अपने जीवन को कैसे बदला जा सकता है?

विल स्मिथ ने कहा था है कि केवल दो चीजें हैं जो आपको सफल बनाती हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आप कौन हैं या आप कहां से हैं?

वे दो चीजें हैं पढ़ते रहना और दौड़ते रहना।

दौड़ते रहना महत्वपूर्ण है क्योंकि जब आप दौड़ते समय अपनी सीमा तक पहुंचते हैं, तो आपको अपने आप से आवाज़ें मिलेंगी कि ‘ठीक है आप पहले से ही बहुत पहले भाग चुके हैं, अब रूकिये और एक BREAK लीजिए।

अपनी आवाज़ों का जवाब देते रहिये कि ‘मुझे अभी और अधिक दौड़ते रहने की ज़रूरत है, मुझे अपने लक्ष्य तक पहुंचने की ज़रूरत है’। यह आपको किसी भी समस्या का सामना करने के लिए तैयार करेगा और आपको कठिनाइयों का सामना करने के लिए आवश्यक साहस मिलेगा।

पढ़ते रहना भी बहुत जरूरी है क्योंकि लाखों, अरबों ऐसे लोग हैं जो हमसे पहले भी इस दुनिया में रह चुके हैं और आज आप जिस समस्या का सामना कर रहे हैं वह कोई अनूठी समस्या नहीं है। ऐसे लोग पहले भी रहे हैं जो इस तरह की समस्या का सामना सफलतापूर्वक कर चुके हैं। रोज़ाना पढ़ते रहिये, आपको उन सभी समस्याओं का समाधान मिलेगा जिनका सामना आप कभी करेंगे।

यह दो चीजें आपको निश्चित रूप से आपको जिंदगी भर लाभ पहुंचाएंगी।

यह सत्य है कि ‘एक किताब, एक पृष्ठ, एक पैराग्राफ और यहां तक ​​कि एक रेखा भी आपके जीवन को बदल सकती है’!

हम असफल क्यों होते हैं?

हम असफल होते हैं क्योंकि हम हमेशा कुछ न कुछ सोचते रहते हैं। चिंता सिर्फ हमारा अतीत है। जब आप हमेशा सोच रहे होते हैं तब अतीत आपका भविष्य बन जाता है और आप वास्तव में कुछ नया नहीं कर पाते हैं, अगर आप इससे पहले असफल रहे, तो आप फिर असफल होगें इसकी संभावना बनी रहती है।

आपके सामने जो कुछ भी है उसे उठाइये, अपने हाथ में पकड़िये और बस इसे देखिये एक क्षण के लिए भूल जाइये कि आप कौन हैं, आप को आगे क्या करने की ज़रूरत है, इसके बारे में मत सोचिये, इसे लेबल न करिये, उससे न्याय मत करिये, बस देखिये,क्या आप कभी ऐसे देख सकते हैं ?

विज्ञान ने साबित कर दिया है कि जिस तरह से विजन काम करता है, उस तरह से हम चीजों को उनके वास्तविक रूप में नहीं देख पाते हैं। जब प्रकाश किसी वस्तु पर पड़ता है तब यह आपकी आँखों में प्रतिबिंबित होती है, रेटिना पर इसकी उल्टी छवि बनती है, और फिर आपका मस्तिष्क वस्तु के बाहर एक समझदार तस्वीर बनाने की कोशिश करता है और हम वस्तु को उस रूप में देखते हैं।

यही कारण है कि हम असफल हो जाते हैं। क्योंकि हम चीजों को सही तरीके से देखते नहीं हैं, जिसके कारण भ्रम उत्पन्न होता है,हम भटकते हैं और फिर सफलता की उम्मीद न देखकर काम को अधूरा छोड़ देते हैं।

अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए, चीजों और व्यक्तियों को जिस तरह से वे हैं, उसी रूप में देखना सीखिये,अपनी तरफ से कुछ भी मत जोड़िये-घटाइये, कयोंकि चीजें जब अपने स्वाभाविक रूप में होती हैं तब सफलता सरल हो जाती है।

