कितना कुछ तुम देते हो…

कितना कुछ तुम देते हो
कितना वापस ले लेते हो
कुछ तो बताओ मेरे मालिक
ये खेल कैसे खेल लेते हो

माना तू हमें नहीं हासिल है
क्या हम तेरे नहीं काबिल हैं
एक अकेले तुम सबका सहारा
इतनी उम्मीदें कैसे सह लेते हो

दो लफ़्ज़ों की कहानी है
छोटी सी ज़िदंगानी है
कहते नहीं हो तुम कुछ भी लेकिन
इतने दिलों में कैसे रह लेते हो

हर आँख में थोड़ा पानी है
ज्यादा कहना बेमानी है
खुली आँखों से मिलते नहीं हो
बंद आँखों से सब कह लेते हो

हर सफ़र से लौट आता है
परिंदा भी पनाह चाहता है
कितना भी समेट लो यहाँ पर
सब यहीं पर रह जाता है

कितना कुछ बाकी है
तेरी रहमत का दिल आदी है
कितनी गलतियाँ मैं करता हूँ
फिर भी मौका मुझको दे देते हो…
© abhishek trehan

हर अधूरी पहल में छिपा है…

person taking photo with his cellphone
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हर अधूरी पहल में छिपा है
कोई मुकर्रर अंजाम भी
शर्त है पहले बेशुमार कोशिशें तो करना सीख लो

मिल जाएगा अधूरे सफ़र को
कोई मुकम्मल मुक़ाम भी
शर्त है पहले राह की दुश्वारियाँ तो झेलना सीख लो

पूरी होंगी वो हसरतें भी
जो बादलों में उड़ने की हैं
शर्त है पहले हवाओं का रूख़ समझना तो सीख लो

चुन लेना वो नायाब मोती
जो कहीं सागर में है छिपा
शर्त है पहले पानी में गहरे उतरना तो सीख लो

दिल की गहराईयों में
जैसे हो कोई नग़मा छिपा
शर्त है गाने से पहले गुनगुनाना तो सीख लो

मिल जाएगा वो भी कभी
जिसकी तुम्हें तालाश है
शर्त है दूसरों से पहले ख़ुद को पाना तो सीख लो

जिंदगी के तजुर्बों में मिलेंगे
कुछ सवालों के जवाब भी
शर्त है तजुर्बों से पहले ठोकरें खाना तो सीख लो

बातों के मकसद में छिपा है
बातों का अंजाम भी
शर्त है अंजाम से पहले बातों को परखना तो सीख लो..
© abhishek trehan

पिता…

कभी बादल जैसा बरस रहा
कभी ख़ामोश गहरा समंदर है
कभी पिता है छांव पीपल की
कभी पिता ही नीला अंबर है

नादान परिंदे क्या जानें
हँसता हुआ पिता भी टूटा अंदर है
उसका दिल भी मोम सा नाज़ुक है
फिर भी हर पिता मजबूत सिकंदर है

उन पर ख़ुदा की नेमत है
जिनके सिर पे पिता का साया है
ज़िदंगी है धूप जेठ महीने की
पिता नीम की शीतल छाया है

नासमझ हैं वो,जो परख रहे
उस पिता की बेइंतहा कुर्बानी को
जिसने ख़ुदा से बस यही दुआ है की
माफ़ करना बच्चों की हर नादानी को

मुझसे शुरू होकर,मुझ पर ख़त्म हुई
मेरे पिता की यही कहानी है
होगें लाख चाहने वाले मेरे दुनिया में
नहीं मेरे पिता का कोई सानी है

जब खोया तुम्हें तब पता चला
दुनिया कितनी सूखी और बंजर है
लोग ढूँढ़ते हैं तुम्हें अब तस्वीरों में
मुझे दिखता उसमें मेरा पैंगम्बर है…

© trehan abhishek

जिसके मन में बुद्ध हैं…

buddha statue
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जिसके मन में बुद्ध हैं
वो कभी पाप नहीं करता
जिसका मन अशुद्ध है
वो गलतियों पर विचार नहीं करता

शास्ता रहमत ऐसी करो
मन के सब विकार मिट जाएँ
वासनाओं में छिपा काँटा
किसी का इंतज़ार नहीं करता

अंहकार जब मिटेगा
तब गलतियाँ दिखाई देंगी
प्रभू राह तुम दिखा दो
मैं चलने से इन्कार नहीं करता

जाने कब मिल जाए किसी को
किस मोड़ पे रोश्नी
सिर्फ किताबों को पढ़कर
कोई समझदार नहीं बनता

वैसे तो होते हैं
बातों के बहुत मतलब
जब भेदती हैं तेरी नज़रें
कोई अल्फाज़ नहीं मिलता

