प्रेम…

प्रियांश और प्रिया की मुलाकात कुछ वर्षों पहले कालेज में हुई थी। दोनों के विचारों में काफी समानता थी वे एक-दूसरे का साथ पसंद करते थे। वक्त के साथ उनकी मित्रता घनिष्ठता में बदल रही थी। यह घनिष्ठता कब प्रेम में रूपांतरित हो गई इसका खुद उन्हें भी पता नहीं चला था।

वक्त तेजी से बीत रहा था। आखिरकार वह कालेज का अंतिम दिन भी आ गया जब उन्हें अलग होना था। भारी मन से प्रियांश प्रिया को छोड़ने स्टेशन आया था। ट्रेन छूटने में कुछ समय शेष था। तभी प्रियांश ने प्रियांश ने प्रिया से अपने मन बात कही थी उसने प्रिया से प्रणय निवेदन किया था जिसे प्रिया ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि इन सब बातों का अभी सही वक्त नहीं है।

खुद को अस्वीकार किया जाना आसान नहीं होता है। यह प्रियांश के लिए अप्रत्याशित था। उसने प्रिया के इन्कार की वजह का आकलन करने के स्थान पर इसे अपने अपना अपमान समझ लिया और इसके लिए प्रिया को दोषी ठहरा दिया। इस घटना को हुए कई वर्ष बीत गए थे पर प्रियांश की वेदना कम नहीं हुई थी। समय के साथ गहरे घाव भी भर जाते हैं पर चोट के निशान शेष रह जाते हैं।

प्रियांश की पीड़ा गहरी थी जो वक्त के साथ प्रिया की निंदा और स्वयं की प्रशंसा में परिणित हो गई थी। प्रियांश को जब भी अवसर मिलता वह प्रिया की निंदा शुरू कर देता था। यदि अवसर नहीं मिलता तो अवसर बना लेता यदि तर्क नहीं मिलता तो कुतर्क करता था यदि कोई श्रोता नहीं मिलता तो स्वयं ही वक्ता व श्रोता बन जाता था।

इस तरह वह प्रिया की निंदा का कोई मौका नहीं छोड़ता था। इतने पर भी जब उसका अहंकार संतुष्ट नहीं होता तो वह दूसरों के सामने अपनी प्रशंसा करने लग जाता और दूसरों की नजरों में प्रिया को हीन और खुद को श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास करता था।

यह बातें धीरे-धीरे प्रिया तक भी पहुंच गयीं शुरुआत में तो उसने शुरुआत में इन बातों को महत्व नहीं दिया पर जब निंदा का स्तर गिरकर मर्यादा की सीमा को लांघने लगा तो उसने प्रियांश से मिलने का निश्चय किया। वर्षों बाद आज प्रियांश से प्रिया मिल रही थी उसने महसूस किया कि प्रियांश में बदलाव आ गया था उसकी आँखों में जिद और व्यवहार में अहंकार था।

प्रिया ने धीमे स्वर में कहा प्रियांश आज जीतकर भी तुम हार गए हो। जीत तुम्हारे अहंकार की हुई है और हार तुम्हारे प्रेम की हुई है। अपनी बातों से तुमने मेरा ही नहीं बल्कि स्वयं का भी उपहास उड़ाया है अपनी बातों से तुमने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रेम के विषय में तुम अभी भी अपरिपक्व और अधूरे हो।

किसी का जीवन में आना और जिदंगी से चले जाना प्रकृति का नियम है पर प्रेम के उसूल समय से परे हैं जिसकी अनिवार्य शर्त पवित्रता और समर्पण हैं। इसमें में जो जितना खोता है उतना ही पाता है, बिना त्याग प्रेम अधूरा है। उस दिन का मेरा निर्णय परिस्थितियों के अनुसार था पर अपनी अपरिपक्वता और व्यवहार से तुमने आज साबित कर दिया है कि मेरा वह निर्णय सही था।

प्रिया जा चुकी थी प्रियांश वहीं अवाक् बैठा था वह जीतकर भी हार गया था और प्रिया हारकर भी जीत गयी थी। प्रियांश समझ चुका था प्रेम जिद नहीं है,यह वह पवित्र समर्पण है जिसमें लोग जीतकर भी हार जाते हैं और कुछ लोग हारकर भी जीत जाते हैं आज प्रियांश को जीवन का सबसे बड़ा सबक मिला था, उसकी पीड़ा समाप्त हो गई थी।

© trehan abhishek

अतिथि…

आज इतवार का दिन था। दूसरे कमरे में पड़े फ़ोन की घंटी बजती ही जा रही थी। राजीव ने फ़ोन उठाया। दूसरी तरफ से आवाज आयी। हेलो बेटा, बहुत दिनों से तुम्हे मिले नहीं सो हम दोनों ११ बजे की गाड़ी से आ रहे है। दोपहर का खाना साथ में खा कर हम ४ बजे की गाड़ी वापिस लौट जायेंगे। ठीक है। हाँ पापा, मैं स्टेशन पर आपको लेने आ जाऊंगा।

