मन के टूटे टुकड़े हैं…

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मन के टूटे टुकड़े हैं

जाऊँ मैं अब किस ओर प्रिये

कोई यहाँ गिरा,कोई वहाँ गिरा

हुआ कहाँ कोई बोध प्रिये

ऊँगलियों से बनी कोई मुट्ठी है

मुट्ठी में छिपी कोई रेखा है

उस रेखा को किस्मत कहते हैं

क्यूँ लिखे इतने अवरोध प्रिये

माना ये जीवन नश्वर है

नश्वर से जुड़ा मेरा हर नाता है

फिर भी दिल में क्यूँ कुछ चुभता है

कैसा है ये अपराध-बोध प्रिये

लगता सच क्यूँ लज्जित है

क्या लज्जा ही मर्यादा है

उस मर्यादा ने हमको बाँध दिया

फिर कैसा है ये क्रोध प्रिये

माया ने मुझको घेर लिया

झीना माया का हर धागा है

मैं अस्तित्व को अपने ढूंढ़ रहा

ये जीवन है गहरा शोध प्रिये

जो बीज था अब वो पेड़ बना

अब वो पेड़ कहानी सुनाता है

मिलना और बिछड़ना ही नियति है

शेष है सब संयोग प्रिये…

© trehan abhishek

#manawoawaratha

कभी गुलाब की तरह…

glass with petals and alcohol
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कभी गुलाब की तरह

कभी सैलाब की तरह

ढूंढ़ता हूं मैं तुमको

किसी जवाब की तरह

न जाने फिर क्यूं

दिल में उम्मीद है जगी

कभी अँधेरी रातों में आ मिलो तुम

किसी ख़्वाब की तरह

तेरी मौजूदगी से लौट आई हैं

चेहरों की रौनकें

कभी फूलों की तरह महको

कभी शराब की तरह

न तुम हुई हमारी

न हम तेरे हुए

जी चाहता है तुम्हें फिर से पढ़ लूं

किसी पुरानी किताब की तरह

समंदर न सही

एक बूँद ही मिले

छा जाओ मुझ पे अब तुम

किसी मेहराब की तरह

अगर इश्क हुआ है

तो एहसास ये दिला दो

हमें अपने आगोश में फिर छुपा लो

किसी तालाब की तरह…

© abhishek trehan

#manawoawaratha