मन…

ठहर जा रे मना,

क्यूँ भागे है चहुँ-दिशा,चहुँ-ओर,

मुँडेर पर पहरा बैठा दिया,

कहाँ थमा है,मन का शोर।

तन को तन से बाँध दिया,

मन को बाँध सके ना कोई डोर,

कच्चे दुनिया के सब धागे हैं,

बस गाँठें हैं हर ओर।

मैं आज,तुम कल हुई,

जैसे लहरें बाँटे नदी के दो छोर,

पल दो पल का है फासला,

दरम्यां फैला अँधेरा है घनघोर।

आँखों से आँखें यूँ उलझ गई,

जैसे पतंग से उलझे डोर,

हलचल सी दिल में मच गई,

जैसे दरिया में उठे हिलोर।

जब बोध हुआ तब ख़बर हुई,

बीत गया वो दौर,

रेत थी मुट्ठी से फिसल गई,

मिला ना कोई ठौर।

ज़िदंगी लगी है दांव पर,

बाज़ी पे नहीं है कोई जोर,

रूद्र तो मेरा भोला है,

विधि का विधान है बहुत कठोर…

© abhishek trehan

ज़िदंगी गुज़र रही है…

ज़िदंगी गुज़र रही है,

सब किरदार निभा रहे हैं,

सच का नहीं कोई पता है,

लोग बातें बना रहे हैं।

कोई कहता है सच नशा है,

कोई कहता है सच सज़ा है,

जिनको अपनी ख़बर नहीं है,

सच उनके लिए हवा है।

रातों का ख्वाब कह लो,

या दिल का अरमान बना लो,

बदलता सच नहीं है,

दूसरा तरीका तुम आज़मा लो।

दूर कहीं पर शायद,

एक दिया जल रहा है,

हवाएं नज़र रख रही हैं

थोड़ा अँधेरा पिघल रहा है।

कुछ ख़ुद पर बीत रही है,

कुछ दूसरों को परख़ रहे हैं,

हकीकत सिर्फ वही नहीं है,

जो लोग समझ रहे हैं।

जो बुझ रही है आग सीने में,

उसे क्या फिर से मैं जला लूँ

लोग सच का पता पूछते हैं

क्या आईना उन्हें दिखा दूँ…

© abhishek trehan