दुनिया से छुप-छुपकर ही सही….

दुनिया से छुप-छुपकर ही सही

थोड़ा ख़ुद के लिए भी जिया करो

किसी को तेरी फिक्र नहीं

अपनी परवाह ख़ुद किया करो

एक दूसरों की ख़िदमत के सिवा

दुनिया में और भी काम हैं

कुछ ख्वाहिशें सीने में दफ़न हैं

कुछ पल उन्हें भी दिया करो

हँसते रहे तुम हर दफ़ा

शिकवा कभी किया नहीं

हर बार मन मसोस लिया

कभी किसी से कुछ कहा नहीं

कह रही है ज़िदंगी

ख़ुद को जरा सम्हाल लो

दूसरों के लिए बहुत जी लिए

थोड़ा ख़ुद के लिए भी जिया करो

साँसे खर्च हो रहीं

पाबंद ज़िदंगी का हिसाब है

वक्त बहुत कम है

कोरी सपनों की अभी किताब है

एक जनम काफ़ी नही

हर जनम में तुम मिला करो

मैं तुम्हारा कर्ज़दार हूं

इस कर्ज़ से मुझे रिहा करो…

© abhishek trehan

चुपके से रात आती है…


चुपके से रात आती है,

सोए दर्द जगाती है,

तन्हाई की धुन बजती है,

पानी में आग लगाती है।

वही गलती फिर मैं करता हूं,

यादों के चेहरे पढ़ता हूं

रात की दहलीज़ पर पलकें बिछाकर

इंतज़ार सुबह का करता हूं।

नींद से नहीं कोई शिकवा है,

पुरानी बातें हमें जगाती हैं,

बिस्तर बुलाता रहता है,

रात कुर्सी पे गुज़र जाती है।

जिसने हमको ये रोग दिया,

उसने जाने क्या सोच लिया,

पहले चोट लगी फिर दर्द बढ़ा,

फिर ख़ुद को उसने रोक लिया।

कुछ बूँदें आँखों से छलकती हैं,

कुछ बिन बरसे रह जाती हैं,

संग वक्त के कुछ जख़्म भर जाते हैं,

कुछ लकीरें दिल पे रह जाती हैं।

सूरज भी रोज़ निकल रहा है,

ज़िदंगी भी रोज़ आज़माती है,

दिमाग दिन के संग चलता है,

रात दिल का साथ निभाती है…

© abhishek trehan

दूर अब बहुत आ चुका हूं मैं…

दूर अब बहुत,

आ चुका हूं मैं,

रात को भी दिन,

बता चुका हूं मैं।

हादसे लेकिन अभी,

ख़त्म कहां हुए,

हादसों को भी आदत,

बना चुका हूं मैं।

कहाँ से लाऊँ लफ़्ज़ वो,

जो तुम्हें सुनाई दे,

पलकों को तुम मूंद लो,

शायद सच दिखाई दे।

पहले तो बस चाहत थी,

अब मजबूरी हो गई है,

तेरे इश्क की तलब क्या लगी,

ज़िदंगी जरूरी हो गई है।

उन्हें हमारी फिक्र नहीं,

मैं शुक्रगुज़ार हूं,

रिश्तों की आंच में हाथ बहुत,

जला चुका हूं मैं।

ये बस दिल जानता है,

या जानता हूं मैं,

हमने तुम्हें खोया है,

या खुद को पा चुका हूं मैं…

© abhishek trehan

रास्तों का मैं मुसाफिर हूँ…

रास्तों का मैं मुसाफिर हूँ,

मँज़िलो पे नहीं रूकता,

मँज़िले दग़ा किया करती हैं,

कभी रास्ता नहीं मुकरता।

ये जरूरी नहीं है,

हर बात की वजह हो,

कभी परछाई नहीं है दिखती,

कभी चाँद नहीं निकलता।

हद से गुज़रने की कीमत,

हर बार चुकानी पड़ती है,

सिर्फ़ दर्द सहने से,

नसीब नहीं बदलता।

बातों के भी इस दुनिया में,

होते हैं कई मतलब,

आईना बदलने से,

रकीब नहीं बदलता।

सपनों को जीने के लिए,

नासमझ होना पड़ता है,

समझदारों की दुनिया में,

कोई दिल की नहीं सुनता।

आम हो गई है,

जो ख़ास थी कहानी,

मन की रेत पर अब,

सिर्फ़ तेरा निशान नहीं मिलता…

© abhishek trehan