काॅन्फिडेंस और ओवरकाॅन्फिडेंस के बीच क्या फर्क है?

1- जब आप सोचते हैं कि मैं इसे कर सकता हूं क्योंकि मैंने इसकी तैयारी की है तो यह आपका काॅन्फिडेंस है, जबकि जब आप सोचते हैं कि मैं इसे आसानी से कर सकता हूं और मुझे किसी भी तैयारी की आवश्यकता नहीं है तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

2- जब आप सोचते हैं कि मुझे दूसरों की भी सुननी चाहिये तो यह आपका काॅन्फिडेंस है,जबकि जब आप सोचते हैं कि दूसरों को सिर्फ मेरी ही सुननी चाहिये तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

3- जब आप सोचते हैं कि मैं अपना सर्वश्रेष्ठ दूंगा और उन्हें मुझे सेलेक्ट कर लेना चाहिए तो यह आपका काॅन्फिडेंस है, जबकि जब आप सोचते हैं कि अगर वे मुझे सेलेक्ट नहीं करते हैं तो इसका मतलब है कि वे मूर्ख हैं तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

4- जब आप हमेशा दूसरों से सम्मान चाहते हैं तो यह आपका काॅन्फिडेंस है जबकि जब आप हमेशा दूसरों का ध्यान चाहते हैं तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

5- जब आप सोचते हैं कि मैं गलतियाँ करता हूं और उन्हें दोहराने की कोशिश नहीं करता हूं तो यह आपका काॅन्फिडेंस है, लेकिन जब आप सोचते हैं कि मैं परफेक्ट हूं और कोई गलती नहीं करता हूं तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

6- जब आप पहले सोचते हैं फिर बोलते हैं तो यह आपका काॅन्फिडेंस है,जबकि जब आप पहले बोलते हैं फिर सोचते हैं तो यह आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

7- ऐसा सोचना कि मैं यह कर सकता हूं यह आपका आत्मविश्वास है जबकि यह सोचना कि केवल मैं ही इसे कर सकता हूं यह यह आपका अतिआत्मविश्वास है।


8- किसी भी चीज के पक्ष और विपक्ष पर भली-भांति विचार करने के बाद रिस्क उठाना आपका काॅन्फिडेंस है, जबकि झूठे अहंकार के प्रभाव में लापरवाही से व्यवहार करना आपका ओवरकाॅन्फिडेंस है।

9- मुझे पता है कि मैं कौन हूं यह आपका आत्मविश्वास है जबकि मैं उन्हें दिखाना चाहता हूं कि मैं मैं कौन हूं यह आपका अतिआत्मविश्वास है।

कड़वे सच

1- हम एक असली दुनिया में रह रहे हैं और असली दुनिया आदर्शों से बहुत दूर होती है।

2- हमें विश्वासघात अक्सर उन लोगों से मिलता है जिन पर हम सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं।

3- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने अच्छे इंसान हैं, कुछ बार आपका दिल जरूर टूटेगा। अच्छी बात यह है कि समय के साथ सबकुछ ठीक हो जाता है और आप पहले से बेहतर और मजबूत हो जाएंगे।

4- जीवन निष्पक्ष नहीं है यहां बहुत से ऐसे कड़ी मेहनत करने वाले लोग हैं जो गरीबी और मुफलिसी का जीवन जी रहे हैं वहीं दूसरी ओर मूर्ख और आलसी लोग जीवन की सर्वश्रेष्ठ लक्जरी का आनंद ले रहे हैं।

5- आप लोगों से आपके साथ अच्छा व्यवहार करने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। उम्मीद टूटने पर तकलीफ होती है लेकिन जीवन में आप लोगों से उम्मीद रखना भी छोड़ नहीं सकते हैं।

6- कोई भी कमजोर इंसान से प्यार नहीं करता है। शुरूआती दिनों में लोग आपसे सहानुभूति दिखाएंगे, लेकिन बाद में आप उनके लिए बोझ बन जाएंगे।

7- हर बार कर्म का नियम काम नहीं करता है। कभी-कभी आपको अपने अच्छे कर्मों के लिए बुराई का सामना करना पड़ता है लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अच्छे कर्मों को करना बंद कर दिया जाए।