रहता है तेरा मालिक
साथ तेरे हमेशा
शर्तें तुम हटा लो
बुद्ध व्यापार नहीं करता…
© abhishek trehan

दिल में तेरे खोट है…

दिल में तेरे खोट है
ज़ुबां पे तेरी प्यार है
कैसे तेरा सजदा करूँ
ये इश्क नहीं व्यापार है

धोखे यूं ही मिलते नहीं
किया हवाओं पर ऐतबार है
दुनिया का यही उसूल है
मिलते सच को जख़्म हजार हैं

ये वक्त-वक्त की बात है
एक निशान दाग बन गया
वफ़ा का रंग सफेद है
रंग झूठ के बेशुमार हैं

किसी से क्या शिकवा करें
शिकायत ही दुआ हो गई
तुम पलकें झुका कर चल दिए
हवाएं भी धुआं हो गई

बस एक सादगी के सिवा
कुछ  और नहीं मेरे पास है
ये दुनिया बहुत रंगीन है
सिर्फ शून्य ही निर्विकार है

आधा फलक पर चाँद है
आधा ही सच दिख रहा
आधा ही तेरा इश्क था
हम तेरे शुक्रगुज़ार हैं…
© abhishek trehan

माँ…

mother and daughter on grass
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माँग लूँ मैं ख़ुदा से
हर बार यही दुआ मिले
हर बार वही गोद मिले
हर बार वही पनाह मिले

किसी को मिले खुशियों में हिस्सा
किसी को पूरा जहाँ मिले
मैं जब भी आऊँ दुनिया में दोबारा
मुझे फिर वही माँ मिले

रूह के रिश्ते हैं ये देखो
चाहने वाले भी तमाम मिले
जब भी चोट लगी थी दिल पे
माँ की आँखों में सिर्फ़ उसके निशाँ मिले

जब भी चलती है ग़म की आँधी
या ज़िदंगी में तूफां उठे
छा जाती है वो बनके बादल
हर बार मुझे महफूज़ मुकाम मिले

दुनिया में सबकुछ है बिकता
यहाँ हर मर्ज़ की दवा मिले
बेशकीमती हैं वो माँ के आँसू
जिसने मेरे हर गुनाह धुले

माँ है तो फिर है सबकुछ
फिर इस जहाँ में भले कुछ न मिले
तुम ढूँढ़ लेना अपनी जन्नत
मुझे हर जनम में सिर्फ वो माँ मिले…
© abhishek trehan

प्रेम…

प्रियांश और प्रिया की मुलाकात कुछ वर्षों पहले कालेज में हुई थी। दोनों के विचारों में काफी समानता थी वे एक-दूसरे का साथ पसंद करते थे। वक्त के साथ उनकी मित्रता घनिष्ठता में बदल रही थी। यह घनिष्ठता कब प्रेम में रूपांतरित हो गई इसका खुद उन्हें भी पता नहीं चला था।

वक्त तेजी से बीत रहा था। आखिरकार वह कालेज का अंतिम दिन भी आ गया जब उन्हें अलग होना था। भारी मन से प्रियांश प्रिया को छोड़ने स्टेशन आया था। ट्रेन छूटने में कुछ समय शेष था। तभी प्रियांश ने प्रियांश ने प्रिया से अपने मन बात कही थी उसने प्रिया से प्रणय निवेदन किया था जिसे प्रिया ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि इन सब बातों का अभी सही वक्त नहीं है।

खुद को अस्वीकार किया जाना आसान नहीं होता है। यह प्रियांश के लिए अप्रत्याशित था। उसने प्रिया के इन्कार की वजह का आकलन करने के स्थान पर इसे अपने अपना अपमान समझ लिया और इसके लिए प्रिया को दोषी ठहरा दिया। इस घटना को हुए कई वर्ष बीत गए थे पर प्रियांश की वेदना कम नहीं हुई थी। समय के साथ गहरे घाव भी भर जाते हैं पर चोट के निशान शेष रह जाते हैं।

प्रियांश की पीड़ा गहरी थी जो वक्त के साथ प्रिया की निंदा और स्वयं की प्रशंसा में परिणित हो गई थी। प्रियांश को जब भी अवसर मिलता वह प्रिया की निंदा शुरू कर देता था। यदि अवसर नहीं मिलता तो अवसर बना लेता यदि तर्क नहीं मिलता तो कुतर्क करता था यदि कोई श्रोता नहीं मिलता तो स्वयं ही वक्ता व श्रोता बन जाता था।

इस तरह वह प्रिया की निंदा का कोई मौका नहीं छोड़ता था। इतने पर भी जब उसका अहंकार संतुष्ट नहीं होता तो वह दूसरों के सामने अपनी प्रशंसा करने लग जाता और दूसरों की नजरों में प्रिया को हीन और खुद को श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास करता था।