जब साथ थे तुम मेरे तब धूप थी मुस्कुराती

जब साथ थे तुम मेरे,

तब धूप थी मुस्कुराती,

जब से तुम बदल गए हो,

तब से सुबह नहीं आती।

तेरा बिना भी मौसम,

हर साल बदल रहे हैं,

जब से तुम चले गए हो,

वो बरसात नहीं आती।

तुम्हारे बिना ये जीवन,

जैसे बेरंग पानी,

अगर कुछ मिला भी दूँ तो,

वो बात नहीं आती।

मोहब्बत के ये नियम,

सबके लिए अलग हैं,

कोई चैन से है सोता,

किसी को नींद नहीं आती।

अगर कभी मिले तो,

हाल ए दिल सुनाना,

ख़ामोशी समझा सके जो

वो किताब नहीं आती।

तेरी यादों ने कर दिया है,

बेहिसाब हमें तन्हा,

अब तो ख़ुद की महफ़िल भी,

हमें रास नहीं आती।

वो दर्द भी अच्छा है

एक प्रसिद्ध कहावत है कि जीवन में आपको सबसे ज्यादा प्यार वो करता है जिसे जिंदगी में सबसे ज्यादा चोट लगी होती है। वे लोग शायद आप के साथ दूसरों की तुलना में बेहतर व्यवहार करेंगे यदि उन्होंने पूर्व में चोट खायी है।

ऐसा क्यों होता है? दरअसल जिन लोगों के अपने दिल कभी टूट चुके हों, अक्सर उन्हें पता होता है कि टूटे हुए टुकड़ों को कैसे जोड़ा जा सकता है। यही कारण है कि दूसरों से व्यवहार करते समय ऐसे लोग भावनात्मक रूप से कटौती नहीं करते हैं।

यह संभव है कि कुछ अच्छे लोग निराशावादी होते हों लेकिन समय के साथ, वे आम तौर पर सीखते हैं कि कठिन रास्तों पर चलते हुए सकारात्मक कैसे बनें? अच्छे लोग कभी नहीं चाहते हैं कि दूसरों को भी वो चोट लगे जिस तरह की चोट उन्हें लगी हैं।

ऐसा हो सकता है कि अच्छे लोगों को को उनकी शारीरिक बनावट,रंग-रूप या फिर शारीरिक अक्षमता के लिए परेशान किया जाता हो, फिर भी समय के साथ वे लोगों को माफ करके आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यह पीड़ा महसूस करने की तरह है, वे कभी भी किसी और को ऐसा ही दर्द नहीं होने देना चाहते हैं।

दूसरों को परेशान करने के बजाय, अच्छे लोग असंवेदनशीलता की चक्रीय प्रकृति को तोड़ते हैं। वे प्रशंसा और प्रोत्साहन के शब्द कहते हैं। वे चाहते हैं कि दूसरों को उनकी बदसूरती और चोटों को दिखाने के बजाय उनमें गुणों की सुंदरता और आत्मविश्वास महसूस हो। वे पहले से ही जानते हैं कि यह सब सहना कैसा है, और वे अपने सबसे खराब दुश्मनों पर भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहते हैं।

अच्छे लोग बचे रहना पसंद करते हैं जो दूसरों को भी बचे रहने में सहायता करते हैं। ऐसे लोग किसी भी परिस्थिति में और किसी भी स्थिति से अपना रास्ता निकाल सकते हैं। उनकी चोटों के निशान सबूत हैं कि वे पहले भी ऐसी पीड़ा से गुजर चुके हैं।

जीवन की दौड़ में, अधिकांश लोग आमतौर पर केवल खुद पर ध्यान देते हैं लेकिन कुछ लोग हैं जो इस तरह के संघर्षों से गुजर चुके हैं, ये लोगों के जख्मों को सहलाते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं और अपने साथ चलने के लिए दूसरों को प्रेरित करते हैं।

ऐसे लोग मदद करने वाले हाथ बन जाते हैं जैसा कि वे कभी खुद के लिए चाहते थे। शायद जीना इसी का नाम है।

शब्दों के घाव गहरे होते हैं

आज के युग मे इंसान को क्रोध बहुत जल्दी आता है. गुस्सा एक तरह का मनोविकर है जिसका मुख्य कारण तनाव पूर्ण जीवनशैली है. क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो सबसे पहले खुद को जलती है कहते है क्रोध करने वाले इंसान को उसका क्रोध स्वय सज़ा देता है.

आज बहुत दिनो की बारिश के बाद आज मौसम साफ हुआ था .पर समीर अपने कमरे मे उदास बैठा था उसकी आज ऑफीस मे फिर से किसी से किसी बात पर बहस हुई थी उसका मान गुस्से से भरा हुआ था. यू तो समीर एक होशियार और मेहनती कर्मचारी था पर उसके भीतर एक ही कमी थी कि उसे क्रोध बहुत जल्दी आता था.