8- जीवन में सब कुछ एक्सपायरी डेट के साथ आता है चाहे वह आपकी खुशियां हों या फिर दुख यहां सबकुछ अस्थायी है।

9- आपके माता-पिता हमेशा आपके साथ नहीं होंगे। उनके साथ कुछ समय बिताएं और उनकी खुशी के लिए कुछ जरूर करिये ।

10- जब आप सोचते हैं कि आखिरकार सब कुछ ठीक हो गया है, तब जिंदगी हमेशा आपको झटका देकर एक बार फिर से उलझा देती है।

नसीब

नसीब पासा फेंकने की तरह है और आप इसकी सटीक भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। यदि सब कुछ आपकी इच्छा के अनुसार घटित होता है तो अच्छा है और यदि ऐसा नहीं होता है तो फिर अपने कौशल में सुधार करने के लिए काम करना जारी रखिये।

नसीब ऐसी चीज़ नहीं है जिसे आप नियंत्रित कर सकते हैं, जबकि कड़ी मेहनत आपके हाथ में है जो आपके चांसेज को बेहतर बनाती है। आप जिसे नियंत्रित नहीं कर सकते हैं उसके बजाय जो आपके नियंत्रण में है उस पर अपने ध्यान को केंद्रित करना हमेशा बेहतर होता है।

लोग आपसे अधिक प्रतिभाशाली हो सकते हैं लेकिन कड़ी मेहनत ज्यादा या कम करने का किसी के पास कोई बहाना नहीं होता है, जीवन में कड़ी मेहनत करने का अवसर सबके पास समान होता है।

जीवन की दो चाबियाँ कड़ी मेहनत और किस्मत हैं। जब ये दोनों चाबियाँ एक साथ काम करती हैं, तो आपके जीवन का ताला खुल जाता है।

कड़ी मेहनत सीढ़ियों की तरह है और किस्मत लिफ्ट की तरह है, कभी-कभी लिफ्ट फेल हो सकती है लेकिन सीढ़ियांं हमेशा आपको ऊपर की तरफ ले जाएंगी।

आपको अपनी कड़ी मेहनत का परिणाम हो सकता है तुरंत या फिर निकट भविष्य में ना मिले, लेकिन अंततः इसका परिणाम मिलकर रहेगा क्योंकि मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती है।

कभी-कभी आप अपनी कड़ी मेहनत को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते हैं और लोग इस गलतफहमी में उसे आपका नसीब समझ लेते हैं।

जिन्हें फिक्र थी कल की…

जिन्हें फिक्र थी कल की वो रोए रात भर,

जिन्हें यकीन था खुदा पर वो सोए रात भर।

हालात ने जैसे चाहा वैसे हम ढल गए,

बहुत संभल कर चले थे लेकिन पैर फिसल गए।

चलते रहे जिंदगी की राहों पर बहते पानी की तरह,

जीवन में लोग आते- जाते रहे सफर के मुसाफिर की तरह।

जो न कहना था लबों को वो नज़रों ने कह दिया,

करवां गुजर चुका था अकेला मैं रह गया।

जब चले सच की राह पर तो उसूल कुछ तोड़ने पड़े,

जहां पर मेरी गलती न थी वहां भी हाथ मुझे जोड़ने पड़े।

सजदे पर झुकने की वजह भी क्या कमाल होती है?

झुकता है सिर जमीन पर, दुआ कुबूल आसमान में होती है।

मन

दुनिया में दिखाई देने वाली हर चीज़, हर वस्तु के तीन आयाम होते हैं। यह तीन आयाम हैं – लंबाई, चौड़ाई और गहराई। हमारा मन भी त्रिआयामी है। हमारे मन के तीन आयाम चेतन, अचेतन और अतिचेतन हैं। मन की संरचना भी किसी भौतिक पदार्थ की भांति ही है बस फर्क इतना है कि मन सूक्ष्म होता है इसलिए दिखाई नहीं देता है जबकि भौतिक पदार्थ स्थूल होते हैं इसलिए दिखाई पड़ते हैं।

