एक तेरे सिवा ज़िदंगी से…

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एक तेरे सिवा ज़िदंगी से
कुछ चाहा ही नहीं
जो चला गया लौटकर फिर
वो आया ही नहीं

ना जाने कैसे गुज़र गई
कितनी शामें, कितनी सुबह
जब आहट हुई तो पता चला
दिया हमने जलाया ही नहीं

हो सके तो हमें ले चलो
पहले यहाँ,फिर वहाँ
रात गहरी हो चली
पता किसीने बताया ही नहीं

भर दो मेरा शून्य तुम
यहाँ क्या काम है मेरा
कुछ वक्त के संग छिप गया
कुछ हमने दिखाया ही नहीं

लगा के आग दरख्त में
उठता है दिल में तमाशे का बहुत शौक
जब आग बुझी तो पता चला
घर हमनें महफूज़ बनाया ही नहीं

हो सके तो सिखा दो मुझे भी
भूल जाने का वो हुनर
पत्थर को ख़ुदा समझ लिया
तुमने कुछ बताया ही नहीं…
© trehan abhishek