आँखों से कह दो तुम अपनी रज़ा को…

आँखों से कह दो तुम अपनी रज़ा को,

दुनिया सब बातों में वजह ढूंढ़ती है,

इबादत को नहीं है वजह से कोई मतलब,

दुनिया ख़ुदा को बेवजह ढूंढ़ती है।

उड़नें में कोई बुराई नहीं है,

उड़ानें भी आसमानों की पनाह ढूंढ़ती हैं,

हवाओं का रूख ही काफी नहीं है

मंज़िलें भी रास्तों के निशां ढूंढ़ती हैं।

बातों में चेहरे हैं या चेहरों में बातें हैं,

रातें भी अँधेरों में जगह ढूंढ़ती हैं,

अँधेरों की अलग से कोई हस्ती नहीं है,

लंबी रातें भी अपनी सुबह ढूंढ़ती हैं।

डरने की कोई जरूरत नहीं है,

अनहोनी भी होने की वजह ढूढंती है,

जो होना है वो तो होकर रहेगा,

दूसरों के मातम में दुनिया गुनाह ढूंढ़ती है।

पहुँचेगा कहाँ तक ये कहना मुश्किल ज़रा है,

मँज़िलें है जिद्दी और मुश्किल हवा है,

किस्मत से उलझने की आदत है पुरानी,

कोशिशों के बिना ज़िदंगी बेवजह है।

भाग रही है परछाई के पीछे,

वक्त की रेत पर पैरों के निशां ढूंढ़ती है,

क्या दिल का धड़कना ही काफी नहीं है,

क्यों ज़िदंगी दूसरों में जीने की वजह ढूंढ़ती है…

© abhishek trehan

किसी अपने ने तुझे छला है…

आँखें कह रही हैं,

किसी अपने ने तुझे छला है,

इतनी शिद्दत से तोड़ दे जो,

वो अजनबी नहीं बना है।

जो किया है दूसरों ने,

तूने भी वही किया है,

दिखा के सुनहरे सपने,

जख़्म सीने पे दिया है।

क्या हाल है हमारा,

ये अब न तुम पूछो,

जिस पर ऐतबार था हमारा,

कत्ल उसीने मेरा किया है।

बहता रहा हूँ संग तेरे,

बनके मैं खामोश पानी,

सवाल तो बहुत थे,

कभी जिक्र नहीं किया है।

एक दाग़ सुलग रहा था,

अब राख बन गया है,

यूँ कीचड़ न उछालो,

अभी हिसाब नहीं किया है।

नए खेल मत अब खेलो,

जज्बातों से किसी के,

यहाँ से बरी हुए हो,

उसने माफ़ नहीं किया है…

© abhishek trehan

जब दरख़्त पर फल आने लगे…

जब दरख़्त पर फल आने लगे,

लोग हर तरफ़ से निशाना लगाने लगे,

ये किसको ख़बर उसने क्या-क्या सहा,

लोग उसकी मेहनत को अपना बताने लगे।

दो जहाँ के दरम्याँ इतना फ़ासला रहा,

वो सहता रहा, लोग झुकाने लगे

कौन सीखता है भला बातों से यहाँ,

चोटें मिलती रहीं मौसम समझ आने लगे।

तुम जानते हो क्या ख़मोशी में क्या है छिपा,

परतें खुलने लगीं लोग कसमसाने लगे,

सौ सच हैं जिनकी कोई गवाही नहीं,

एक झूठ से लिपटकर सब कसमें खाने लगे।

हादसों ने मिटा दिया था खोने का डर,

कलियाँ खिलने लगीं,भँवरें मंडराने लगे

आँसुओं को पिया तो खुशियाँ मिलने लगीं,

सूखी टहनी पर पत्ते खिलखिलाने लगे।

दूसरों के लिए जिया तो झोली भरने लगी,

अश्कों में भी मोती मुस्कुराने लगे,

जीना है ज़िदगी में तो दरख्त सा जिओ,

जो मरकर भी दूसरों के काम आने लगे।

याद रहेगा ये दौर हमको सदा,

शहर थमने लगे,गाँव बुलाने लगे,

मुसीबत में निखरती है शख्शियतें यहाँ

लोग पुराने पीपल की पनाह में वक्त बिताने लगे…

© abhishek trehan

कुछ वक्त दे ऐ ज़िदंगी,थोड़ा संभल जाने दे…

कुछ वक्त दे ऐ ज़िदंगी,
थोड़ा सभंल जाने दे,
तेरा हर वार हम फिर सहेंगे,
पुराना जख़्म तो भर जाने दे।

