जब दरख़्त पर फल आने लगे…

जब दरख़्त पर फल आने लगे,

लोग हर तरफ़ से निशाना लगाने लगे,

ये किसको ख़बर उसने क्या-क्या सहा,

लोग उसकी मेहनत को अपना बताने लगे।

दो जहाँ के दरम्याँ इतना फ़ासला रहा,

वो सहता रहा, लोग झुकाने लगे

कौन सीखता है भला बातों से यहाँ,

चोटें मिलती रहीं मौसम समझ आने लगे।

तुम जानते हो क्या ख़मोशी में क्या है छिपा,

परतें खुलने लगीं लोग कसमसाने लगे,

सौ सच हैं जिनकी कोई गवाही नहीं,

एक झूठ से लिपटकर सब कसमें खाने लगे।

हादसों ने मिटा दिया था खोने का डर,

कलियाँ खिलने लगीं,भँवरें मंडराने लगे

आँसुओं को पिया तो खुशियाँ मिलने लगीं,

सूखी टहनी पर पत्ते खिलखिलाने लगे।

दूसरों के लिए जिया तो झोली भरने लगी,

अश्कों में भी मोती मुस्कुराने लगे,

जीना है ज़िदगी में तो दरख्त सा जिओ,

जो मरकर भी दूसरों के काम आने लगे।

याद रहेगा ये दौर हमको सदा,

शहर थमने लगे,गाँव बुलाने लगे,

मुसीबत में निखरती है शख्शियतें यहाँ

लोग पुराने पीपल की पनाह में वक्त बिताने लगे…

© abhishek trehan

कुछ वक्त दे ऐ ज़िदंगी,थोड़ा संभल जाने दे…

कुछ वक्त दे ऐ ज़िदंगी,
थोड़ा सभंल जाने दे,
तेरा हर वार हम फिर सहेंगे,
पुराना जख़्म तो भर जाने दे।

मुफ़्त में सीखा नहीं है,
हमनें जीवन का फलसफ़ा,
तेरा हर कर्ज़ हम उतार देंगे,
थोड़ा मौसम तो बदल जाने दे।

खुशियों की महफिल फिर सजेगी,
लगेंगे उम्मीदों को पंख भी,
बहारें फिर मेहरबान होंगी,
थोड़ा तूफान और थम जाने दे।

नासमझ नहीं है वो,
जो शख्श आज रूक गया,
आँधियों को वो मात दे रहा,
जो शजर आज झुक गया।

हैरानी की ये बात नहीं है,
ना ज़माना ही खराब है,
कुदरत सवाल पूछ रही है,
और इंसान बे-जवाब है।

गुज़र जाएगा ये दौर भी,
कुछ वक्त और गुज़र जाने दे,
ज़िदंगी आज़मा हमें रही है,
कुछ सबक और मिल जाने दे…
© abhishek trehan

दिन बेवजह भाग रहा,खुशनुमा शाम होनी चाहिए…

दिन बेवजह भाग रहा,

खुशनुमा शाम होनी चाहिए,

दर्द हद से गुज़र गया,

मुश्किलें आसान होनी चाहिए।

मेरी आँखों में आकर देख लो,

हसरतें क्या कह रहीं,

सीने में दिल धड़क रहा,

इशारों की ज़ुबान होनी चाहिए।

बुलंदियाँ अभी छुई नहीं,

गिरने का नहीं मलाल है,

बेतहाशा सब दौड़ रहे,

ज़िदंगी का ये सवाल है।

लकीरों से शायद यही,

गिला हमको हो गया,

जो हासिल नहीं उसकी परवाह है,

जो मिला है कहीं पर खो गया।

मैं ज़िदंगी को ढूंढ़ रहा,

ज़िदंगी भी हमको ढूंढ रही,

काली रात गुज़र गई,

पूरा अब अरमान होना चाहिए।

सफ़र की हद से परे है जो,

सच का वहां मुकाम है,

जहाँ दिल भारी होने लगे,

वहाँ सच का निशान होना चाहिए…

© abhishek trehan