यह बातें धीरे-धीरे प्रिया तक भी पहुंच गयीं शुरुआत में तो उसने शुरुआत में इन बातों को महत्व नहीं दिया पर जब निंदा का स्तर गिरकर मर्यादा की सीमा को लांघने लगा तो उसने प्रियांश से मिलने का निश्चय किया। वर्षों बाद आज प्रियांश से प्रिया मिल रही थी उसने महसूस किया कि प्रियांश में बदलाव आ गया था उसकी आँखों में जिद और व्यवहार में अहंकार था।

प्रिया ने धीमे स्वर में कहा प्रियांश आज जीतकर भी तुम हार गए हो। जीत तुम्हारे अहंकार की हुई है और हार तुम्हारे प्रेम की हुई है। अपनी बातों से तुमने मेरा ही नहीं बल्कि स्वयं का भी उपहास उड़ाया है अपनी बातों से तुमने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रेम के विषय में तुम अभी भी अपरिपक्व और अधूरे हो।

किसी का जीवन में आना और जिदंगी से चले जाना प्रकृति का नियम है पर प्रेम के उसूल समय से परे हैं जिसकी अनिवार्य शर्त पवित्रता और समर्पण हैं। इसमें में जो जितना खोता है उतना ही पाता है, बिना त्याग प्रेम अधूरा है। उस दिन का मेरा निर्णय परिस्थितियों के अनुसार था पर अपनी अपरिपक्वता और व्यवहार से तुमने आज साबित कर दिया है कि मेरा वह निर्णय सही था।

प्रिया जा चुकी थी प्रियांश वहीं अवाक् बैठा था वह जीतकर भी हार गया था और प्रिया हारकर भी जीत गयी थी। प्रियांश समझ चुका था प्रेम जिद नहीं है,यह वह पवित्र समर्पण है जिसमें लोग जीतकर भी हार जाते हैं और कुछ लोग हारकर भी जीत जाते हैं आज प्रियांश को जीवन का सबसे बड़ा सबक मिला था, उसकी पीड़ा समाप्त हो गई थी।

© trehan abhishek

अतिथि…

आज इतवार का दिन था। दूसरे कमरे में पड़े फ़ोन की घंटी बजती ही जा रही थी। राजीव ने फ़ोन उठाया। दूसरी तरफ से आवाज आयी। हेलो बेटा, बहुत दिनों से तुम्हे मिले नहीं सो हम दोनों ११ बजे की गाड़ी से आ रहे है। दोपहर का खाना साथ में खा कर हम ४ बजे की गाड़ी वापिस लौट जायेंगे। ठीक है। हाँ पापा, मैं स्टेशन पर आपको लेने आ जाऊंगा।

फोन रख कर वापिस कमरे में आ कर राजीव ने नेहा को बताया कि मम्मी पापा ११ बजे की गाड़ी से आरहे है और दोपहर का खाना हमारे साथ ही खायेंगे।

यह सुनकर नेहा का पारा एक दम सातवें आसमान पर चढ़ गया। कोई इतवार को भी सोने नहीं देता, अब सबके के लिए खाना बनाओ। पूरी नौकरानी बना दिया है। वह गुस्से से उठी और बाथरूम में घुस गयी। राजीव हक्का बक्का होकर उसे देखता ही रह गया।

नेहा गुस्से में बड़बड़ाते हुए खाना बना रही थी। दाल सब्जी में नमक, मसाले ठीक है या नहीं इसकी परवाह किए बिना बस करछी चलाये जा रही थी। कच्चा पक्का खाना बना बेमन से परांठे सेंकने लगी कोई कच्चा तो कोई जला हुआ। आखिर उसने सब कुछ किसी तरह से ख़त्म किया।

वह तैयार हो सोफे पर बैठ मैगज़ीन के पन्ने पलटने लगी।उसके मन में तो बस यह चल रहा था कि सारा संडे खराब कर दिया। बस अब तो आएँ, खाएँ और वापिस जाएँ।

थोड़ी देर में घर की घंटी बजी तो बड़े बेमन से उठी और दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उसकी आँखें हैरानी से फटी की फटी रह गयी और मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका।

सामने राजीव के नहीं उसके अपने मम्मी पापा खड़े थे जिन्हें राजीव स्टेशन से लाया था।

मां ने आगे बढ़ कर उसे झिंझोड़ा अरे, क्या हुआ। इतनी हैरान परेशान क्यों लग रही है। क्या राजीव ने बताया नहीं कि हम आ रहे हैं। जैसे मानो नेहा के नींद टूटी हो नहीं, मम्मी इन्होंने तो बताया था पर…। चलो आप अंदर तो आओ।