छोटी छोटी बातों में अपना टेम्पर लूज कर देना समीर का स्वभाव बन गया था.अपनी इस आदत से स्वयं समीर भी परेशान था और इस आदत से छुटकारा पाना चाहता था .पर यह सब इतनी तेजी से होता था कि वो कुछ भी सोच समझ नहीं पाता था .उसने बहुत कुछ सीखा था पर क्रोध पर नियंत्रण करना वो नहीं सीख पाया था

बहुत प्रयास करने के बाद भी जब उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तो उसने अपने मित्र अनुराग से मदद माँगी. अनुराग समीर को लेकर मठ मे अपने गुरुजी के पास गया समीर ने गुरुजी से अपनी समस्या बतायी और सहयता करने की अपील की.

समीर की बात सुन कर गुरुजी मुस्कुराने लगे उन्होने समीर को कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना.

पहले दिन समीर ने छोटी छोटी बातों में दिनभर में बीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी. पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया. और फिर एक दिन ऐसा आया समीर ने पूरे दिन में एक बार भी अपना टेम्पर लूज नहीं किया.

जब उसने अपने मित्र अनुराग को ये बात बताई तो वह उसे लेकर फिर आश्रम गया जहा समीर की बात सुनकर गुरुजी ने कहा आज से, अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो उस दिन इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना.

समीर ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब समीर ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने मित्र अनुराग को ख़ुशी से ये बात बतायी.

कुछ दिनों बाद गुरुजी अनुराग के साथ समीर के घर आये और उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो. अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था.जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं.

गुरुजी के जाने के बाद समीर फिर से बाड़े के पास गया और बाड़े में हुए छेदों पर हाथ फेरने लगा उसे यह महसूस हो रहा था कि मानों ये बाड़े के छेद न होकर लोगों के ह्दय थे जिन्हें उसने अपनी बातों से छलनी कर दिया था. गुरुजी के जाने के बाद समीर फिर से बाड़े के पास गया और बाड़े में हुए छेदों पर हाथ फेरने लगा उसे यह महसूस हो रहा था कि मानों ये बाड़े के छेद न होकर लोगों के ह्दय थे जिन्हें उसने अपनी बातों से छलनी कर दिया था. उसकी आखों मे आसू आ गये थे .समीर ने मन ही मन गुरुजी को धन्यवाद दिया और निश्चय किया कि वो अब क्रोध करके इस बाड़े में और कील नहीं ठोकेंगा.

इसलिए अगली बार आप भी अपना टेम्पर लूज करने से पहले ज़रूर सोचियेगा कि क्या आप भी उस बाड़े में और कीलें ठोकना चाहते हैं!

विजेता

जगदीश सिंघानिया एक सफल बिजनेसमैन होने के साथ-साथ एक बेहतरीन इंसान भी थे। उनका जीवन मेहनत और सेवा की अद्भुत मिसाल था। उन्हें बिजनेस में जो भी लाभ होता उसका एक बडा हिस्सा वे समाज सेवा के कार्यों में खर्च करते थे।

उन्होंने अपने दिवंगत पिता के नाम से एक ट्रस्ट की स्थापना की थी जिसके माध्यम से अनेक अस्पताल, स्कूल कालेज, मंदिर आदि का संचालन होता था। अहंकार तो मानो उन्हें छू भी नहीं गया था पीड़ित मानवता की सेवा व सहायता को मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म मानते थे।

आज उनके ट्रस्ट द्वारा संचालित एक कालेज में वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था जिसका शीर्षक था ‘प्राणिमात्र की सेवा’ इस प्रतियोगिता में बतौर मुख्य अतिथि जगदीश सिंघानिया को आमंत्रित किया गया था।

प्रतियोगिता समय पर प्रारंभ हुई जिसमें बोलने के लिए कई विद्यार्थी मंच पर आए और एक से बढ़कर एक भाषण देकर भी गए, जब पुरूस्कार देने का समय आया तो सभी निगाहें निर्णायक मंडल की ओर उठ गयीं, सभी को विजेता का बेसब्री से इंतजार था तभी सिंघानिया अचानक अपनी कुर्सी पर से उठे और निर्णायक मंडल के पास जाकर कुछ कहने लगे।

कुछ देर बाद सिंघानिया पुरूस्कार देने मंच पर पहुंचे गए और उन्होंने स्वयं उन्होंने प्रतियोगिता के विजेता के नाम की घोषणा की, उन्होंने प्रतियोगिता का विजेता एक एेसे छात्र को घोषित किया था जो प्रतियोगिता में सम्मिलित ही नहीं हुआ था। यह देखकर प्रतिभागियों और कुछ शिक्षकों में भी रोष के स्वर उठने लगे। उनमें से कुछ मिलीभगत का आरोप भी लगाने लगे।

