उम्मीदें

जब कोई इंसान टूटता है तो केवल उसका दिल ही नहीं टूटता है बल्कि उसके साथ-साथ बहुत कुछ है जो टूट जाता है।

बहुत सारी उम्मीदें टूट जाती हैं।

दूसरों पर से भरोसा टूट जाता है।

उस व्यक्ति की छवि टूट जाती है।

बहुत से सपने टूट जाते हैं।

चीजों को देखने का नजरिया टूट जाता है।

हमारा आत्मविश्वास टूट जाता है।

दिल हमेशा वह पाना चाहता है जो कि वह चाहता है। समस्या मन को चुप रखने में होती है। और दिल और दिमाग की यह लड़ाई हमेशा ही सबसे कठिन होती है।

यह दर्द लोगों में एक शून्य बनाता है और उस शू्न्य को भरने के उनके पास 3 विकल्प होते हैं-

उदासीनता या अवसाद, और इसे खुद को नष्ट करने दें।

नफरत या खुशी, और इसे खुद को परिभाषित करने दें।

मिलने वाले सबक, और इसे खुद को मजबूत करने दें।

जो भी विकल्प आप चुनिये, आप पहले जैसै व्यक्ति कभी भी नहीं होंगे।

दिल का टूटना किसी लकड़ी से कील निकालने जैसा है। कील अपने निशान लकड़ी पर छोड़ जाती है और वह लकड़ी कभी भी पहले जैसी नहीं रह जाती है।

जीनियस

अल्बर्ट आइंस्टीन अपने काम में इतना डूबे रहते थे कि उनका ध्यान अपनी वेशभूषा पर कम ही रहता था उनकी पत्नी अक्सर उनसे कहा करती थीं कि जब भी वो काम जाएं तो उन्हें प्रोफेशनल कपड़े पहनने चाहिए ऐसा कहने पर वह प्रत्युत्तर में कहते थे ” मुझे ऐसा क्यों करना चाहिए वहां तो हर कोई मुझको जानता है।”

एक बार जब आइंस्टीन को एक बड़ी कॉन्फ्रेंस में जाना था तो उनकी पत्नी ने उनसे पुनः एक बार आग्रह किया कि आप कॉन्फ्रेंस में प्रोफेशनल कपड़े पहन कर जाएं प्रत्युत्तर में आइंस्टीन ने कहा “मुझे ऐसा क्यों करना चाहिए वहां तो मुझे कोई नहीं जानता है।”

आइंस्टीन से अक्सर जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी को एक्सप्लेन करने के लिए कहा जाता था वह अक्सर इसे एक उदाहरण देकर समझाते थे वे कहते थे “आप अपना हाथ यदि 1 मिनट के लिए जलते हुए स्टोर के ऊपर ले जाएं तो आपको प्रतीत होगा कि मानो यह करते हुए एक घंटा बीत गया है वही दूसरी तरफ यदि आप किसी खूबसूरत लड़की के साथ एक घंटा बिताते हैं तो आपको ऐसा महसूस होगा मानो यह 1मिनट पहले की बात है,यही थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी है।”

जब अल्बर्ट आइंस्टाइन प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में काम करते थे तो एक बार घर लौटते समय वह अपने घर का पता भूल गए तब उन्होंने अपनी कैब के ड्राइवर से पूछा क्या तुम आइंस्टीन का घर जानते हो?ड्राइवर ने उत्तर दिया यहां प्रिंसटन में आइंस्टीन को कौन नहीं जानता? क्या आप उनसे मिलना चाहते हैं? आइंस्टीन ने कहा मैं ही आइंस्टीन हूं, मैं अपने घर का पता भूल गया हूं, क्या आप मुझे मेरे घर तक पहुंचा सकते हैं?ड्राइवर ने उन्हें सुरक्षित उनके घर तक पहुंचा दिया और उनसे गाड़ी का किराया भी नहीं लिया।

आइंस्टीन एक बार प्रिंसटन से रेल की यात्रा कर रहे थे गाड़ी चलने के थोड़ी देर बाद टिकट चेकर आया और सभी यात्रियों से टिकट मांग कर चेक करने लगा जब वह आइंस्टीन के पास आया और उन से टिकट मांगा तो आइंस्टीन ने अपनी जेब में हाथ डाले पर उन्हें वहां टिकट नहीं मिला फिर उन्होंने सीट के नीचे देखा उसके बाद अपने ब्रीफकेस में देखा लेकिन उन्हें टिकट कहीं नहीं मिला उन्हें असमंजस में देखकर टिकट चेकर ने कहा डॉक्टर आइंस्टीन मैं जानता हूं आप कौन हैं मैं निश्चिंत हूं कि आपने टिकट अवश्य खरीदा होगा इसके बारे में आप निश्चिंत रहिए। टिकट चेकर ऐसा कहकर आगे बढ़ गया और दूसरे डिब्बे में जाकर यात्रियों के टिकट चेक करने लगा।