मुफ़्त में सीखा नहीं है,
हमनें जीवन का फलसफ़ा,
तेरा हर कर्ज़ हम उतार देंगे,
थोड़ा मौसम तो बदल जाने दे।

खुशियों की महफिल फिर सजेगी,
लगेंगे उम्मीदों को पंख भी,
बहारें फिर मेहरबान होंगी,
थोड़ा तूफान और थम जाने दे।

नासमझ नहीं है वो,
जो शख्श आज रूक गया,
आँधियों को वो मात दे रहा,
जो शजर आज झुक गया।

हैरानी की ये बात नहीं है,
ना ज़माना ही खराब है,
कुदरत सवाल पूछ रही है,
और इंसान बे-जवाब है।

गुज़र जाएगा ये दौर भी,
कुछ वक्त और गुज़र जाने दे,
ज़िदंगी आज़मा हमें रही है,
कुछ सबक और मिल जाने दे…
© abhishek trehan

दिन बेवजह भाग रहा,खुशनुमा शाम होनी चाहिए…

दिन बेवजह भाग रहा,

खुशनुमा शाम होनी चाहिए,

दर्द हद से गुज़र गया,

मुश्किलें आसान होनी चाहिए।

मेरी आँखों में आकर देख लो,

हसरतें क्या कह रहीं,

सीने में दिल धड़क रहा,

इशारों की ज़ुबान होनी चाहिए।

बुलंदियाँ अभी छुई नहीं,

गिरने का नहीं मलाल है,

बेतहाशा सब दौड़ रहे,

ज़िदंगी का ये सवाल है।

लकीरों से शायद यही,

गिला हमको हो गया,

जो हासिल नहीं उसकी परवाह है,

जो मिला है कहीं पर खो गया।

मैं ज़िदंगी को ढूंढ़ रहा,

ज़िदंगी भी हमको ढूंढ रही,

काली रात गुज़र गई,

पूरा अब अरमान होना चाहिए।

सफ़र की हद से परे है जो,

सच का वहां मुकाम है,

जहाँ दिल भारी होने लगे,

वहाँ सच का निशान होना चाहिए…

© abhishek trehan

रात बहुत भीग चुकी…

रात बहुत भीग चुकी,

साफ आसमान होना चाहिए,

तूफ़ान आकर गुज़र गया,

बाकी निशान होना चाहिए।

दिन ने अपनी बेबसी,

किसी से कही नहीं,

रात के बाद फिर सुबह हुई,

परछाई कहीं मिली नहीं।

आज एक ख़्वाब से,

सवाल हमने पूछ लिया,

पूरा करूँ या छोड़ दूँ,

सच हैरान होना चाहिए।

मँज़िल मिले ना मिले,

ये और बात है,

आग दिल में जल रही,

चेहरे पर मुस्कान होनी चाहिए।

ले चलो हमें वहाँ,

जहाँ ख़त्म ना हो सिलसिला,

शुरूआत से अंजाम तक,

एक ही ईमान होना चाहिए।

वक्त बहुत बीत गया,

दिल मगर भरा नहीं,

कोशिशें यही कहती रहीं,

कहीं सच का मुकाम होना चाहिए…

© abhishek trehan

अपने जीवन को कैसे बदला जा सकता है?

विल स्मिथ ने कहा था है कि केवल दो चीजें हैं जो आपको सफल बनाती हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप कौन हैं या आप कहां से हैं?

