मैं भी शून्य तुम भी शून्य …

मैं भी शून्य,तुम भी शून्य

सब शून्य का हिसाब है,

शून्य से शून्य जुड़ गया,

फिर भी शून्य ही जवाब है।

शून्य से ही शुरू हुआ,

शून्य पर ही खत्म है,

ये सफ़र है शून्य से शून्य तक,

ज़िदगी शून्य की किताब है।

कहानी-किस्से सब ठीक हैं,

कुछ ठीक भी लाजवाब हैं,

लाजवाब भी शून्य हो गया,

अब शून्य ही बेहिसाब हैं।

परख़ने को लोग परख़ रहे,

ज़िदगी के हर सवाल को,

कहां कोई परख़ सका,

शून्य के कमाल को।

बचपन में लगती थी घुटनों पर जो,

अब वो चोट दिलों पर लग रही,

पहले डरते थे हम शून्य से,

अब ज़िदंगी ही शून्य हो गई।

अभी मेरी तरफ़ नज़र ना कर,

मैं ख़ुद को जऱा सम्हाल लूं,

तेरी निगाहों में भी एक शून्य है,

उस शून्य को ख़ुद में उतार लूं…

मांगता था जिसे मैं दुआओं में,वो हासिल उसे हो जाता था…

मांगता था जिसे मैं दुआओं में,

वो हासिल उसे हो जाता था,

ढूंढ़ता था जिसे मैं अपनी लकीरों में,

वो उसे बिन मांगे मिल जाता था।

कहने को अब कुछ भी नहीं,

क्या नाम दूं इसे अब तेरे सिवा,

आओ बैठो कभी संग फुर्सत में,

कभी इंतज़ार भी फुर्सत हो जाता था।

एक तूफान से तो बच गई,

कैसे बचती वो लाखों तूफ़ानों से,

लहरों ने तो उसे बख़्श दिया,

कैसे बचती वो इंसानों से।

है दुनिया की रीत यही,

जो हुआ नहीं, वो ही होना था

गवांकर सबकुछ बेहोशी में,

गहरी नींद में फिर से सोना था।

मुझसे मेरा कुछ रुठ गया,

कोई तरकीब बताओ मनाने की,

ये ना पूछो मुझे क्या हासिल है,

कोई दवा बताओ भुलाने की।

जो साथ तेरा मैं निभा न सका,

अब अफ़सोस न करना खोने का,

पहचान तेरी एक समंदर थी,

मुझे किसी और का दरिया होना था…

(स्वलिखित)

तुमसे ही हर ख़ुशी है…

तुमसे ही हर ख़ुशी है,

तुमसे ही सारे हैं ग़म,

सब दर्द भी तुम्हीं से,

तुम ही हर दर्द पर हो मरहम।

ये ज़िदगी है तुम्हारी,

तुम हो ज़िदंगी की सरगम,

मैं भटका हुआ हूं दरिया,

तुम ही हो मेरा संगम।

कैसी है ये मोहब्बत,

कैसी है ये उलझन,

मैं धड़क रहा हूं तुझमें,

तुम हो मेरे दिल की धड़कन।

तेरी रूह में उतरकर,

मिला है एक समुंदर,

जीता हूं मैं ख़ुद में बेशक,

पर जिंदा हूं तेरे अंदर।

अधरों से मेरे लगकर,

बाँसुरी बन गई हो,

मंज़िलें तो बहुत हैं,

तुम आख़िरी बन गई हो।

तेरे इश्क की तलब भी,

रहती है मुझे हरदम,

मैं प्यासा सा एक मुसाफ़िर,

तुम सुबह की पहली शबनम…

आंगन का तेरे मैं बादल होना चाहता हूं…

आंगन का तेरे,

मैं बादल होना चाहता हूं,

रातों का तेरी,

मैं काजल होना चाहता हूं।

तेरे दीदार की तलब,

बेशुमार लग गई है,

अदाओं का तेरी,

मैं कायल होना चाहता हूं।

पैमानों का नशा तो,

फिर भी टूट जाता है,

निगाहों से तेरी,

मैं घायल होना चाहता हूं।

तेरे ज़िक्र ने बढ़ा दिया है,

मुश्किलों को मेरी,

हर ज़िक्र में तेरे,

मैं शामिल होना चाहता हूं।

लोग मांगते हैं खुदा से,

हर दिन नया कुछ,

मैं इश्क में तेरे,

कामिल होना चाहता हूं।

सिलसिले ख़त्म करना,

अब मुनासिब नहीं है,

टूटकर मैं अब फिर से,

काबिल होना चाहता हूं…

(स्वलिखित)

अपने ही घर में फिर से मेहमान हो गया हूं…

अपने ही घर में फिर से,

मेहमान हो गया हूं,

जब से मिला हूं तुमसे,

ख़ुद से अंजान हो गया हूं।

यूं तो हमें भी बहुत थे,

काम ज़िदंगी में,

भुलाकर सारी दुनियादारी,

फिर से नादान हो गया हूं।

हद में ही रहकर हमेशा,

इश्क किया है तुमसे,

आँखों मे पढ़ लो इशारे,

मैं बेज़ुबान हो गया हूं।

बनकर मेरी तमन्ना,

तुम कमाल कर रही हो,

शामिल होकर हर दुआ में,

मुझे निहाल कर रही हो।

सोचता हूं तुमसे मिलकर,

कुछ और अब ना सोचूं,

देखकर तुझमें ख़ुद को,

कुछ और अब ना देखूं।

अलग मेरा पता नहीं है,

तेरा पता ही है मेरा,

मिटाकर ख़ुद को तुझमें,

फिर से गुमनाम हो गया हूं…

(स्वलिखित)

आप वैलेंटाइन दिवस पर उनसे क्या कहना चाहते हैं?