थोड़ी देर बाद जब टिकट चेकर वापस लौटा तो उसने देखा आइंस्टीन अपने घुटनों के बल ट्रेन के फर्श पर बैठकर अपनी बर्थ के नीचे अपना टिकट ढूंढ रहे हैं उसने पुनः कहा मैं जानता हूं आप कौन हैं आपने अवश्य ही ट्रेन का टिकट खरीदा होगा इसके बारे में आप निश्चिंत रहिए प्रत्युत्तर में आइंस्टीन ने कहा यंग मैन मैं भी जानता हूं कि मैं कौन हूं पर मैं यह नहीं जानता कि मैं कहां जा रहा हूं इसीलिए मैं अपने टिकट को ढूंढ रहा हू।

एक बार जब आइंस्टीन की प्रसिद्ध कलाकार चार्ली चैपलिन से मुलाकात हुई तो आइंस्टीन ने कहा मैं आपकी कला के बारे में जो चीज सबसे ज्यादा पसंद करता हूं वह यह है कि यह सर्वव्यापी है आप एक भी शब्द नहीं कहते लेकिन पूरी दुनिया आपको समझ लेती है। प्रत्युत्तर में चार्ली चैपलिन ने कहा यह सत्य है लेकिन आपकी लोकप्रियता तो और भी बड़ी है लोग आप को नहीं समझते हैं लेकिन फिर भी पूरी दुनिया आपकी प्रशंसा करती है।

“ज़िंदगी” का रहस्य

कोई मीलों चलता है रोटी कमाने के लिए,

कोई मीलों चलता है उसे पचाने के लिए।

किसी के पास खाने को दो वक्त की रोटी नहीं,

किसी के पास दो रोटी खाने को वक्त नहीं।

कोई अपनों को पाने के लिए सब कुछ छोड़ देता है,

कोई सब कुछ पाने के लिए अपनों को छोड़ देता है।

कोई दौलत कमाने के लिए सेहत खो देता है,

कोई खोई सेहत पाने के लिए कमाई दौलत खो देता है।

कोई जीता ऐसे है कि कभी मरेगा ही नहीं,

कोई मरता ऐसे है मानो कभी जिया ही नहीं।

कोई चुप रहकर भी बहुत कुछ कह जाता है,

कोई बहुत कुछ कहके भी मतलब नही समझा पाता है।

कोई पत्थर मंदिर में जाकर भगवान बन जाता है,

कोई इंसान रोज मंदिर जाकर पत्थर ही रह जाता है।

जो सच अक्सर हम देख नहीं पाते हैं

पवन के पिता का देहांत हुए कई वर्ष गुजर चुके थे। उसकी मां राधा लोगों के घरों में काम करके किसी तरह पवन की पढ़ाई का खर्च उठा रही थी। राधा का एक ही सपना था कि पवन पढ लिख कर अच्छा इंसान बने। पर स्कूल से प्रतिदिन आने वाली शिकायतों ने राधा को विचलित कर दिया था।

आज पवन फिर गंदी ड्रेस में देरी से स्कूल पहुंचा था। यह प्रतिदिन का क्रम बन गया था। वह रोज गंदे कपड़ों में देरी से स्कूल पहुंचता था और इस कारण टीचर द्वारा उसे रोज सजा मिलती थी। उसकी इस आदत के बारे में कई बार उसके घर में भी शिकायत की गई थी और टीचर ने कई बार बार उसे समझाया भी था पर पवन न जाने किस मिट्टी का बना हुआ था कि उस पर किसी भी बात का कोई असर नहीं पड़ता था।

राधा को लगता था कि पवन रोज स्कूल देर से पहुंचता है और रोज घर भी देर से आता है हो न हो पवन अवश्य ही रास्ते में खेल-कूद में लग जाता है और इसी वजह से उसकी ड्रेस भी गन्दी हो जाती है। उसने पवन को हर तरह से समझाया था पर पवन था कि उस पर इन बातों का कुछ भी असर नहीं पड़ रहा था।

