ना हाल अच्छा है…

ना हाल अच्छा है,

ना ये साल अच्छा है,

फिर भी मुस्कुरा रहे हो,

ये कमाल अच्छा है।

ख्वाहिशें तो बहुत हैं,

फेहरिस्त लंबी नहीं है,

हर पल को जी रहे हो,

ये ख़्याल अच्छा है।

पुरानी बातें याद आकर,

सीने पर चढ़ रही हैं,

क्या लिखूँ, क्या मिटा दूँ

ये सवाल अच्छा है।

जाने दो उन्हें अब,

जो जाना चाहते हैं,

सब नहीं हैं दोस्ती के काबिल,

ये मलाल अच्छा है।

देखा है हमने अक्सर,

सच को अकेले चलते,

ना तसल्ली,ना फिकर है,

ये जंजाल अच्छा है।

ये हमें भी पता है,

गुमराह किसी ने किया है,

सवाल ही तो पूछा था,

ये इस्तेमाल अच्छा है…
© abhishek trehan

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गुज़र गया है आज भी…

गुज़र गया है आज भी…

गुज़र गया है आज भी,

यूँ ही बेवजह ही,

ना ही पुराना फिर हुआ,

ना ही हुआ कुछ नया ही।

मायूस हैं क्यूँ लम्हे,

बेबस है क्यूँ निगाहें,

ढूंढ़ती है जिसको मँज़िलें,

वो कहाँ मिला ही।

ये ज़िदंगी धूप में जलकर,

बेज़ार हो रही है,

टुकड़ों-टुकड़ों में बंटकर,

ख़ुशियाँ हजार हो रही हैं।

दिल में कोई कसक है,

कोई खुमारी छा रही है,

लफ्ज़ों की जरूरत नहीं है,

ख़ामोशियाँ शोर मचा रही हैं।

सच को है सबने देखा,

पर रास नहीं आया,

तुम्हें झूठ का पता था,

फिर दिल से क्यूँ लगाया।

कोशिशें बहुत की हैं,

पर मिला कुछ कहाँ ही,

ना ही रात हमें मिली,

ना ही हिस्से में आई सुबह ही…

© abhishek trehan

रात बहुत भीग चुकी…

silhouette of girl during evening
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रात बहुत भीग चुकी,