उन्हें शांत कराते हुए जगदीश सिंघानिया बोले मेरे प्रिय मित्रों एवं विधार्थीयों मुझे पता है कि इस विद्यार्थी के विजेता के रूप में चयन से आप सभी आश्चर्यचकित एवं शंकित हैं परंतु इससे पहले कि आप किसी नतीजे पर पहुंचे मैं आपको बताना चाहता हूं कि आप के कालेज के मुख्य गेट से अंदर आते समय मैने वहां एक कुत्ते को घायल अवस्था में देखा जिसके मुहं से लगातार खून बह रहा था।

हम सभी ने उसी गेट से अंदर प्रवेश किया पर किसी ने भी उस कुत्ते की ओर आंख उठा कर भी नहीं देखा। यही छात्र एकमात्र ऐसा था जिसने बिना प्रतियोगिता की परवाह किए वहां रूककर उस कुत्ते का उपचार किया,उसे पानी पिलाया और उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़कर आया।

सिंघानिया कह रहे थे कि सेवा-सहायता व्याख्यान का विषय नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की कला है। जो अपने व्यवहार और आचरण से शिक्षा देने का साहस न रखता हो, उसका ज्ञान, उसका भाषण कितना भी ओजस्वी क्यूं न हो, उसकी कथनी और करनी में फर्क होता है। एेसा ज्ञान जो व्यवहार और आचरण में न उतर सके वह अधूरा और उधार का ज्ञान होता है और एेसा ज्ञान पुरूस्कार पाने के योग्य नहीं होता है।

सत्य का पता चलते ही असंतुष्ट विधार्थीयों और शिक्षकों की गर्दन शरम से नीची हो गई और वे पुरस्कृत विधार्थी के व्यवहार के प्रति नतमस्तक हो गए। वे समझ चुके थे कि सच्चे अर्थों में विजेता वही है जिसकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है।

आँसू

आँसू भी अभिव्यक्ति का एक माध्यम हैं। ये भावनाओं के अतिरेक को दर्शाते हैं। जब मानवीय संवेदनाएं अपने चरम पर पहुंच जाती हैं तो अपने आप को आंसुओं के माध्यम से अभिव्यक्त करती हैं।

मानवीय बुद्धि तर्क प्रधान और मन भावना प्रधान है। तर्क की भाषा वाणी तो मन की भाषा मौन है जो कि आँसूओं के माध्यम से व्यक्त होती है।

जैसा कि हम समझते हैं पर आँसू अनिवार्य रूप से दुखों का कारण नहीं होते हैं। दुख के अलावा करूणा में, आनंद में, हर्ष के अतिरेक में और कृतज्ञता में भी आंसू बहते हैं।

जब ह्रदय की संवेदनाएं और भावनाएं अपने चरम पर पहुंच जातीं हैं तब खुद को संभाले रहना मुश्किल हो जाता है। जब सुख और दुख की लहरें पूरी ताकत के साथ उफान मारती हैं तो सब्र का बांध टूट जाता है और भीतर जो कुछ है वह आंसू बनकर निकलने लगता है।

आँसूओं का भावनाओं और संवेदनशीलता से गहरा रिश्ता है। जिसके दिल में दूसरों के लिए संवेदना और प्रेम है उसकी आँखों से आँसू उतनी ही जल्दी बहते हैं। कुछ लोगों के दिलों में संवेदनाओं और भावनाओं के प्रति गहरी उदासीनता होती है, एेसे व्यक्तियों का दिल पत्थर का होता है और आखों के आँसू सूख जाते हैं।

आंसुओं का संबंध न तो दुख से है और न सुख से है। इनका रिश्ता तो बस भावनाओं के अतिरेक से है। जब ह्रदय पर कोई चोट पड़ती है, जब कोई अज्ञात भाव मन को छूता है, जब उम्मीद की कोई किरण ह्रदय को स्पर्श करती है तब दिल की गहराईयों में कुछ हलचल सी मचती है जो मन में पीड़ा अथवा आनन्द का तूफान ला देती है तब एेसी भावनाएं संभाले नहीं संभलती हैं और उनकी अभिव्यक्ति आँसूओं के रूप में होती है।