समय पंख लगा कर उड़ रहा था। एक दिन सुबह के समय पवन के क्लास टीचर सब्जी लेने के लिए थोक मंडी गए हुए थे। अचानक उनकी नज़र उसी दस साल के बच्चे पर पड़ी जो रोज़ाना स्कूल में उनसे मार खाता था। वह देख रहे थे कि वह बच्चा मंडी में घूम रहा है और बड़े दुकानदार जब अपनी दुकानों के लिए सब्ज़ी खरीद कर अपनी बोरियों में डालते तो कुछ सब्जियां ज़मीन पर गिर जाती थीं जिन्हें वह बच्चा फौरन उठा कर अपनी झोली में डाल लेता था। यह बच्चा पवन था।

यह नज़ारा देख कर मास्टर जी कुछ परेशानी में पड़ गए वह सोच रहे थे कि ये माजरा क्या है, भला पवन क्यों गिरी हुई सब्जियों को इकट्ठा करके झोली में भर रहा है? वे पवन का चोरी चोरी पीछा करने लगे। उन्होंने देखा कि जब पवन की झोली सब्ज़ी से भर गई तो वह उसे ले जाकर मुख्य सड़क के किनारे बैठ कर ऊंची ऊंची आवाज़ें लगा सब्जी बेचने के लिए लोगों को पुकारने लगा । पवन के मुंह पर सब्जियों की मिट्टी लग गई थी और उसकी ड्रेस भी धूल से गन्दी हो गई थी। मास्टर जी ने देखा पवन की आंखों नम थीं, ऐसा दुकानदार ज़िन्दगी में वे पहली बार देख रहा थे ।

तभी कुछ एेसा हुआ जिसकी उम्मीद किसी को भी नहीं थी। अचानक एक आदमी जिसकी दुकान के सामने पवन ने अपनी नन्ही सी दुकान लगा रखी थी उठकर पवन के पास आया उसने आते ही एक जोरदार लात मार कर उस नन्ही सी दुकान को एक ही झटके में रोड पर बिखेर दिया और बाहों से पकड़ कर पवन को भी जोर से धक्का दे दिया।

पवन की आखों में आंसू आ गए उसने चुपचाप दोबारा अपनी सब्ज़ी को इकठ्ठा किया और थोड़ी देर बाद अपनी सब्जी लिए एक दूसरी दुकान के सामने सहमे मन के साथ खड़ा हो गया। पवन के पास थोड़ी सी सब्ज़ी थी और कीमत बाकी दुकानों से कम थी इसलिए जल्द ही बिक्री हो गयी, पवन उठा और बाज़ार में एक कपड़े की सिलाई वाली दुकान में दाखिल हुआ उसने दुकानदार को कुछ पैसे दिए और फिर दुकान में पड़ा अपना स्कूल बैग उठाया और स्कूल की तरफ चल पड़ा।

अगली सुबह पवन के क्लास टीचर पवन के घर पहुंचे पवन घर से निकल गया था और घर पर उसकी माँ ही थीं पवन के टीचर को देखकर राधा थोड़ा चौंक गयीं उसे लगा आज फिर पवन की शिकायत करने उसके घर आये हैं। राधा को कुछ कहने का बिना कोई मौका दिये मास्टर जी बोल पड़े बहनजी आप मेरे साथ चलो मै आपको बताता हूँ, आप का बेटा स्कूल देर से क्यों जाता है।

राधा तुरंत मास्टर जी के साथ चल पड़ी और कहने लगी आज इस लड़के की खैर नहीं मैं उसे छोडूंगी नहीं आज,मास्टर जी राधा के साथ मंडी पहुंच गए और वे लोग पवन की गतिविधियों को चुपचाप छुप कर देखने लगे। आज भी पवन लोगों से डांट फटकार और धक्के खाने पड़े, और आखिरी में पवन अपनी सब्ज़ी बेच कर कपड़े वाली दुकान पर चल गया। पवन ने दुकानदार को पैसे दिए और आज दुकानदार उसे एक लेडीज सूट देते हुए कहा कि बेटा आज सूट के सारे पैसे पूरे हो गए हैं। अपना सूट लेलो,उसने सूट को लेकर स्कूल बैग में रखा और स्कूल चला गया।

आज भी वह एक घंटा देर से स्कूल पहुचा था, वह सीधा क्लास टीचर के पास गया और बैग डेस्क पर रखकर मार खाने के लिए आगे बढ़ा दिए, टीचर कुर्सी से उठे और फौरन उसको को गले से लगाकर जोर से रोने लगे अचानक पवन की नज़र उसकी माँ पर पड़ी जो क्लासरूम के एक कोने में खड़ी होकर लगातार रो रही थी।

टीचर ने अपने आप को किसी तरह संभाला और पवन से पूछा कि तुम्हारे स्कूल बैग में जो सूट है वह किसके लिए है?