हमारा सामान्य जीवन क्रम मन की चेतन अवस्था से संबंधित होता है। हमारी दिनचर्या से जुड़े सभी कार्य चेतन मन से संचालित होते हैं। हमारी नींद व सपनों का संबंध अचेतन मन से है जब हम सो जाते हैं तब हमारा अचेतन मन जाग्रत रहता है। मन का अतिचेतन स्तर अत्यधिक सूक्ष्म है जिसका संबंध ध्यान, आंनद और निस्वार्थ भावना से होता है।

मन की संरचना काफी हद तक समुद्र में डूबी हुई विशालकाय बर्फ की चट्टान के जैसी होती है जिसका कुछ हिस्सा सतह के ऊपर होता है जिसे हम देख पाते हैं हालांकि यह संपूर्ण चट्टान का बहुत छोटा हिस्सा होता है इसे हम चेतन मन कह सकते हैं।

बर्फीली चट्टान का शेष भाग पानी में डूबा रहता है। इसे हम तब तक नहीं देख पाते हैं जब तक हम स्वयं गहराई में न जाएं। चट्टान के इस हिस्से की तुलना अचेतन मन से की जा सकती है। कठिन होता है अचेतन तक पहुंच पाना।

इन दो हिस्सों के अतिरिक्त बर्फीली चट्टान का एक हिस्सा वाष्प बन जाता है और आकाश में छोटे-छोटे बादल बनकर मंडराने लगता है। यही अतिचेतन मन है। उस बादल तक पहुंच पाना करीब – करीब असंभव है यही कारण है कि ध्यान कठिन है और समाधि दुसाध्य है।

जागरण व चिंतन की घटनाएं चेतन मन में सम्पन्न होती रहती हैं। जब हम गहरी नींद में होते हैं और चेतन मन शांत होता है जाता है तब अचेतन मन क्रियाशील होता है। जब अचेतन मन भी शून्य हो जाता है तब अतिचेतन में प्रवेश मिलता है हालांकि यह अवस्था बिरलों को ही प्राप्त हो पाती है।

शब्दों के घाव

आज के युग मे इंसान को क्रोध बहुत जल्दी आता है, गुस्सा एक तरह का मनोविकर है जिसका मुख्य कारण तनाव पूर्ण जीवनशैली है, क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो सबसे पहले खुद को जलती है कहते है क्रोध करने वाले इंसान को उसका क्रोध स्वय सज़ा देता है।

आज बहुत दिनो की बारिश के बाद आज मौसम साफ हुआ था पर समीर अपने कमरे मे उदास बैठा था उसकी आज ऑफीस मे फिर से किसी से किसी बात पर बहस हुई थी उसका मन गुस्से से भरा हुआ था, यू तो समीर एक होशियार और मेहनती कर्मचारी था पर उसके भीतर एक ही कमी थी कि उसे क्रोध बहुत जल्दी आता था।

छोटी छोटी बातों में अपना टेम्पर लूज कर देना समीर का स्वभाव बन गया था, अपनी इस आदत से स्वयं समीर भी परेशान था और इस आदत से छुटकारा पाना चाहता था पर यह सब इतनी तेजी से होता था कि वो कुछ भी सोच समझ नहीं पाता था उसने बहुत कुछ सीखा था पर क्रोध पर नियंत्रण करना वो नहीं सीख पाया था।

बहुत प्रयास करने के बाद भी जब उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तो उसने अपने मित्र अनुराग से मदद माँगी, अनुराग समीर को लेकर मठ मे अपने गुरुजी के पास गया समीर ने गुरुजी से अपनी समस्या बतायी और सहयता करने की अपील की।

समीर की बात सुन कर गुरुजी मुस्कुराने लगे उन्होने समीर को कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना।

पहले दिन समीर ने छोटी छोटी बातों में दिनभर में बीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया और फिर एक दिन ऐसा आया समीर ने पूरे दिन में एक बार भी अपना टेम्पर लूज नहीं किया।