साफ आसमान होना चाहिए,

तूफ़ान आकर गुज़र गया,

बाकी निशान होना चाहिए।

दिन ने अपनी बेबसी,

किसी से कही नहीं,

रात के बाद फिर सुबह हुई,

परछाई कहीं मिली नहीं।

आज एक ख़्वाब से,

सवाल हमने पूछ लिया,

पूरा करूँ या छोड़ दूँ,

सच हैरान होना चाहिए।

मँज़िल मिले ना मिले,

ये और बात है,

आग दिल में जल रही,

चेहरे पर मुस्कान होनी चाहिए।

ले चलो हमें वहाँ,

जहाँ ख़त्म ना हो सिलसिला,

शुरूआत से अंजाम तक,

एक ही ईमान होना चाहिए।

वक्त बहुत बीत गया,

दिल मगर भरा नहीं,

कोशिशें यही कहती रहीं,

कहीं सच का मुकाम होना चाहिए…


© abhishek trehan


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माना वो आवारा था…

आँखों से कह दो तुम अपनी रज़ा को…

आँखों से कह दो तुम अपनी रज़ा को,

दुनिया सब बातों में वजह ढूंढ़ती है,

इबादत को नहीं है वजह से कोई मतलब,

दुनिया ख़ुदा को बेवजह ढूंढ़ती है।

उड़नें में कोई बुराई नहीं है,

उड़ानें भी आसमानों की पनाह ढूंढ़ती हैं,

हवाओं का रूख ही काफी नहीं है

मंज़िलें भी रास्तों के निशां ढूंढ़ती हैं।

बातों में चेहरे हैं या चेहरों में बातें हैं,

रातें भी अँधेरों में जगह ढूंढ़ती हैं,

अँधेरों की अलग से कोई हस्ती नहीं है,

लंबी रातें भी अपनी सुबह ढूंढ़ती हैं।

डरने की कोई जरूरत नहीं है,

अनहोनी भी होने की वजह ढूढंती है,

जो होना है वो तो होकर रहेगा,

दूसरों के मातम में दुनिया गुनाह ढूंढ़ती है।

पहुँचेगा कहाँ तक ये कहना मुश्किल ज़रा है,

मँज़िलें है जिद्दी और मुश्किल हवा है,

किस्मत से उलझने की आदत है पुरानी,

कोशिशों के बिना ज़िदंगी बेवजह है।

भाग रही है परछाई के पीछे,

वक्त की रेत पर पैरों के निशां ढूंढ़ती है,

क्या दिल का धड़कना ही काफी नहीं है,

क्यों ज़िदंगी दूसरों में जीने की वजह ढूंढ़ती है…

© abhishek trehan

किसी अपने ने तुझे छला है…

आँखें कह रही हैं,

किसी अपने ने तुझे छला है,

इतनी शिद्दत से तोड़ दे जो,

वो अजनबी नहीं बना है।

जो किया है दूसरों ने,

तूने भी वही किया है,

दिखा के सुनहरे सपने,

जख़्म सीने पे दिया है।

क्या हाल है हमारा,

ये अब न तुम पूछो,

जिस पर ऐतबार था हमारा,

कत्ल उसीने मेरा किया है।

बहता रहा हूँ संग तेरे,

बनके मैं खामोश पानी,

सवाल तो बहुत थे,

कभी जिक्र नहीं किया है।

एक दाग़ सुलग रहा था,

अब राख बन गया है,

यूँ कीचड़ न उछालो,

अभी हिसाब नहीं किया है।

नए खेल मत अब खेलो,

जज्बातों से किसी के,

यहाँ से बरी हुए हो,

उसने माफ़ नहीं किया है…

© abhishek trehan

जब दरख़्त पर फल आने लगे…

जब दरख़्त पर फल आने लगे,

लोग हर तरफ़ से निशाना लगाने लगे,

ये किसको ख़बर उसने क्या-क्या सहा,

लोग उसकी मेहनत को अपना बताने लगे।

दो जहाँ के दरम्याँ इतना फ़ासला रहा,

वो सहता रहा, लोग झुकाने लगे

कौन सीखता है भला बातों से यहाँ,

चोटें मिलती रहीं मौसम समझ आने लगे।

तुम जानते हो क्या ख़मोशी में क्या है छिपा,

परतें खुलने लगीं लोग कसमसाने लगे,

सौ सच हैं जिनकी कोई गवाही नहीं,

एक झूठ से लिपटकर सब कसमें खाने लगे।

हादसों ने मिटा दिया था खोने का डर,

कलियाँ खिलने लगीं,भँवरें मंडराने लगे

आँसुओं को पिया तो खुशियाँ मिलने लगीं,

सूखी टहनी पर पत्ते खिलखिलाने लगे।

दूसरों के लिए जिया तो झोली भरने लगी,

अश्कों में भी मोती मुस्कुराने लगे,

जीना है ज़िदगी में तो दरख्त सा जिओ,

जो मरकर भी दूसरों के काम आने लगे।

याद रहेगा ये दौर हमको सदा,

शहर थमने लगे,गाँव बुलाने लगे,

मुसीबत में निखरती है शख्शियतें यहाँ

लोग पुराने पीपल की पनाह में वक्त बिताने लगे…

© abhishek trehan

कुछ वक्त दे ऐ ज़िदंगी,थोड़ा संभल जाने दे…

कुछ वक्त दे ऐ ज़िदंगी,
थोड़ा सभंल जाने दे,
तेरा हर वार हम फिर सहेंगे,
पुराना जख़्म तो भर जाने दे।

मुफ़्त में सीखा नहीं है,
हमनें जीवन का फलसफ़ा,
तेरा हर कर्ज़ हम उतार देंगे,
थोड़ा मौसम तो बदल जाने दे।

खुशियों की महफिल फिर सजेगी,
लगेंगे उम्मीदों को पंख भी,
बहारें फिर मेहरबान होंगी,
थोड़ा तूफान और थम जाने दे।

