अपना कहकर छीन लिया जो कभी था मेरे संग…

अपना कहकर छीन लिया,

जो कभी था मेरे संग,

तेरा भी मुझमें कुछ रह गया,

जब चढ़ा इश्क का रंग।

बन जाओ तुम हर ख्वाहिश मेरी,

बन जाऊं मैं तुम्हारी हर पसंद,

फिर तेरे संग उड़ जाऊं मैं,

जैसे हवा संग उड़े पतंग।

कुछ पा लिया,कुछ खो दिया

कुछ छूट गया बेरंग,

रूह से रूह जब जुड़ गई,

हर रंग हुआ नौरंग।

सूना-सूना सा जग मेरा,

फ़ीकी लगती है हर सुगंध,

मैं साया, तुम ज़िद मेरी

मैं निश्चय, तुम मेरी सौगंध।

ठहरे पानी जैसा इश्क मेरा,

तुम जल में उठती तरंग,

छू लिया तो हलचल मच गई,

जैसे नस-नस में उठे उमंग…

(स्वलिखित)

दो पल की ज़िंदगी है और अरमान बहुत हैं…

दो पल की ज़िंदगी है,

और अरमान बहुत हैं,

कहते वो कुछ नहीं हैं,

पर परेशान बहुत हैं।

छुपे-छुपे से हैं रहते,

दिखते कहीं नहीं हैं,

कहने को तो वो हैं मेरे,

पर हमसे अंजान बहुत हैं।

चेहरा हंस रहा है,

दिल में कसक है उठती,

जो होता नहीं, वो है दिखता,

और वो हैरान बहुत हैं।

चुप रहना भी हुनर है,

ख़ामोशी की भी नज़र है,

जल्दबाज़ है ये दुनिया,

और वो नादान बहुत हैं।

तन की बंदिशों से,

मन ने की है बगावत,

ज़माना कहता है इश्क जिसको,

किसी के लिए है वो इबादत।

ना उम्र की है सीमा,

ना मजहब ही कोई हद है,

ये इश्क का शहर है,

दूर अपना मुकाम बहुत है…

(स्वलिखित)

दो पल की ज़िंदगी है और अरमान बहुत हैं…

दो पल की ज़िंदगी है,

और अरमान बहुत हैं,

कहते वो कुछ नहीं हैं,

पर परेशान बहुत हैं।

छुपे-छुपे से हैं रहते,

दिखते कहीं नहीं हैं,

कहने को तो वो हैं मेरे,

पर हमसे अंजान बहुत हैं।

चेहरा हंस रहा है,

दिल में कसक है उठती,

जो होता नहीं, वो है दिखता,

और वो हैरान बहुत हैं।

चुप रहना भी हुनर है,

ख़ामोशी की भी नज़र है,

जल्दबाज़ है ये दुनिया,

और वो नादान बहुत हैं।

तन की बंदिशों से,

मन ने की है बगावत,

ज़माना कहता है इश्क जिसको,

किसी के लिए है वो इबादत।

ना उम्र की है सीमा,

ना मजहब ही कोई हद है,

ये इश्क का शहर है,

और दूर अपना मुकाम बहुत है…

(स्वलिखित)

टूटकर फिर से जुड़ना,जुड़कर फिर बिखरना…

टूटकर फिर से जुड़ना,

जुड़कर फिर बिखरना,

अखरता अब नहीं है,

यूं रोज़-रोज़ मरना।

राख हूं मैं बेशक,

हवा तेज़ चल रही है,

संग तेरे मैं उड़ रहा हूं,

कहीं नहीं है अब ठहरना।

बारिश की बूंद सा है,

ज़िदगी का सफर भी,

ख़ाक से ही मैं उठा हूं,

ख़ाक में ही फिर है मिलना।

कभी खुशी के हैं आंसू,

कभी ग़म की हंसी है,

धीमा सा ये ज़हर है,

और जल्दी हमें नहीं है।

पसंद तो बहुत है,

संग हमारा उन्हें भी,

कुछ मजबूरियां हमारी,

कुछ तुम्हारा यूं पलटना।

खो दोगे हमें भी,

देखो एक दिन तुम ,

सीखा तुमने बहुत है,

बस सीखा नहीं हमें परखना…

(स्वलिखित)

मशहूर होने का शौक नहीं है…

मशहूर होने का शौक नहीं है,

ख़ुद की ख़ुद से पहचान ही काफी है,

सपनो के पंख कटते कहाँ हैं,

उड़ने के लिए हौसलों की उड़ान ही काफी हैं।

तुम्हें जिंदगी की हर खुशी हो मुबारक,

मेरे लिए अंधेरों का आसमान ही काफी है,

नए ज़ख्म की जरूरत किसे अब यहां है,

मेरे लिए पुरानी चोटों के निशान ही काफी है।

यादें पुरानी चेहरे नए हैं,

जीने के लिए तेरी एक मुस्कान ही काफी है,

दिलों से खेलने की जरूरत नहीं है,

बर्बादियों के लिए ख़ामोशियों का इल्ज़ाम ही काफी है।

महख़ाने बेवजह बदनाम हो गए हैं,

ज़हर पीने को यार की कड़वी ज़ुबान ही काफी है,

दर-ब-दर भटकने की जरूरत नहीं है,

रोशनी के लिए कमरे में एक रोशनदान ही काफी है।

मँज़िले भी जिद्दी हैं,

रास्ते भी जिद्दी हैं,

मुश्किलों से पार पाने के लिए,

महबूब का मेहरबान होना ही काफी है।

आरजू के सहारे जिंदगी कट रही है

बेबसी में सब्र के इंम्तिहान ही काफी हैं

हर दफ़ा इत्तेफ़ाक की जरुरत नहीं है

बुलंदियां छूने के लिए अकेला इंसान ही काफी है…

(स्वलिखित)