जब उसने अपने मित्र अनुराग को ये बात बताई तो वह उसे लेकर फिर आश्रम गया जहा समीर की बात सुनकर गुरुजी ने कहा आज से, अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो उस दिन इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना।

समीर ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब समीर ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने मित्र अनुराग को ख़ुशी से ये बात बतायी।

कुछ दिनों बाद गुरुजी अनुराग के साथ समीर के घर आये और उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो। अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था,जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं।

गुरुजी के जाने के बाद समीर फिर से बाड़े के पास गया और बाड़े में हुए छेदों पर हाथ फेरने लगा उसे यह महसूस हो रहा था कि मानों ये बाड़े के छेद न होकर लोगों के ह्दय थे जिन्हें उसने अपनी बातों से छलनी कर दिया था। उसकी आखों मे आसू आ गये थे .समीर ने मन ही मन गुरुजी को धन्यवाद दिया और निश्चय किया कि वो अब क्रोध करके इस बाड़े में और कील नहीं ठोकेंगा।

इसलिए अगली बार आप भी अपना टेम्पर लूज करने से पहले ज़रूर सोचियेगा कि क्या आप भी उस बाड़े में और कीलें ठोकना चाहते हैं ?

मोटिवेशन


मोटिवेशन की अवधारणा आधुनिक मैनेजमेंट का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसकी जड़ में दो विचारधाराएं काम करती हैं. इनमें से एक को नकारात्मक विचारधारा या Theory X कहते हैं. और दूसरी को सकारात्मक विचारधारा या Theory Y कहते हैं.

Theory X के अनुसार कर्मचारी स्वभाव से ही आलसी, काम को टालने वाले और डेडलाइन को फालो नहीं करने वाले होते हैं. अतः मैनेजमेंट को कर्मचारियों के साथ कड़ाई से पेश आना चाहिए और सख्त नियंत्रण के साथ उत्पादन को बढ़ाने पर जोर देना चाहिए. मोटिवेशन की यह विचारधारा औद्योगिक क्रांति के समय में अमेरिका और यूरोप की कंपनियों में लोकप्रिय थी जिसका उद्देश्य कम लागत पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना था. डिसीपलिन और Layoff का कॉन्सेप्ट Theory X का बेहतरीन उदाहरण है.

वहीं Theory Y या मोटिवेशन की सकारात्मक विचारधारा का सारा फोकस कर्मचारियों के मानवीय पहलू पर होता है. इस थ्योरी के अनुसार अधिकतर कर्मचारी कर्मठ, जिम्मेदारी को समझने वाले और कर्तव्यों का निर्वाह करने वाले होते हैं. अतः मैनेजमेंट को कर्मचारियों के साथ उदारता से पेश आना चाहिए और परस्पर सहयोग के द्वारा लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए. टीम वर्क और सामूहिक डिसिजन मेकिंग का कॉन्सेप्ट Theory Y का बेहतरीन उदाहरण है. मोटिवेशन की यह विचारधारा नब्बे के दशक में ग्लोबलाइजेशन के उपरांत मल्टीनेशनल कंपनियों में काफी लोकप्रिय रही है.

यहां यह सवाल उठाना लाजिमी है कि मोटिवेशन की कौन सी विचारधारा लोगों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है? लोग किस विचारधारा से ज्यादा प्रभावित होते हैं? बिहेवियरल सांइस के क्षेत्र में हुए शोध से पता चलता है कि अत्यधिक सख्ती एवं अत्यधिक उदारता दोनों ही स्थितियां उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं. कर्मचारियों को नियंत्रण एवं छूट दोनों की आवश्यकता होती है. पर यह कितनी, कब, कैसे हो इसका सही निर्धारण ही कंपनी के HR मैनेजमेंट की काबिलियत को निर्धारित करता है.

लोग ही किसी भी कंपनी या संस्था के सबसे बड़े asset होते हैं. उन्हे नियंत्रित करना और बढ़ावा देना दोनों ही मैनेजमेंट की जिम्मेदारी है. जिस तरह स्वादिष्ट खीर के लिए दूध और चीनी की सही मात्रा में होना आवश्यक है ठीक उसी तरह कर्मचारियों के लिए भी संतुलित मात्रा में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही तरह के मोटिवेशन आवश्यक होते हैं.