नासमझ नहीं है वो,
जो शख्श आज रूक गया,
आँधियों को वो मात दे रहा,
जो शजर आज झुक गया।

हैरानी की ये बात नहीं है,
ना ज़माना ही खराब है,
कुदरत सवाल पूछ रही है,
और इंसान बे-जवाब है।

गुज़र जाएगा ये दौर भी,
कुछ वक्त और गुज़र जाने दे,
ज़िदंगी आज़मा हमें रही है,
कुछ सबक और मिल जाने दे…
© abhishek trehan

दिन बेवजह भाग रहा,खुशनुमा शाम होनी चाहिए…

दिन बेवजह भाग रहा,

खुशनुमा शाम होनी चाहिए,

दर्द हद से गुज़र गया,

मुश्किलें आसान होनी चाहिए।

मेरी आँखों में आकर देख लो,

हसरतें क्या कह रहीं,

सीने में दिल धड़क रहा,

इशारों की ज़ुबान होनी चाहिए।

बुलंदियाँ अभी छुई नहीं,

गिरने का नहीं मलाल है,

बेतहाशा सब दौड़ रहे,

ज़िदंगी का ये सवाल है।

लकीरों से शायद यही,

गिला हमको हो गया,

जो हासिल नहीं उसकी परवाह है,

जो मिला है कहीं पर खो गया।

मैं ज़िदंगी को ढूंढ़ रहा,

ज़िदंगी भी हमको ढूंढ रही,

काली रात गुज़र गई,

पूरा अब अरमान होना चाहिए।

सफ़र की हद से परे है जो,

सच का वहां मुकाम है,

जहाँ दिल भारी होने लगे,

वहाँ सच का निशान होना चाहिए…

© abhishek trehan

रात बहुत भीग चुकी…

रात बहुत भीग चुकी,

साफ आसमान होना चाहिए,

तूफ़ान आकर गुज़र गया,

बाकी निशान होना चाहिए।

दिन ने अपनी बेबसी,

किसी से कही नहीं,

रात के बाद फिर सुबह हुई,

परछाई कहीं मिली नहीं।

आज एक ख़्वाब से,

सवाल हमने पूछ लिया,

पूरा करूँ या छोड़ दूँ,

सच हैरान होना चाहिए।

मँज़िल मिले ना मिले,

ये और बात है,

आग दिल में जल रही,

चेहरे पर मुस्कान होनी चाहिए।

ले चलो हमें वहाँ,

जहाँ ख़त्म ना हो सिलसिला,

शुरूआत से अंजाम तक,

एक ही ईमान होना चाहिए।

वक्त बहुत बीत गया,

दिल मगर भरा नहीं,

कोशिशें यही कहती रहीं,

कहीं सच का मुकाम होना चाहिए…

© abhishek trehan

चुपके से रात आती है…

चुपके से रात आती है,

सोए दर्द जगाती है,

तन्हाई की धुन बजती है,

पानी में आग लगाती है।

वही गलती फिर मैं करता हूं,

यादों के चेहरे पढ़ता हूं,

रात की दहलीज़ पर पलकें बिछाकर,

इंतज़ार सुबह का करता हूं।

नींद से नहीं कोई शिकवा है,

पुरानी बातें हमें जगाती हैं,

बिस्तर बुलाता रहता है,

रात कुर्सी पे गुज़र जाती है।

जिसने हमको ये रोग दिया,

उसने जाने क्या सोच लिया,

पहले चोट लगी फिर दर्द बढ़ा,

फिर ख़ुद को उसने रोक लिया।

कुछ बूँदें आँखों से छलकती हैं,

कुछ बिन बरसे रह जाती हैं,

संग वक्त के कुछ जख़्म भर जाते हैं,

कुछ लकीरें दिल पे रह जाती हैं।

सूरज भी रोज़ निकलता है,

ज़िदंगी भी रोज़ आज़माती है,

दिमाग दिन के संग चलता है,

रात दिल का साथ निभाती है…

© abhishek trehan