अब रोने की बारी पवन की थी उसने रोते हुए जवाब दिया कि मेरी माँ बड़े लोगों के घरों में मजदूरी करने जाती है और उसके कपड़े फटे हुए होते हैं उसके पास अपने शरीर को पूरी तरह से ढांपने वाले कोई कपड़े भी नहीं हैं और मेरी माँ के पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वह नया सूट खरीद सके इसीलिए मैंने अपने पैसों से माँ के लिए यह सूट खरीदा है।

राधा से जब रहा न गया तो उसने पवन को खींचकर सीने से लगा लिया और जार जार रोने लगी मां को रोते हुए देख पवन अपने छोटे -छोटे हाथों से मां के आंसू पोछते हुए कहने लगा माँ तुम रो मत अब तुम्हारा बेटा बड़ा हो गया है। जाड़े के दिन थे और खिड़की के बाहर सूरज ढलने लगा था, दूसरी क्लास के टीचर और बच्चे भी अब कमरे में आ चुके थे। सभी की आखें नम थीं और हर कोई निशब्द खड़ा था, आज शब्दों की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि आसूं आज संवेदनाओं को शब्दों से भी बेहतर व्यक्त कर रहे थे।

रिश्ते

जीवन अपनों से ही परिभाषित होता है। जीवन की सार्थकता अपनों के बीच ही है। अपरिचित व्यक्तियों और अनजान स्थान पर जीवन व्यतीत करना मुश्किल हो जाता है। अनजानी जगहों पर मुख्य बाधा विचारों के आदान-प्रदान में आती है। जहां हम किसी से व्यवहार नहीं कर सकते और कोई हमें समझ नहीं पाता है तो वहां रहने में मुश्किल आना स्वाभाविक ही है।

संबंधों के लिए भावनाओं की जरूरत होती है। भावनाओं के तार ही हमें एक दूसरे से जोड़ने का काम करते हैं। जब तक भाव नहीं जुड़ते हैं तब तक संबंध मजबूत नहीं होते हैं और संबंधों में गहराई नहीं आती है।

जब कोई हमें समझने वाला होता है, जो हमारे सुख-दुख से संवेदित होता है, हमारे साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है तो वहां जिदंगी का फूल विकसित होकर खिलता है। जहां लोग अपने होते हैं वहां जीवन की परिस्थितियां लगभग एक जैसी होती हैं और मंजिल साथ मिलकर बढ़ने पर मिल ही जाती है।

जीवन के विकास में अपनत्व और प्रेम की बहुत आवश्यकता होती है जो हमें केवल अपनों द्वारा ही मिल पाता है, दूसरे शब्दों में जहां अपनत्व मिलता है वहीं लोग अपने होते हैं।

सामान्य रूप से हम अपने संबंधियों और परिवार के सदस्यों को ही अपना समझते हैं पर ये सब मात्र शरीर और रक्त के संबंध हैं। सच्चे संबंध तो वहां बनते हैं जहां पर विचार और भावनाएं मिलती हैं।

विचार और भावनाओं के मेल से ही संबंधों में स्थायित्व आता है, उनमें प्रेम पनपता है और रिश्तों में गर्माहट आती है। सच्चे संबंध ही जीवन को सार्थक और बेहतर बनाते हैं। हमें भी भावनाओं को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि भावनाओं की मजबूती पर ही रिश्तों की इमारत खड़ी होती है।

इंसान के रिश्ते वक्त जरूरत के मुताबिक बदलते रहते हैं, पुराने संबंध टूटते और नये बनते हैं। कभी अपने पराये तो कभी पराए अपने बन जाते हैं। पुराने लोगों की जगह नये लोग आते हैं और नया रिश्ता बन जाता है, लोग साथ छोड़कर चले जाते हैं और रिश्ता खत्म हो जाता है। कुछ संबंध एेसे भी होते हैं जो समय के परे हैं जिन रिश्तों में भावनाएं गहरी और सच्ची होती हैं उन्हें काल भी मिटा नहीं पाता है।