तुम वो तारीख़ हो,जो कभी बदलती नहीं,

मैं वो लहर हूं,जो कहीं पर ठहरती नहीं,

एक डर है तुम्हें पाकर फिर खो न दूं,

तुम बनके बारिश मुझ पर क्यों बरसती नहीं।

तुम हो वजह जीने की और सबब मरने का,

तुम बन के साया मुझ में ही क्यों बसती नहीं,

ढूंढ़ता फिर रहा हूं तुम्हे दर- ब-दर,

तुम कहां खो गई हो,क्यों दिखती नहीं।

दूरियों ने बढ़ा दिया है यादों का हौसला,

तुम बनके खु़शबू क्यों मुझमें महकती नहीं,

रात पर छा रहा है ये कैसा नशा,

तुम बन के हवा क्यों फिज़ा में चहकती नहीं।

ना रूका था ना रूकेगा, कभी किसी के

फ़ितरत इस दिल की कभी बदलती नहीं,

तेरी सोहबत की रहती है मुझको तलब,

ग़ैरों की महफ़िल में तबीयत अब बहकती नहीं।

तेरे बिना जीने में अब नहीं है मज़ा,

रातें भी हैं बेबस और धुंधली है हर सुबह,

मिल जाओ मुझे तुम बादलों की तरह,

पानी से प्यास अब बुझती नहीं…

(स्वलिखित)

दुनिया तो एक ही है पर सबकी अलग-अलग है…

दुनिया तो एक ही है,

पर सबकी अलग-अलग है,

मज़िल तो एक ही है,

पर कश्ती अलग-अलग है।

प्यासा है हर मुसाफ़िर,

पैमाने अलग-अलग हैं,

जाना है सबको यहां से,

बहाने अलग-अलग हैं।

मुकम्मल कुछ नहीं है,

बनावट अलग-अलग है,

लोग रूप के हैं दीवाने,

सजावट अलग-अलग है।

ज़िदंगी है कोई सपना,

अभी रात चल रही है,

कहीं आग लगी हुई है,

कहीं बरसात चल रही है।

जरूरत से ज्यादा सबकुछ,

होना भी एक नशा है,

पानी का रंग नहीं है,

पर किरदार अलग-अलग हैं।

जो शुरू होकर फिर ख़त्म ना हो,

ऐसा मेरा ख़ुदा है,

मालिक तो एक ही है,

गुनाहग़ार अलग-अलग हैं…

(स्वलिखित)

मिट्टी भी जमा की थी,खिलौने भी बना के देखे…

मिट्टी भी जमा की थी,

खिलौने भी बना के देखे,

धूप भी थी मुस्कुराई,

खुश्बू से हवा भी महके।

कहां चले गए हो,

क्यूं नज़र नहीं आते,

पराया फिर कर रहे हो,

अपना मुझे कहके।

कभी इसके लिए जिए हम,

कभी उसके लिए जिए तुम,

ज़िदगी की कश्मकश में,

कब अपने लिए जिए हम।

जीवन के इस सफ़र में,

कुछ ऐसे मोड़ हैं आते,

कहना होता भी है जरूरी,

पर कुछ कह नहीं पाते।

रोज़ जल रहे हैं,

फिर भी ख़ाक नहीं हुए हैं,

कुछ साथ का नशा है,

कुछ मिज़ाज भी हैं बहके।

कितना भी मसरूफ़ कर लूं,

मैं ख़ुद को ज़िदंगी में,

तेरे नाम का एक लम्हा,

दिन- रात मुझमें चहके…

(स्वलिखित)

ढूंढ़ लेती हैं तेरी यादें हमें हर दिन नये बहाने से…

ढूंढ़ लेती हैं तेरी यादें हमें,

हर दिन नये बहाने से,

क्या वो भी वाकिफ़ हो गई हैं,

मेरे हर ठिकाने से।

गुज़र रही है ये ज़िदंगी,

हर रोज़ नये इम्तिहानों से,

हवाओं की ज़िद भारी पड़ गई,

जब चूका तीर कोई निशाने से।

एक सवाल बहुत सता रहा,

मिलकर भी हम क्यूं मिले नहीं,

जब मिलना ही नहीं था नसीब में,

फिर क्या हासिल हुआ हमें आज़माने से।

तरस रही हैं निगाह क्यूं,

पल भर के उनके दीदार को,

वो मेरा कभी हुआ नहीं,

जिसे छिपाते रहे हम सारे ज़माने से।

बहुत तकलीफ़ देता है वो,

जो ज़ख्म मिले बिना कुसूर के,

कैसे करूं मैं वो दर्द बयां,

जब चढ़े नशा बिना सुरूर के।

भरोसा करके समंदर पर,

नदी मीठे से खारी हो गई,

मोहब्बत की कोई वजह नहीं,

वो बेवजह ही हमारी हो गई।

मिला तो हमें रब भी नहीं,

क्या हासिल हुआ तकदीर पर इल्ज़ाम लगाने से,

दिल फिर भी धड़कता तेरे लिए रहा,

वो माना भी कब किसीके समझाने से…

(स्वलिखित)