उसकी हर बात एक राज़ सी क्यूं है ?

उसकी हर बात एक राज़ सी क्यूं है

ढलती हुई ये शाम उदास सी क्यूं है

खुशियों का ठौर कहां हम ढूंढे

मंजिलें मुझसे नाराज़ सी क्यूं है

जो मिला है उसकी कद्र कहां है

जो नहीं है उसकी तालाश सी क्यूं है

हर चेहरे के पीछे छिपा एक चेहरा है

झूठ में सच की आस सी क्यूं है

बाहर दिवाली दिलों में अंधेरा है

पानी में रहकर भी प्यास सी क्यूं है

तारों की महफिल पे चांद का पहरा है

चांदनी इतनी उदास सी क्यूं है

जिंदगी तुम कितने सवाल करती हो

जब भी करती हो बेमिसाल करती हो,

जिंदगी तुम जितने भी सवाल करती हो,

कहां खुशी मिलती है, कहां ग़म मिलता है,

लोगों को लगता है हर इंसान यहां बिकता है।

जैसे ही कुछ सम्हलता हूं फिर कमाल करती हो,

नई मुश्किलों से फिर हलाल करती हो,

ना रात रूकती है, ना दिन ठहरता है,

यहां वक्त भी किसी के लिए कहां रूकता है?

कभी ऐसे कभी वैसे निहाल करती हो,

कांटों में फूलों के जैसे ख्याल करती हो,

कुछ स्याह कुछ सफेद लकीरों ने घेरा है,

हर रात के बाद जीवन फिर नया सवेरा है।

कभी सीधे कभी तीखे सवाल करती हो,

अपनी चालों से मुझे बेहाल करती हो,

जब भी करती हो बेमिसाल करती हो,

जिंदगी तुम जितने भी सवाल करती हो।

हर बात की कोई कहानी नहीं होती

हर बात की कोई कहानी नहीं होती,

हर धुन की मीरा दीवानी नहीं होती,

कुछ रिश्तों का कोई नाम नहीं होता,

कुछ रिश्तों की कोई निशानी नहीं होती।

किसी की बातों में अब दिल नहीं लगता,

किसी की यादें कभी पुरानी नहीं होती,

टुकड़ों – टुकड़ों में सबको जीना पड़ता है,

संग हमेशा किसी के जवानी नहीं होती।

अपनों के लिए कभी वक्त नहीं मिलता,

गैरों की महफ़िल कभी वीरानी नहीं होती,

तिनके-तिनके से घर बना करता है,

अपनों से अपनों को परेशानी नहीं होती।

(स्वरचित)

