कर जाएं प्रत्युत्तर में आइंस्टीन ने कहा “मुझे ऐसा क्यों करना चाहिए वहां तो मुझे कोई नहीं जानता है।”

आइंस्टीन से अक्सर जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी को एक्सप्लेन करने के लिए कहा जाता था वह अक्सर इसे एक उदाहरण देकर समझाते थे वे कहते थे “आप अपना हाथ यदि 1 मिनट के लिए जलते हुए स्टोर के ऊपर ले जाएं तो आपको प्रतीत होगा कि मानो यह करते हुए एक घंटा बीत गया है वही दूसरी तरफ यदि आप किसी खूबसूरत लड़की के साथ एक घंटा बिताते हैं तो आपको ऐसा महसूस होगा मानो यह 1मिनट पहले की बात है,यही थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी है।”

जब अल्बर्ट आइंस्टाइन प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में काम करते थे तो एक बार घर लौटते समय वह अपने घर का पता भूल गए तब उन्होंने अपनी कैब के ड्राइवर से पूछा क्या तुम आइंस्टीन का घर जानते हो?ड्राइवर ने उत्तर दिया यहां प्रिंसटन में आइंस्टीन को कौन नहीं जानता? क्या आप उनसे मिलना चाहते हैं? आइंस्टीन ने कहा मैं ही आइंस्टीन हूं, मैं अपने घर का पता भूल गया हूं, क्या आप मुझे मेरे घर तक पहुंचा सकते हैं?ड्राइवर ने उन्हें सुरक्षित उनके घर तक पहुंचा दिया और उनसे गाड़ी का किराया भी नहीं लिया।

आइंस्टीन एक बार प्रिंसटन से रेल की यात्रा कर रहे थे गाड़ी चलने के थोड़ी देर बाद टिकट चेकर आया और सभी यात्रियों से टिकट मांग कर चेक करने लगा जब वह आइंस्टीन के पास आया और उन से टिकट मांगा तो आइंस्टीन ने अपनी जेब में हाथ डाले पर उन्हें वहां टिकट नहीं मिला फिर उन्होंने सीट के नीचे देखा उसके बाद अपने ब्रीफकेस में देखा लेकिन उन्हें टिकट कहीं नहीं मिला उन्हें असमंजस में देखकर टिकट चेकर ने कहा डॉक्टर आइंस्टीन मैं जानता हूं आप कौन हैं मैं निश्चिंत हूं कि आपने टिकट अवश्य खरीदा होगा इसके बारे में आप निश्चिंत रहिए। टिकट चेकर ऐसा कहकर आगे बढ़ गया और दूसरे डिब्बे में जाकर यात्रियों के टिकट चेक करने लगा।

थोड़ी देर बाद जब टिकट चेकर वापस लौटा तो उसने देखा आइंस्टीन अपने घुटनों के बल ट्रेन के फर्श पर बैठकर अपनी बर्थ के नीचे अपना टिकट ढूंढ रहे हैं उसने पुनः कहा मैं जानता हूं आप कौन हैं आपने अवश्य ही ट्रेन का टिकट खरीदा होगा इसके बारे में आप निश्चिंत रहिए प्रत्युत्तर में आइंस्टीन ने कहा यंग मैन मैं भी जानता हूं कि मैं कौन हूं पर मैं यह नहीं जानता कि मैं कहां जा रहा हूं इसीलिए मैं अपने टिकट को ढूंढ रहा हू।

एक बार जब आइंस्टीन की प्रसिद्ध कलाकार चार्ली चैपलिन से मुलाकात हुई तो आइंस्टीन ने कहा मैं आपकी कला के बारे में जो चीज सबसे ज्यादा पसंद करता हूं वह यह है कि यह सर्वव्यापी है आप एक भी शब्द नहीं कहते लेकिन पूरी दुनिया आपको समझ लेती है। प्रत्युत्तर में चार्ली चैपलिन ने कहा यह सत्य है लेकिन आपकी लोकप्रियता तो और भी बड़ी है लोग आप को नहीं समझते हैं लेकिन फिर भी पूरी दुनिया आपकी प्रशंसा करती है।