फोन रख कर वापिस कमरे में आ कर राजीव ने नेहा को बताया कि मम्मी पापा ११ बजे की गाड़ी से आरहे है और दोपहर का खाना हमारे साथ ही खायेंगे।

यह सुनकर नेहा का पारा एक दम सातवें आसमान पर चढ़ गया। कोई इतवार को भी सोने नहीं देता, अब सबके के लिए खाना बनाओ। पूरी नौकरानी बना दिया है। वह गुस्से से उठी और बाथरूम में घुस गयी। राजीव हक्का बक्का होकर उसे देखता ही रह गया।

नेहा गुस्से में बड़बड़ाते हुए खाना बना रही थी। दाल सब्जी में नमक, मसाले ठीक है या नहीं इसकी परवाह किए बिना बस करछी चलाये जा रही थी। कच्चा पक्का खाना बना बेमन से परांठे सेंकने लगी कोई कच्चा तो कोई जला हुआ। आखिर उसने सब कुछ किसी तरह से ख़त्म किया।

वह तैयार हो सोफे पर बैठ मैगज़ीन के पन्ने पलटने लगी।उसके मन में तो बस यह चल रहा था कि सारा संडे खराब कर दिया। बस अब तो आएँ, खाएँ और वापिस जाएँ।

थोड़ी देर में घर की घंटी बजी तो बड़े बेमन से उठी और दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उसकी आँखें हैरानी से फटी की फटी रह गयी और मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका।

सामने राजीव के नहीं उसके अपने मम्मी पापा खड़े थे जिन्हें राजीव स्टेशन से लाया था।

मां ने आगे बढ़ कर उसे झिंझोड़ा अरे, क्या हुआ। इतनी हैरान परेशान क्यों लग रही है। क्या राजीव ने बताया नहीं कि हम आ रहे हैं। जैसे मानो नेहा के नींद टूटी हो नहीं, मम्मी इन्होंने तो बताया था पर…। चलो आप अंदर तो आओ।

थोड़ी देर बाद पापा ने कहा नेहा, बातें ही करती रहोगी या कुछ फिर कुछ खिलाओगी भी। यह सुनकर नेहा को मानो साँप सूँघ गया हो। क्या करती, बेचारी को अपने हाथों ही से बनाए अध पक्के और जले हुए खाने को परोसना पड़ा। मम्मी पापा खाना तो खा रहे थे मगर उनकी आँखों में एक प्रश्न था जिसका वो जवाब ढूँढ रहे थे। आखिर इतना स्वादिष्ट खाना बनाने वाली उनकी बेटी आज उन्हें कैसा खाना खिला रही है।

नेहा बस मुँह नीचे किए बैठी खाना खा रही थी। मम्मी पापा से आँख मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। थोडी देर बाद राजीव कुछ काम से बाहर चला गया। राजीव के जाते ही मम्मी, जो बहुत देर से चुप बैठी थी बोल पड़ी “क्या राजीव ने सच में बताया नहीं था कि हम आ रहे हैं ”

अचानक नेहा के मुँह से निकल गया उसने सिर्फ यह कहा था कि मम्मी पापा लंच पर आ रहे हैं, मैं समझी उसके मम्मी पापा आ रहे हैं।

फिर क्या था नेहा की मम्मी को समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या है। दुखी मन से उन्होंने नेहा को समझाया बेटी, हम हों या उसके मम्मी पापा तुम्हे तो बराबर का सम्मान करना चाहिए। मम्मी पापा क्या, कोई भी घर आए तो खुशी खुशी अपनी हैसियत के मुताबिक उसकी सेवा करो। बेटी, जितना किसी को सम्मान दोगी उतना तुम्हे ही प्यार और इज़्ज़त मिलेगी। रिश्ता कोई भी हो, हमारा या उसका, कभी फर्क नहीं करना चाहिये।

नेहा के मम्मी पापा को स्टेशन छोडकर राजीव घर वापस आ चुके थे।वातावरण में अजीब सी खमोशी थी। थोडी बाद नेहा चाय लेकर आयी राजीव ने देखा उसकी की आँखों में ऑंसू हैं उन्होनें पूछा नेहा क्या बात है ?उत्तर में नेहा ने बस इतना ही कहा कि मैं आज बहुत शर्मिंदा हूं,मुझे माफ कर दो, आज के बाद फिर ऐसा कभी नहीं होगा.! राजीव ने उसे गले से लगा लिया वह समझ गये थे कि नेहा को आज जिंदगी का बहुत बडा सबक मिल चुका है।

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