नई शुरूआत

1- आपको हर बार शुरू करने के लिए एक नये दिन की आवश्यकता नहीं होती है, कभी-कभी आपको केवल अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत होती है जिसके बदलते ही परिणाम भी बदल जाते हैं।

2- आज का दिन सिर्फ एक और दिन नहीं है, यह आपके लिए अपने सपनों को सच करने का एक और मौका है।

3- कुछ खास आपका हर दिन इंतजार कर रहा है, आपको बस इसे पहचानना है और इस मौके को पूरी तरह भुनाना है।

4- प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत आपके विचार हैं, इसलिए अच्छा सोचिए और खुद को जीतने के लिए प्रेरित करिए।

5- आपकी पिछली गलतियां आपको परिभाषित नहीं करती हैं। इनका होने मतलब बस आगे के रास्तों पर चलने के लिए आपके मार्गदर्शन करने के लिए है।

6- जो आपने कल पूरा नहीं किया उसके पछतावा में आज मत जागिए, आज आप जो हासिल करेंगे उसके बारे में सोचते हुए जागिए।

7- सब कुछ आपके दिमाग से शुरू होता है और वहीं पर समाप्त होता है। आप जो सोचतें हैं वही आप पर राज करता है।

8- यह दिन कभी भी आपके जीवन में कभी वापस नहीं आएगा, उठिए और इससे सर्वश्रेष्ठ हासिल करने का प्रयास कीजिए।

9- हम जो सबसे बड़ी गलती करते हैं, वह यह है कि अन्य लोग भी उसी तरह से सोचते हैं, जिस तरह से हम सोचते हैं।

तुलना

आज जाऊं या नहीं जाऊं ? लोग क्या सोचेंगे ? कल उनका सामना कैसे करूंगा ? झूठ बोला नहीं जाता,सच परेशान होता है। असमंजस,दोहरा रास्ता,संकोच.शायद हम सभी ऐसे ही जीते हैं। यह डर है, नकारे जाने का डर, अपमानित होने का डर ,असफल हो जाने का डर ,अज्ञात का डर आदि। कैसे सामना करें ?  क्या फैसला करें ? सही फैसला क्या होता है?  यहाँ विरोधाभास है, सही को गलत और गलत को सही बताने और उसकी व्याख्या करने के सबके अपने नजरिये हैं।

बिहेवियरल सांइस में एक थ्योरी है जिसे इक्विटी थ्योरी कहते हैं, इस के अनुसार व्यक्ति चार तरह से तुलना कराता है – खुद की खुद से, खुद की दूसरों से, दूसरों की खुद से, और दूसरों की दूसरों से। इस तुलना में वो दो कारकों को इस्तेमाल करता है- आन्तरिक और वाह्य कारक  व्यक्ति अपनी सफलता के लिए आन्तरिक और असफलता के लिए वाह्य कारकों को जिम्मेदार मानता है। इन दो कारकों को इस्तेमाल करके वह एक सन्तुलन बना लेता है और उसी के अनुसार उसकी सोच बन जाती है।

जब कभी यह सन्तुलन बिगड़ जाता है  तब वह उत्तेजित, निराश या परेशान हो जाता है।  उसकी परेशानी तब तक रहती है जब तक उसे सन्तुलन बनाने के लिए उचित कारक नहीं मिल जाता है। वह तलाश कराता है इन कारकों की बाहर और भीतर और चैन की तलाश में और बेचैन हो जाता है।उसकी तलाश पूरी होती है जब वह पूरी ईमानदारी से खुद को तलाशता है।


दिन में रात की तलाश, रात में सुबह की तलाश, साथ में अकेलेपन की और अकेलेपन में साथ की तलाश, यही सिलसिला चलता रहता है और हम सब गोल गोल घूमता रहते हैं। हम रोज सफर पर जाते हैं पर शाम को खुद को वहीं पाते हैं। हम रास्ते बदलते हैं, साथ बदलते हैं, मँजिल बदलते हैं,पर हम खुद को नहीं बदलते हैं। हम कभी किस्मत को तो कभी खुद को दोषी ठहराते हैं। बेचैनी बढ़ती जाती है और हम ढूंढते रहते हैं। हम जितना ढूंढते जाते हैं उतना ही खोते जाते हैं ।