वे दो चीजें हैं पढ़ते रहना और दौड़ते रहना।

दौड़ते रहना महत्वपूर्ण है क्योंकि जब आप दौड़ते समय अपनी सीमा तक पहुंचते हैं, तो आपको अपने आप से आवाज़ें मिलेंगी कि ‘ठीक है आप पहले से ही बहुत पहले भाग चुके हैं, अब रूकिये और एक BREAK लीजिए।

अपनी आवाज़ों का जवाब देते रहिये कि ‘मुझे अभी और अधिक दौड़ते रहने की ज़रूरत है, मुझे अपने लक्ष्य तक पहुंचने की ज़रूरत है’। यह आपको किसी भी समस्या का सामना करने के लिए तैयार करेगा और आपको कठिनाइयों का सामना करने के लिए आवश्यक साहस मिलेगा।

पढ़ते रहना भी बहुत जरूरी है क्योंकि लाखों, अरबों ऐसे लोग हैं जो हमसे पहले भी इस दुनिया में रह चुके हैं और आज आप जिस समस्या का सामना कर रहे हैं वह कोई अनूठी समस्या नहीं है। ऐसे लोग पहले भी रहे हैं जो इस तरह की समस्या का सामना सफलतापूर्वक कर चुके हैं। रोज़ाना पढ़ते रहिये, आपको उन सभी समस्याओं का समाधान मिलेगा जिनका सामना आप कभी करेंगे।

यह दो चीजें आपको निश्चित रूप से आपको जिंदगी भर लाभ पहुंचाएंगी।

यह सत्य है कि ‘एक किताब, एक पृष्ठ, एक पैराग्राफ और यहां तक ​​कि एक रेखा भी आपके जीवन को बदल सकती है’!

हम असफल क्यों होते हैं?

हम असफल होते हैं क्योंकि हम हमेशा कुछ न कुछ सोचते रहते हैं। चिंता सिर्फ हमारा अतीत है। जब आप हमेशा सोच रहे होते हैं तब अतीत आपका भविष्य बन जाता है और आप वास्तव में कुछ नया नहीं कर पाते हैं, अगर आप इससे पहले असफल रहे, तो आप फिर असफल होगें इसकी संभावना बनी रहती है।

आपके सामने जो कुछ भी है उसे उठाइये, अपने हाथ में पकड़िये और बस इसे देखिये एक क्षण के लिए भूल जाइये कि आप कौन हैं, आप को आगे क्या करने की ज़रूरत है, इसके बारे में मत सोचिये, इसे लेबल न करिये, उससे न्याय मत करिये, बस देखिये,क्या आप कभी ऐसे देख सकते हैं ?

विज्ञान ने साबित कर दिया है कि जिस तरह से विजन काम करता है, उस तरह से हम चीजों को उनके वास्तविक रूप में नहीं देख पाते हैं। जब प्रकाश किसी वस्तु पर पड़ता है तब यह आपकी आँखों में प्रतिबिंबित होती है, रेटिना पर इसकी उल्टी छवि बनती है, और फिर आपका मस्तिष्क वस्तु के बाहर एक समझदार तस्वीर बनाने की कोशिश करता है और हम वस्तु को उस रूप में देखते हैं।

यही कारण है कि हम असफल हो जाते हैं। क्योंकि हम चीजों को सही तरीके से देखते नहीं हैं, जिसके कारण भ्रम उत्पन्न होता है,हम भटकते हैं और फिर सफलता की उम्मीद न देखकर काम को अधूरा छोड़ देते हैं।

अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए, चीजों और व्यक्तियों को जिस तरह से वे हैं, उसी रूप में देखना सीखिये,अपनी तरफ से कुछ भी मत जोड़िये-घटाइये, कयोंकि चीजें जब अपने स्वाभाविक रूप में होती हैं तब सफलता सरल हो जाती है।

जब साथ थे तुम मेरे तब धूप थी मुस्कुराती

जब साथ थे तुम मेरे,

तब धूप थी मुस्कुराती,

जब से तुम बदल गए हो,

तब से सुबह नहीं आती।

तेरा बिना भी मौसम,

हर साल बदल रहे हैं,

जब से तुम चले गए हो,

वो बरसात नहीं आती।

तुम्हारे बिना ये जीवन,

जैसे बेरंग पानी,

अगर कुछ मिला भी दूँ तो,

वो बात नहीं आती।

मोहब्बत के ये नियम,

सबके लिए अलग हैं,

कोई चैन से है सोता,

किसी को नींद नहीं आती।

अगर कभी मिले तो,

हाल ए दिल सुनाना,

ख़ामोशी समझा सके जो

वो किताब नहीं आती।

तेरी यादों ने कर दिया है,

बेहिसाब हमें तन्हा,

अब तो ख़ुद की महफ़िल भी,

हमें रास नहीं आती।