दिखता नहीं है जो वो कहीं अंदर छिपा रहता है

दिखता नहीं है जो वो कहीं अंदर छिपा रहता है,

ख़ामोश निगाहों में भी एक समंदर छिपा रहता है,

यकीन आता नहीं तो कभी आज़मा के देख लो,

रिश्तों की आड़ में भी एक खंजर छिपा रहता है।

जो कहते है उन्हें किसी का खौफ़ नहीं,

आखों में उनकी भी डर का मंज़र छिपा रहता है,

मुमकिन है किनारों को पता भी न चले,

ठहरे पानी में भी एक बवंडर छिपा रहता है।

कोई माने न माने पर हकीक़त है यही,

रिश्तों का मकसद तो मतलब के अंदर छिपा रहता है,

लोग ढूढ़ते हैं खु़दा को पत्थरों में कहीं,

असली ख़ुदा तो दिल के अंदर छिपा रहता है।

एक शोर जो गुमसुम सा है

भीतर एक शोर जो गुमसुम सा है

कहीं दूर बजती बाँसुरी की धुन सा है

कभी दूर जाता कभी पास आता हुआ

किसी शायर की अधूरी नज़्म सा है।

शहर-दर-शहर भटकता हुआ

ये रेत में पानी के वहम सा है

आईने में अपनें अक्स को ढूंढ़ता

ये इश्क की अधूरी कसम सा है।

सर्दियों की सुबह में नर्म धूप सा

ये घास पे बिखरी शबनम सा है

कभी लहराता, कभी थर-थराता हुआ

ये शोर बहुत बेशरम सा है।

हर बात को दिल से लगाया न करो

हर बात को दिल से लगाया न करो,

अपने अश्कों से इश्क को छिपाया न करो,

जो चला गया उससे अब रिहा रहो,

गुज़रे कल को फिर से बुलाया न करो।

मासूम इश्क को दुनियादारी की समझ नहीं,

बातों में अपनी उसे यूं उलझाया न करो,

बाहर लोग हाथों में नमक लिए घूमते हैं,

हर किसी को ज़ख्म अपने दिखाया न करो।

दुनिया में जज़्बातों की कद्र किसे है,

राज़ अपने हर किसी को बताया न करो,

जिन आंखों में तेरे लिए आंसू न हों,

अपनी किस्मत वहां आजमाया न करो।

हर बात को दिल से लगाया न करो,

कभी सख्त है, कभी नरम सी है

कभी सख्त है, कभी नरम सी है

ये जिंदगी मेरे सनम सी है

कभी बोलती, कभी ख़ामोश सी

ये जिंदगी बस एक वहम सी है।

कभी धूप में जलती रेत सी,

ये जिंदगी बहुत बेरहम सी है

कभी अंधेरी राहों में उम्मीद सी

यें जिंदगी खुदा के रहम सी है।

कभी दूसरों को पैरों तले रौंदती

ये जिंदगी एक झूठे अहम सी है

कभी किसी की यादों में खोई सी

ये जिंदगी एक गहरे जख़्म सी है।

बातों-बातों में जो उसने कही होंगी

बातों-बातों में जो उसने कही होंगी

वो मुलाकातें भी कितनी हसीन रही होंगी

पत्तों पर ओस की बूंदों के मानिंद

साथ उनके शामें भी ढली होंगी

जो समझे नहीं हम तो उनकी क्या ख़ता

बातें उसने इशारों से कही होंगी

ऐ दिल वक्त है संभल जा जरा

वो मेहरबान हर बार नहीं होंगी

एक उनका साथ पाने के लिए

कितनी बातें किसी ने सही होंगी।

जब महफ़िल में जिक्र उनका हुआ होगा

मेरे बारे में भी बातें रही होंगी।

जो मेरी नज़रों से फ़ना हो गई है

जो मेरी नज़रों से फ़ना हो गई है,

वो सूरत किसी के लिए ख़ुदा हो गई है,

चलो आज फिर से देखें उस बेवफ़ा को,

जिस पत्थर पे दुनिया फ़िदा हो गई है।

अर्से के बाद जब देखा उसे तब ये जाना,

वो तब क्या थी और अब क्या से क्या हो गई है।

छू के चली जाती है वो ठंडी हवा के मानिंद,

ये हवा भी अब बेवफ़ा हो गई है।

न खोने का ग़म है न पाने की खुशी,

ये जिंदगी क्यों इतनी बेवजह हो गई है,

ना रातों को चैन है न सुबह को सुकून,

शायद कुबूल किसी की दुआ हो गई है।

वो दर्द भी अच्छा है

एक प्रसिद्ध कहावत है कि जीवन में आपको सबसे ज्यादा प्यार वो करता है जिसे जिंदगी में सबसे ज्यादा चोट लगी होती है। वे लोग शायद आप के साथ दूसरों की तुलना में बेहतर व्यवहार करेंगे यदि उन्होंने पूर्व में चोट खायी है।

ऐसा क्यों होता है? दरअसल जिन लोगों के अपने दिल कभी टूट चुके हों, अक्सर उन्हें पता होता है कि टूटे हुए टुकड़ों को कैसे जोड़ा जा सकता है। यही कारण है कि दूसरों से व्यवहार करते समय ऐसे लोग भावनात्मक रूप से कटौती नहीं करते हैं।

यह संभव है कि कुछ अच्छे लोग निराशावादी होते हों लेकिन समय के साथ, वे आम तौर पर सीखते हैं कि कठिन रास्तों पर चलते हुए सकारात्मक कैसे बनें? अच्छे लोग कभी नहीं चाहते हैं कि दूसरों को भी वो चोट लगे जिस तरह की चोट उन्हें लगी हैं।

ऐसा हो सकता है कि अच्छे लोगों को को उनकी शारीरिक बनावट,रंग-रूप या फिर शारीरिक अक्षमता के लिए परेशान किया जाता हो, फिर भी समय के साथ वे लोगों को माफ करके आगे बढ़ जाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यह पीड़ा महसूस करने की तरह है, वे कभी भी किसी और को ऐसा ही दर्द नहीं होने देना चाहते हैं।

दूसरों को परेशान करने के बजाय, अच्छे लोग असंवेदनशीलता की चक्रीय प्रकृति को तोड़ते हैं। वे प्रशंसा और प्रोत्साहन के शब्द कहते हैं। वे चाहते हैं कि दूसरों को उनकी बदसूरती और चोटों को दिखाने के बजाय उनमें गुणों की सुंदरता और आत्मविश्वास महसूस हो। वे पहले से ही जानते हैं कि यह सब सहना कैसा है, और वे अपने सबसे खराब दुश्मनों पर भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहते हैं।

अच्छे लोग बचे रहना पसंद करते हैं जो दूसरों को भी बचे रहने में सहायता करते हैं। ऐसे लोग किसी भी परिस्थिति में और किसी भी स्थिति से अपना रास्ता निकाल सकते हैं। उनकी चोटों के निशान सबूत हैं कि वे पहले भी ऐसी पीड़ा से गुजर चुके हैं।

जीवन की दौड़ में, अधिकांश लोग आमतौर पर केवल खुद पर ध्यान देते हैं लेकिन कुछ लोग हैं जो इस तरह के संघर्षों से गुजर चुके हैं, ये लोगों के जख्मों को सहलाते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं और अपने साथ चलने के लिए दूसरों को प्रेरित करते हैं।

ऐसे लोग मदद करने वाले हाथ बन जाते हैं जैसा कि वे कभी खुद के लिए चाहते थे। शायद जीना इसी का नाम है।