जितना गहराई में जाओगे खुद को उतना अकेला पाओगे। आज जो भी फैसला लोगे वो न तो सही और न ही गलत होगा।सब मन का खेल है.निश्चिंत होकर खेलो क्योंकि खेल चलता रहता है और खिलाड़ी बदल जाते हैं।जब इन्सान खुद के लिए ईमानदार हो जाता है तब उसे अपना अक्स साफ दिखने लगता है फिर उसकी मुलाकात होती है खुद से और वो जान जाता है कि अपने दुखों का कारण और निवारण दोनों वह खुद है। इसे ही साइकॉलजी की भाषा में सेल्फ रिलाइजेशन कहते हैं। मैं भी खुद को ढूंढ रहा हूँ आप भी ढूंढिए, किसी ने बताया है ये रास्ता हमारे अंदर से हो कर जाता है…

कौन सफल,कौन असफल ?

ऐसा नहीं है कि हर कोई सफल होना चाहता है , अधिकांश लोग अपनी दुनिया में ही इतने खोए हुए हैं कि उसके अतिरिक्त उन्हें कुछ सोचने की इच्छी ही नहीं होती है। लेकिन वास्तव में सफल लोगों में कुछ हासिल करने की प्रबल इच्छा होती है उनके दिमाग में उनके लक्ष्य स्पष्ट होते हैं।

यदि आपके पास कीमती पेन नहीं है, बढ़िया कागज और मेज नहीं है, तो क्या आप कुछ नहीं लिखेंगे? यदि आपके पास अच्छे कपडे और बढ़िया कार नहीं हैं, तो क्या आप उन्नति नहीं करेंगे? यदि आपके घर के इर्द-गिर्द शोर होता है, तो क्या आप कुछ भी नहीं करेंगे? यदि हमारी लाइफ स्टाइल, भोजन आदि ऊंचे स्टैन्डर्ड की नहीं है, तो क्या हम निराशा से भर जायेंगे?

निराश मत होइये यदि हमारे पास बढ़िया मकान, अच्छे कपडे, बढ़िया कार इत्यादि ऐश्वर्य की वस्तुएँ नहीं हैं। ये हमारी उन्नति में बाधक नहीं हैं। उन्नति की मूल वस्तु-महत्वाकाँक्षा है। जो न जाने मन की किस अतल गहराई में छिपी पड़ी है। आत्म-परीक्षण कीजिये और इसे खोजकर निकालिये।

सफलता की गारंटी कभी नहीं होती है। सफल और असफल लोगों के बीच एक मौलिक अंतर यह है कि जो लोग सफल होते हैं वे नम्रता से अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं ऐसे व्यक्ति अपनी गलतियों से सीखते हैं और आगे बढ़ते हैं।

दुनिया को चलाने और सुधारने की जिम्मेदारी हमारी नहीं है। पर जीवन में हमारे जो कर्तव्य हैं उन्हें सच्चे मन से पूरा करने का प्रयास करना निश्चय ही हमारी जिम्मेदारी है। अपने आपको व्यवस्थित करके हम दुनिया के संचालन और सुधार में अपनी ओर से सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

सफलता पाने के लिए एक बहुत सरल दृष्टिकोण यह भी है कि यदि आप केवल कुछ चीजों के साथ पर्याप्त मात्रा में खुश हैं तो सफलता आसानी से मिल जाएगी। इसके लिए हमें उन चीज़ों को पाने के लिए खुद को चोट पहुँचाने से बचना चाहिये जिनकी हमें ज़रूरत नहीं है, हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके भी सफल हो सकते हैं। हांलाकि बहुत से लोग इसे समझ नहीं सकते हैं और आपको अपने दृष्टिकोण से असफल मान सकते हैं, लेकिन सफलता के लिए इस दुनिया में कौन किसकी परवाह करता है?