“ज़िंदगी” का रहस्य

कोई मीलों चलता है रोटी कमाने के लिए,

कोई मीलों चलता है उसे पचाने के लिए।

किसी के पास खाने को दो वक्त की रोटी नहीं,

किसी के पास दो रोटी खाने को वक्त नहीं।

कोई अपनों को पाने के लिए सब कुछ छोड़ देता है,

कोई सब कुछ पाने के लिए अपनों को छोड़ देता है।

कोई दौलत कमाने के लिए सेहत खो देता है,

कोई खोई सेहत पाने के लिए कमाई दौलत खो देता है।

कोई जीता ऐसे है कि कभी मरेगा ही नहीं,

कोई मरता ऐसे है मानो कभी जिया ही नहीं।

कोई चुप रहकर भी बहुत कुछ कह जाता है,

कोई बहुत कुछ कहके भी मतलब नही समझा पाता है।

कोई पत्थर मंदिर में जाकर भगवान बन जाता है,

कोई इंसान रोज मंदिर जाकर पत्थर ही रह जाता है।

जो सच अक्सर हम देख नहीं पाते हैं

पवन के पिता का देहांत हुए कई वर्ष गुजर चुके थे। उसकी मां राधा लोगों के घरों में काम करके किसी तरह पवन की पढ़ाई का खर्च उठा रही थी। राधा का एक ही सपना था कि पवन पढ लिख कर अच्छा इंसान बने। पर स्कूल से प्रतिदिन आने वाली शिकायतों ने राधा को विचलित कर दिया था।

आज पवन फिर गंदी ड्रेस में देरी से स्कूल पहुंचा था। यह प्रतिदिन का क्रम बन गया था। वह रोज गंदे कपड़ों में देरी से स्कूल पहुंचता था और इस कारण टीचर द्वारा उसे रोज सजा मिलती थी। उसकी इस आदत के बारे में कई बार उसके घर में भी शिकायत की गई थी और टीचर ने कई बार बार उसे समझाया भी था पर पवन न जाने किस मिट्टी का बना हुआ था कि उस पर किसी भी बात का कोई असर नहीं पड़ता था।

राधा को लगता था कि पवन रोज स्कूल देर से पहुंचता है और रोज घर भी देर से आता है हो न हो पवन अवश्य ही रास्ते में खेल-कूद में लग जाता है और इसी वजह से उसकी ड्रेस भी गन्दी हो जाती है। उसने पवन को हर तरह से समझाया था पर पवन था कि उस पर इन बातों का कुछ भी असर नहीं पड़ रहा था।

समय पंख लगा कर उड़ रहा था। एक दिन सुबह के समय पवन के क्लास टीचर सब्जी लेने के लिए थोक मंडी गए हुए थे। अचानक उनकी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना स्कूल में उनसे मार खाता था। वह देख रहे थे कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और बड़े दुकानदार जब अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो कुछ सब्जियां ज़मीन पर गिर जाती थीं जिन्हें वह बच्चा फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता था। यह बच्चा पवन था।

यह नज़ारा देख कर मास्टर जी कुछ परेशानी में पड़ गए वह सोच रहे थे कि ये माजरा क्या है, भला पवन क्यों गिरी हुई सब्जियों को इकट्ठा करके झोली में भर रहा है? वे पवन का चोरी चोरी पीछा करने लगे। उन्होंने देखा कि जब पवन की झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह उसे ले जाकर मुख्य सड़क के किनारे बैठ कर ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा सब्जी बेचने के लिए लोगों को पुकारने लगा । पवन के मुंह पर सब्जियों की मिट्टी लग गई थी और उसकी ड्रेस भी धूल से गन्दी हो गई थी। मास्टर जी ने देखा पवन की आंखों नम थीं, ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में वे पहली बार देख रहा थे ।

तभी कुछ एेसा हुआ जिसकी उम्मीद किसी को भी नहीं थी। अचानक एक आदमी जिसकी दुकान के सामने पवन ने अपनी नन्ही सी दुकान लगा रखी थी उठकर पवन के पास आया उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही सी दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाहों से पकड़ कर पवन को भी जोर से धक्का दे दिया।

पवन की आखों में आंसू आ गए उसने चुपचाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा किया और थोड़ी देर बाद अपनी सब्जी लिए एक दूसरी दुकान के सामने सहमे मन के साथ खड़ा हो गया। पवन के पास थोड़ी सी सब्ज़ी थी और कीमत बाकी दुकानों से कम थी इसलिए जल्द ही बिक्री हो गयी, पवन उठा और बाज़ार में एक कपड़े की सिलाई वाली दुकान में दाखिल हुआ उसने दुकानदार को कुछ पैसे दिए और फिर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और स्कूल की तरफ चल पड़ा।

अगली सुबह पवन के क्लास टीचर पवन के घर पहुंचे पवन घर से निकल गया था और घर पर उसकी माँ ही थीं पवन के टीचर को देखकर राधा थोड़ा चौंक गयीं उसे लगा आज फिर पवन की शिकायत करने उसके घर आये हैं। राधा को कुछ कहने का बिना कोई मौका दिये मास्टर जी बोल पड़े बहनजी आप मेरे साथ चलो मै आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल देर से क्यों जाता है।