जिन्दगी में हर बार दूसरा मौका नहीं मिलता

अजय कपूर एक बेहतरीन वेब डिजाइनर हैं। उनके क्लाइंट्स उनके काम के मुरीद हैं। उनके पास काम की कोई कमी नहीं है। वह स्वस्थ और सुखी जीवन जी रहे हैं। पर कुछ वर्षों पहले तक उनके जीवन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था वह पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ दोनों मोर्चों पर संघर्ष कर रहे थे।

आज से पांच साल पहले की रविवार की उस सुबह को वो कभी भी नहीं भूल सकते जब सुबह के वक्त वो अपने चार वर्ष के बेटे अर्जुन के साथ घर के बाहर लान में फुटबाल खेल रहे थे। गेंद के पीछे भागते हुए अचानक उन्होंने महसूस किया कि वो बुरी तरह हाफं रहे हैं, उनकी सांसें उखड़ रहीं थीं और चेहरा लाल हो गया था, वह बुरी तरह खांस रहे थे।

अजय कपूर की एक बुरी आदत थी जो उनकी सभी अच्छाईयों पर भारी पड़ रही थी। उन्हें धूम्रपान की लत थी। एक दिन में 10-15 सिगरेट पी जाना उनके लिए सामान्य सी बात थी। उनके दिन की शुरुआत सुबह की चाय और सिगरेट के साथ होती थी और अौर अंत रात के खाने के बाद सिगरेट से होता था। इस आदत की शुरुआत कई वर्षों पहले कालेज के समय से हुई थी जब उन्होंने दोस्तों के कहने पर शौक में सिगरेट पीना शुरू किया था। उनका यह शौक कब गंभीर लत में बदल गया इसका स्वयं उन्हें भी पता नहीं था।  शुरुआत में वो सामान्य सिगरेट पीते थे और अब डिजाइनर सिगरेट पीने लगे थे।

अजय कपूर की हालत तेजी से बिगड़ती जा रही थी। अब वह जमीन पर गिर गये थे उनकी पत्नी उनके सीने को और उनकी मां उनके पैरों के तलवों को जोर जोर से मल रहीं थीं। उनकी चेतना तेजी से लुप्त होती जा रही थी। थोड़ी ही देर में एम्बुलेंस आ गयी और उन्हें समय रहते अस्पताल पहुंचा दिया गया था। उन्हें दिल का गंभीर दौरा पड़ा था जिसका मुख्य कारण डाक्टर ने अत्यधिक सिगरेट और शराब का सेवन बताया था। उनकी बायोप्सी भी की गई थी जिसकी रिपोर्ट में कैंसर के प्रारंभिक लक्षणों की पुष्टि हुई थी।

अजय अस्पताल के अपने बिस्तर पर शांत लेटे हुए थे। उनकी मुख मुद्रा गंभीर थी उनकी आखें खिड़की के बाहर शून्य में कुछ तलाश रहीं थीं। आज उनका दिल उनसे कुछ कह रहा था एेसा नहीं था कि उनका दिल पहले कुछ नहीं कहता था वो पहले भी उनसे बातें करता था पर उनके जीवन में इतना कोलाहल था कि उसकी आवाज उन तक नहीं पहुंच पाती थी। उन्हें याद आ रहा था कि उनकी मां और पत्नी ने न जाने कितनी बार उनसे इस बुरी आदत को छोड़ देने को कहा था पर हर बार उन्होंने उनकी बातों को धुएं में उड़ा दिया था। पहले उन्होंने सिगरेट को पिया था और अब सिगरेट उन्हें पी रही थी।

कुछ दिनों के बाद अजय को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी और वो अपने घर वापस आ गए थे ।पर उनकी समस्याएं अभी समाप्त नहीं हुईं थीं उन्हें अभी एक लम्बी लड़ाई लड़नी थी और यह लड़ाई उनकी खुद से थी। वर्षों से जमी हुई आदतें यूं ही नहीं जाती हैं। इंसान का मन बार बार सही गलत कुछ भी लॉजिक देकर उन आदतों पर वापस लौट आना चाहता है। इन्हें उखाड़ फेंकने के लिए आवश्यकता होती है दृढ़ इच्छाशक्ति और मनोबल की जो लगातार अभ्यास और संयम से आता है।

कहते हैं इंसान को वक्त सब कुछ सिखा देता है। अजय कपूर को भी वक्त ने काफी कुछ सिखा दिया था । बीते वक्त की परिस्थितियों और मुश्किलों ने उन्हें मजबूत बना दिया था। लंबे समय तक उन्होंने खुद से संघर्ष किया और अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इस बुरी आदत से छुटकारा पा लिया। 

