गुज़र गया है आज भी…

गुज़र गया है आज भी…

गुज़र गया है आज भी,

यूँ ही बेवजह ही,

ना ही पुराना फिर हुआ,

ना ही हुआ कुछ नया ही।

मायूस हैं क्यूँ लम्हे,

बेबस है क्यूँ निगाहें,

ढूंढ़ती है जिसको मँज़िलें,

वो कहाँ मिला ही।

ये ज़िदंगी धूप में जलकर,

बेज़ार हो रही है,

टुकड़ों-टुकड़ों में बंटकर,

ख़ुशियाँ हजार हो रही हैं।

दिल में कोई कसक है,

कोई खुमारी छा रही है,

लफ्ज़ों की जरूरत नहीं है,

ख़ामोशियाँ शोर मचा रही हैं।

सच को है सबने देखा,

पर रास नहीं आया,

तुम्हें झूठ का पता था,

फिर दिल से क्यूँ लगाया।

कोशिशें बहुत की हैं,

पर मिला कुछ कहाँ ही,

ना ही रात हमें मिली,

ना ही हिस्से में आई सुबह ही…

© abhishek trehan

रात बहुत भीग चुकी…

silhouette of girl during evening
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रात बहुत भीग चुकी,

साफ आसमान होना चाहिए,

तूफ़ान आकर गुज़र गया,

बाकी निशान होना चाहिए।

दिन ने अपनी बेबसी,

किसी से कही नहीं,

रात के बाद फिर सुबह हुई,

परछाई कहीं मिली नहीं।

आज एक ख़्वाब से,

सवाल हमने पूछ लिया,

पूरा करूँ या छोड़ दूँ,

सच हैरान होना चाहिए।

मँज़िल मिले ना मिले,

ये और बात है,

आग दिल में जल रही,

चेहरे पर मुस्कान होनी चाहिए।

ले चलो हमें वहाँ,

जहाँ ख़त्म ना हो सिलसिला,

शुरूआत से अंजाम तक,

एक ही ईमान होना चाहिए।

वक्त बहुत बीत गया,

दिल मगर भरा नहीं,

कोशिशें यही कहती रहीं,

कहीं सच का मुकाम होना चाहिए…


© abhishek trehan


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माना वो आवारा था…

आँखों से कह दो तुम अपनी रज़ा को…

आँखों से कह दो तुम अपनी रज़ा को,

दुनिया सब बातों में वजह ढूंढ़ती है,

इबादत को नहीं है वजह से कोई मतलब,

दुनिया ख़ुदा को बेवजह ढूंढ़ती है।

उड़नें में कोई बुराई नहीं है,

उड़ानें भी आसमानों की पनाह ढूंढ़ती हैं,

हवाओं का रूख ही काफी नहीं है

मंज़िलें भी रास्तों के निशां ढूंढ़ती हैं।

बातों में चेहरे हैं या चेहरों में बातें हैं,

रातें भी अँधेरों में जगह ढूंढ़ती हैं,

अँधेरों की अलग से कोई हस्ती नहीं है,

लंबी रातें भी अपनी सुबह ढूंढ़ती हैं।

डरने की कोई जरूरत नहीं है,

अनहोनी भी होने की वजह ढूढंती है,

जो होना है वो तो होकर रहेगा,

दूसरों के मातम में दुनिया गुनाह ढूंढ़ती है।

पहुँचेगा कहाँ तक ये कहना मुश्किल ज़रा है,

मँज़िलें है जिद्दी और मुश्किल हवा है,

किस्मत से उलझने की आदत है पुरानी,

कोशिशों के बिना ज़िदंगी बेवजह है।

भाग रही है परछाई के पीछे,

वक्त की रेत पर पैरों के निशां ढूंढ़ती है,

क्या दिल का धड़कना ही काफी नहीं है,

क्यों ज़िदंगी दूसरों में जीने की वजह ढूंढ़ती है…

© abhishek trehan

किसी अपने ने तुझे छला है…

आँखें कह रही हैं,

किसी अपने ने तुझे छला है,

इतनी शिद्दत से तोड़ दे जो,

वो अजनबी नहीं बना है।

जो किया है दूसरों ने,

तूने भी वही किया है,

दिखा के सुनहरे सपने,

जख़्म सीने पे दिया है।

क्या हाल है हमारा,

ये अब न तुम पूछो,

जिस पर ऐतबार था हमारा,

कत्ल उसीने मेरा किया है।

बहता रहा हूँ संग तेरे,

बनके मैं खामोश पानी,

सवाल तो बहुत थे,

कभी जिक्र नहीं किया है।

एक दाग़ सुलग रहा था,

अब राख बन गया है,

यूँ कीचड़ न उछालो,

अभी हिसाब नहीं किया है।

नए खेल मत अब खेलो,

जज्बातों से किसी के,

यहाँ से बरी हुए हो,

उसने माफ़ नहीं किया है…

© abhishek trehan