राधा तुरंत मास्टर जी के साथ चल पड़ी और कहने लगी आज इस लड़के की खैर नहीं मैं उसे छोडूंगी नहीं आज,मास्टर जी राधा के साथ मंडी पहुंच गए और वे लोग पवन की गतिविधियों को चुपचाप छुप कर देखने लगे। आज भी पवन लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरी में पवन अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल गया। पवन ने दुकानदार को पैसे दिए और आज दुकानदार उसे एक लेडीज सूट देते हुए कहा कि बेटा आज सूट के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। अपना सूट लेलो,उसने सूट को लेकर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया।

आज भी वह एक घंटा देर से स्कूल पहुचा था, वह सीधा क्लास टीचर के पास गया और बैग डेस्क पर रखकर मार खाने के लिए आगे बढ़ा दिए, टीचर कुर्सी से उठे और फौरन उसको को गले से लगाकर जोर से रोने लगे अचानक पवन की नज़र उसकी माँ पर पड़ी जो क्लासरूम के एक कोने में खड़ी होकर लगातार रो रही थी।

टीचर ने अपने आप को किसी तरह संभाला और पवन से पूछा कि तुम्हारे स्कूल बैग में जो सूट है वह किसके लिए है?

अब रोने की बारी पवन की थी उसने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ बड़े लोगों के घरों में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं उसके पास अपने शरीर को पूरी तरह से ढांपने वाले कोई कपड़े भी नहीं हैं और मेरी माँ के पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वह नया सूट खरीद सके इसीलिए मैंने अपने पैसों से माँ के लिए यह सूट खरीदा है।

राधा से जब रहा न गया तो उसने पवन को खींचकर सीने से लगा लिया और जार जार रोने लगी मां को रोते हुए देख पवन अपने छोटे -छोटे हाथों से मां के आंसू पोछते हुए कहने लगा माँ तुम रो मत अब तुम्हारा बेटा बड़ा हो गया है। जाड़े के दिन थे और खिड़की के बाहर सूरज ढलने लगा था, दूसरी क्लास के टीचर और बच्चे भी अब कमरे में आ चुके थे। सभी की आखें नम थीं और हर कोई निशब्द खड़ा था, आज शब्दों की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि आसूं आज संवेदनाओं को शब्दों से भी बेहतर व्यक्त कर रहे थे।

रिश्ते

जीवन अपनों से ही परिभाषित होता है। जीवन की सार्थकता अपनों के बीच ही है। अपरिचित व्यक्तियों और अनजान स्थान पर जीवन व्यतीत करना मुश्किल हो जाता है। अनजानी जगहों पर मुख्य बाधा विचारों के आदान-प्रदान में आती है। जहां हम किसी से व्यवहार नहीं कर सकते और कोई हमें समझ नहीं पाता है तो वहां रहने में मुश्किल आना स्वाभाविक ही है।

संबंधों के लिए भावनाओं की जरूरत होती है। भावनाओं के तार ही हमें एक दूसरे से जोड़ने का काम करते हैं। जब तक भाव नहीं जुड़ते हैं तब तक संबंध मजबूत नहीं होते हैं और संबंधों में गहराई नहीं आती है।

जब कोई हमें समझने वाला होता है, जो हमारे सुख-दुख से संवेदित होता है, हमारे साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है तो वहां जिदंगी का फूल विकसित होकर खिलता है। जहां लोग अपने होते हैं वहां जीवन की परिस्थितियां लगभग एक जैसी होती हैं और मंजिल साथ मिलकर बढ़ने पर मिल ही जाती है।

जीवन के विकास में अपनत्व और प्रेम की बहुत आवश्यकता होती है जो हमें केवल अपनों द्वारा ही मिल पाता है, दूसरे शब्दों में जहां अपनत्व मिलता है वहीं लोग अपने होते हैं।

सामान्य रूप से हम अपने संबंधियों और परिवार के सदस्यों को ही अपना समझते हैं पर ये सब मात्र शरीर और रक्त के संबंध हैं। सच्चे संबंध तो वहां बनते हैं जहां पर विचार और भावनाएं मिलती हैं।

विचार और भावनाओं के मेल से ही संबंधों में स्थायित्व आता है, उनमें प्रेम पनपता है और रिश्तों में गर्माहट आती है। सच्चे संबंध ही जीवन को सार्थक और बेहतर बनाते हैं। हमें भी भावनाओं को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि भावनाओं की मजबूती पर ही रिश्तों की इमारत खड़ी होती है।

इंसान के रिश्ते वक्त जरूरत के मुताबिक बदलते रहते हैं, पुराने संबंध टूटते और नये बनते हैं। कभी अपने पराये तो कभी पराए अपने बन जाते हैं। पुराने लोगों की जगह नये लोग आते हैं और नया रिश्ता बन जाता है, लोग साथ छोड़कर चले जाते हैं और रिश्ता खत्म हो जाता है। कुछ संबंध एेसे भी होते हैं जो समय के परे हैं जिन रिश्तों में भावनाएं गहरी और सच्ची होती हैं उन्हें काल भी मिटा नहीं पाता है।