सौभाग्यशाली थे अजय कपूर जो समय रहते संभल गए और मौत के मुंह से बाहर निकल आए। यदि आप में भी कोई एेसी बुरी आदत है तो उसे अपनी मजबूत इच्छाशक्ति और मनोबल के सहारे उखाड़ फेंकिये। याद रखिए जिन्दगी में हर किसी को दूसरा मौका नहीं मिलता, हर कोई अजय कपूर की तरह भाग्यशाली नहीं होता।

दूसरों के दर्द को बांटना ही संवेदना है

जीवन में संवेदनाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। यह संवेदना ही है जो इंसान और मशीन में फर्क करती हैं। आज एेसे बहुत से इंसानी काम हैं जो आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के माध्यम से रोबोट कर सकते हैं। बस यह संवेदनाएं ही हैं जो अभी तक विज्ञान और मशीन के परे हैं।

संवेदनशीलता यानि, दूसरों के दुःख-दर्द को समझना, अनुभव करना और उनके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।

वह जेठ के महीने की एक दोपहर थी जब अविनाश जो कि कस्बे के डाकघर में पोस्टमैन था ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,चिट्ठी ले लीजिये। अंदर से एक लड़की की आवाज आई,आ रही हूँ। लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो अविनाश ने फिर जोर से आवाज लगाकर कहा,अरे भाई! मकान में कोई है क्या, अपनी चिट्ठी ले लो। तपती दोपहर की गर्मी ने अविनाश को कुछ बेचैन कर दिया था।

लड़की ने अंदर से ही उत्तर दिया,पोस्टमैन साहब, दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ। अविनाश ने सोचा लगता है कि इस लड़की को दूसरे की समस्या से कोई लेना-देना नहीं है तभी बार -बार पुकारने पर भी यह जल्दी नहीं आ रही है फिर भी उसने खुद को संभाला और कहा,नहीं, मैं खड़ा हूँ, रजिस्टर्ड चिट्ठी है,रसीद पर तुम्हारे साइन चाहिये। करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। अविनाश इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही, लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज लड़की जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी।

अविनाश अपनी सोच पर शर्मिंदा हुआ और चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। इसके बाद में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, अविनाश एक आवाज देता और जब तक वह लड़की न आ जाती तब तक खड़ा रहता। उस लड़की का नाम आरूषि था। एक दिन अविनाश आरूषि की डाक लेकर आया था तभी आरूषि ने देखा कि अविनाश के पांवों की चप्पलें टूट गई हैं, उसने सोचा कि बिना टूटी चप्पलें पहन कर घर घर जा कर डाक बांटने में अविनाश को कितनी तकलीफ होती होगी। दीपावली नजदीक आ रही थी वह सोच रही थी कि पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ।

उस दिन जब अविनाश डाक देकर चला गया, तब उस आरूषि ने, जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये।

दीपावली के कुछ दिन बाद अविनाश आरूषि की डाक लेकर आया उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई,कौन? पोस्टमैन, उत्तर मिला। आरूषि हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,अंकल, मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह गिफ्ट है। आरूषि ने कहा,अंकल प्लीज़ इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना। बिटिया को मना करके अविनाश उसके दिल को तोड़ना नहीं चाहता था। उसने अनमने भाव से लड़की के हाथ से पैकेट लिया और ठंडा शुक्रिया देकर चला गया।

घर जाकर जब अविनाश ने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे। साथ ही एक पत्र भी था जिसमें सुन्दर हैंडराइटिंग में लिखा था ” एक छोटी सी भेंट उन पैरों के लिए जिनको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है”। उसकी आखों में आंसू आ गए। अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए।

पोस्टमास्टर ने कारण पूछा,तो अविनाश ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,” सर आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?”

पोस्टमास्टर भला व्यक्ति था उसने कहा अविनाश ईश्वर से प्रार्थना है कि वह बिटिया जहां रहे यू हीं खुशियां बिखेरती रहे। वह ईश्वर हमें भी संवेदनाओं से भरा मन प्रदान करे ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें। संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है,अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है। अपनी बात खत्म करते हुए पोस्टमास्टर ने कहा अविनाश ईश्वर ढूंढने से कही नहीं मिलता वह एेसे ही किसी रूप में हमारे सामने आ जाता है और अहसास करा जाता है अपने होने का, वास्तव में जीना इसी का नाम है।