थोड़ी देर बाद पापा ने कहा नेहा, बातें ही करती रहोगी या कुछ फिर कुछ खिलाओगी भी। यह सुनकर नेहा को मानो साँप सूँघ गया हो। क्या करती, बेचारी को अपने हाथों ही से बनाए अध पक्के और जले हुए खाने को परोसना पड़ा। मम्मी पापा खाना तो खा रहे थे मगर उनकी आँखों में एक प्रश्न था जिसका वो जवाब ढूँढ रहे थे। आखिर इतना स्वादिष्ट खाना बनाने वाली उनकी बेटी आज उन्हें कैसा खाना खिला रही है।

नेहा बस मुँह नीचे किए बैठी खाना खा रही थी। मम्मी पापा से आँख मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। थोडी देर बाद राजीव कुछ काम से बाहर चला गया। राजीव के जाते ही मम्मी, जो बहुत देर से चुप बैठी थी बोल पड़ी “क्या राजीव ने सच में बताया नहीं था कि हम आ रहे हैं ”

अचानक नेहा के मुँह से निकल गया उसने सिर्फ यह कहा था कि मम्मी पापा लंच पर आ रहे हैं, मैं समझी उसके मम्मी पापा आ रहे हैं।

फिर क्या था नेहा की मम्मी को समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या है। दुखी मन से उन्होंने नेहा को समझाया बेटी, हम हों या उसके मम्मी पापा तुम्हे तो बराबर का सम्मान करना चाहिए। मम्मी पापा क्या, कोई भी घर आए तो खुशी खुशी अपनी हैसियत के मुताबिक उसकी सेवा करो। बेटी, जितना किसी को सम्मान दोगी उतना तुम्हे ही प्यार और इज़्ज़त मिलेगी। रिश्ता कोई भी हो, हमारा या उसका, कभी फर्क नहीं करना चाहिये।

नेहा के मम्मी पापा को स्टेशन छोडकर राजीव घर वापस आ चुके थे।वातावरण में अजीब सी खमोशी थी। थोडी बाद नेहा चाय लेकर आयी राजीव ने देखा उसकी की आँखों में ऑंसू हैं उन्होनें पूछा नेहा क्या बात है ?उत्तर में नेहा ने बस इतना ही कहा कि मैं आज बहुत शर्मिंदा हूं,मुझे माफ कर दो, आज के बाद फिर ऐसा कभी नहीं होगा.! राजीव ने उसे गले से लगा लिया वह समझ गये थे कि नेहा को आज जिंदगी का बहुत बडा सबक मिल चुका है।

#therealdestination.com

एक तेरे सिवा ज़िदंगी से…

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एक तेरे सिवा ज़िदंगी से
कुछ चाहा ही नहीं
जो चला गया लौटकर फिर
वो आया ही नहीं

ना जाने कैसे गुज़र गई
कितनी शामें, कितनी सुबह
जब आहट हुई तो पता चला
दिया हमने जलाया ही नहीं

हो सके तो हमें ले चलो
पहले यहाँ,फिर वहाँ
रात गहरी हो चली
पता किसीने बताया ही नहीं

भर दो मेरा शून्य तुम
यहाँ क्या काम है मेरा
कुछ वक्त के संग छिप गया
कुछ हमने दिखाया ही नहीं

लगा के आग दरख्त में
उठता है दिल में तमाशे का बहुत शौक
जब आग बुझी तो पता चला
घर हमनें महफूज़ बनाया ही नहीं

हो सके तो सिखा दो मुझे भी
भूल जाने का वो हुनर
पत्थर को ख़ुदा समझ लिया
तुमने कुछ बताया ही नहीं…
© trehan abhishek

मन के टूटे टुकड़े हैं…

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मन के टूटे टुकड़े हैं

जाऊँ मैं अब किस ओर प्रिये

कोई यहाँ गिरा,कोई वहाँ गिरा

हुआ कहाँ कोई बोध प्रिये

ऊँगलियों से बनी कोई मुट्ठी है

मुट्ठी में छिपी कोई रेखा है

उस रेखा को किस्मत कहते हैं

क्यूँ लिखे इतने अवरोध प्रिये

माना ये जीवन नश्वर है

नश्वर से जुड़ा मेरा हर नाता है

फिर भी दिल में क्यूँ कुछ चुभता है

कैसा है ये अपराध-बोध प्रिये

लगता सच क्यूँ लज्जित है

क्या लज्जा ही मर्यादा है

उस मर्यादा ने हमको बाँध दिया

फिर कैसा है ये क्रोध प्रिये

माया ने मुझको घेर लिया

झीना माया का हर धागा है

मैं अस्तित्व को अपने ढूंढ़ रहा

ये जीवन है गहरा शोध प्रिये

जो बीज था अब वो पेड़ बना

अब वो पेड़ कहानी सुनाता है

मिलना और बिछड़ना ही नियति है

शेष है सब संयोग प्रिये…

© trehan abhishek

#manawoawaratha