उलझे हुए कुछ सपने हैं उलझी हुई कुछ ख्वाहिश हैं…

उलझे हुए कुछ सपने हैं,

उलझी हुई कुछ ख्वाहिश हैं,

दिल में गहरी तड़पन है,

कहीं दूर उनकी रिहाइश है।

उनके बिना मैं अधूरा हूं,

अधूरी जिंदगी की हर फरमाइश है,

इल्ज़ाम मुझ पर हजारो हैं,

बड़ी मुश्किल इश्क की आजमाइश है।

मैं तेरे मन की ख़ामोशी हूं,

तुम मेरे मन की हो आवाज़,

मैं तुम्हारी उलझी कहानी हूं,

मेरी कहानी की तुम हो अल्फाज़।

दूर तलक सुलगती हुई रेत है,

पानी की गहरी प्यास है,

दूर बहता कहीं एक दरिया है,

और साहिल मेरे पास है।

ये कैसी बेचैनी है,

कैसी ये साजिश है,

उलझन भी मीठी लगती है,

नए मौसम की पहली बारिश है।

मेरा मुझमें कुछ बचा नहीं,

सबकुछ नाम तेरे कर आया हूं,

बस जाओ मेरी अब रूह में तुम,

बस इतनी सी गुज़ारिश है…

(स्वलिखित)

कड़ाके की ठंड और सर्द ये हवाएं…

कड़ाके की ठंड,

और सर्द ये हवाएं,

तेरा हौले से मुस्कुराना,

और दूरियों की ये सजाएं।

शोला बनकर सुलग रहा हूं,

यादों में अब मैं तेरी,

तू मुझमें जल रही है,

कैसे आग ये बुझाएं।

ना वो कुछ कह सके थे,

ना हम कुछ कह सके हैं,

अभी अजनबी ही हम हैं,

और ख़ामोश हैं फिज़ाएं।

जाने किस राह चल पड़ा है,

दिल भी हमारा देखो,

बेख़बर हैं वो हमसे,

हाल-ए-दिल किसे सुनाएं।

ये दिल्लगी हमारी,

भारी है उनके दिल पर,

वो नज़रों से सब कह रहे हैं,

क़ातिल तेरी अदाएं।

आंखोंं में पढ़ रहे हैं,

वो मेरी हर तमन्ना,

जनवरी का ये महीना,

और मुकम्मल मेरी दुआएं…

(स्वलिखित)

ना किसी के साथ हूं ना किसी के पास हूं…

ना किसी के साथ हूं,

ना किसी के पास हूं,

साल नया लग गया,

मैं बेवजह उदास हूं।

तारीख भी बदल गई,

महीना भी बदल गया,

तुम आकर मुझे सम्हाल लो,

मैं टूटता पलाश हूं।

मौसम बहुत सर्द है,

दिल में बहुत दर्द है,

अधूरा हूं मैं तेरे बिना,

मुकम्मल मेरा हमदर्द है।

मुद्दतें गुज़र गईं,

हिसाब हमने किया नहीं,

उसने कुछ सुना नहीं,

हमने कुछ कहा नहीं।

वो ढूंढ़ते हमें रहे,

हम कहीं मिले नहीं,

अब अपने दिल ढूंढ़ लो,

मैं तुम्हारे ही आस-पास हूं।

आज भी लिखा नहीं,

बस इतना तुम समझ लो,

मेरी तुम प्यास हो,

मैं तुम्हारी तालाश हूं…

(स्वलिखित)

नफ़रत करता हूं तो उनकी अहमियत बढ़ जाती है…

नफ़रत करता हूं तो,

उनकी अहमियत बढ़ जाती है,

चुप रहता हूं तो,

उनकी मासूमियत बढ़ जाती है।

उनसे भी ज्यादा कातिल है,

उनकी दुश्मनी,

वो नज़रों से मारते हैं तो,

उनकी ख़ासियत बढ़ जाती है।

बड़े सलीके से हवाओं में,

वो ख़ुशबू सी घोल देते हैं,

जब हवाएं तेज़ चलती हैं,

वो अपनी ज़ुल्फें खोल देते हैं।

अपनी तलब तुम्हें कहूं,

या ख्वाइश तुम्हें कहूं,

आगाज़ तुम कर दो,

अंजाम मैं बनूं।

कोई मंज़िल नहीं हो जिसकी,

मोहब्बत वो रास्ता है,

जब संग वो मेरे चलते हैं,

सफ़र की कैफ़ियत बढ़ जाती है।

इस ख़त मे क्या लिखूं,

इंतज़ार ये बेजुबां है,

वो हाथ बढ़ाकर छू लेते हैं,

इश्क की रुहानियत बढ़ जाती है…

दुआओं का कोई रंग नहीं होता…

दुआओं का कोई,

रंग नहीं होता,

इश्क करने का कोई,

ढंग नहीं होता।

आ न जाना कहीं तुम,

वक्त की बातों में देखो,

वक्त भी हमेशा,

किसी के संग नहीं होता।

दुनिया में आज़माते हैं,

लोग किस्मत को अपनी,

किस्मत का लिखा हमेशा,

सबको पसंद नहीं होता।

डूब जाता है सूरज,

हर शाम को लेकिन,

अंबर का आँचल,

कभी बेरंग नहीं होता।

तेरी साँसों सी महक,

कहीं नहीं मिलती,

हर आशिक इश्क में,

कटी पतंग नहीं होता।

कोई ठहरता नहीं है,

पल भर भी कभी देखो,

और किसी के दिल का दरवाज़ा,

कभी बंद नहीं होता…

(स्वलिखित)