इंसानियत

डाक्टर अभिनव का कोलकाता में बड़ा नाम था. वह ह्रदय रोग विशेषज्ञ थे. वे बेहद मिलनसार और मृदुभाषी थे. वे अमीर गरीब सभी के लिए सामान रूप से उपलब्ध थे. रोगी का आधा रोग उनकी दवा से और आधा उनके व्यवहार, उनकी संवेदनशीलता, उनकी प्रेरक बातों से ठीक हो जाता था. बड़ी भीड़ रहती थी उनसे मिलने वालों की, लाइन में बैठा एक बूढ़ा भी अपनी बारी का इंतजार कर रहा था वह ह्रदय की गंभीर समस्या से जूझ रहा था.

लंबे समय के बाद उसका नंबर आ ही गया उसने कमरे में प्रवेश किया और स्टूल पर बैठ गया. आप नाम क्या है डाक्टर ने पूछा उत्तर मिला डाक्टर विनोद तिवारी भूतपूर्व बाल रोग विशेषज्ञ. यह सुनते ही मानो डाक्टर अभिनव को बिजली का झटका लगा हो. उन्होंने उनकी तरफ देखा और भाव शून्य हो गये उनके सामने 30 वर्ष का दृश्य तेजी से घूम गया.

उस दिन बारिश तेज़ हो रही थी, रह रह कर बिजली चमक उठती थी जिसकी रोशनी में उसके माथे पर पसीने की बूँदें दिख जाती थीं. वह पूरी तरह से भीग गया था. पर इन सब बातों से बेखबर वह तेज कदमों से बढ़ता जा रहा था. उसने बाहों में चादर से कोई चीज़ लपेट रखी थी जिसे मजबूती से अपने सीने से चिपकाकर वह तेजी से आगे बढ़ता जा रहा था. खराब मौसम भी उसके इरादों को डिगा नहीं पा रहा था. उसका बच्चा बुखार से तप रहा था और वह उसे लेकर डॉक्टर तिवारी के पास जा रहा था. वह कोलकाता के जाने माने बाल रोग विशेषज्ञ थे.

इस खराब मौसम में उसे कोई साधन नहीं मिल पा रहा था इसलिए वह अपने बच्चे को लेकर पैदल ही डाक्टर के पास जाने के लिए निकल पड़ा था. अपने बच्चे में इंसान की जान बसती है और आज उसकी जान मुश्किल में थी इसलिए बिना किसी बाधा की परवाह किए वह डाक्टर की क्लीनिक तक पहुंच ही गया था. पर लगता था कि किस्मत उसे अभी और आजमाना चाहती थी क्योंकि क्लीनिक बंद हो चुका था और अब उसके पास एकमात्र विकल्प डाक्टर के घर जाकर अपने बच्चे को दिखाना बचा था.

मरता क्या न करता वह बच्चे को गोद में उठाए हुए डाक्टर तिवारी के घर भी पहुंच गया पर मौसम खराब होने के कारण उसे देर हो गई थी और डाक्टर साहब सोने के लिए चले गए थे. बड़ी मनुहार के बाद चौकीदार ने 500 रूपये का नोट उसके हाथ से लेकर अपनी जेब के हवाले किया और डाक्टर को उठाने के लिए चला गया. थोड़ी देर बाद उसे भद्दी गालियाँ सुनाई देने लगीं. जब चौकीदार वापस आया तो उसने कहा डाक्टर ने मरीज को देखने से इंकार कर दिया है. डाक्टर को अपनी नींद में खलल पसंद नहीं आया था और उसने चौकीदार से कहलवा भेजा था कि मरता है तो मर जाए पर मेरी नींद में दुबारा बाधा मत डालना.

आज इतिहास खुद को दोहरा रहा था. वही डाक्टर तिवारी जिन्होंने कभी उसे मरने के लिए छोड़ दिया था आज स्वयं गंभीर रोग से पीड़ित होकर डाक्टर अभिनव के सामने बैठे थे. डाक्टर अभिनव का मन कड़वाहट से भर गया था . एक पल के लिए उन्हें लगा कि वह उसका इलाज नहीं कर सकते. उनका मन तीस साल की अपनी सारी पीड़ा को बीमार डाक्टर तिवारी के सामने निकाल देना चाहता था. वह उनको मजबूरी और लाचारी का अहसास करा देना चाहता था. आज डाक्टर अभिनव के पास मौका था डाक्टर तिवारी के अहंकार को चूर चूर कर देने का.

डाक्टर अभिनव के पिता ने बड़ी कठिनाइयों और मुश्किलों से उन्हें यहां तक पहुंचाया था. उनका कुछ समय पहले अल्प आयु में ही ह्रदय रोग के कारण स्वर्गवास हो चुका था. वह हमेशा डाक्टर अभिनव के दिल में बसते थे. अपने पिता की एक तस्वीर उन्होंने अपने हास्पिटल के कमरे में अपनी कुर्सी के सामने दीवार पर लगा रखी थी. डाक्टर अभिनव की नजरें अपने पिता की तस्वीर पर गयीं उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी उन्हें अपने बेटे पर नाज़ था. डाक्टर अभिनव ने डाक्टर तिवारी के साथ भी वही व्यवहार किया जैसा वह अन्य मरीजों के साथ करते थे. बूढ़े डाक्टर तिवारी उन्हे धन्यवाद देते हुए लड़खड़ाते हुए कदमों से बाहर चले गए.

डाक्टर अभिनव भी अब मरीजों को देखने के बाद उठकर घर जाने लगे. उन्होंने अपना बैग उठाया और पिता की तस्वीर को प्रणाम किया. उन्हें महसूस हुआ कि तस्वीर में मुस्कान गहरी और आंखों की चमक बढ़ गई है. उन्होंने अपने पिता के बेटे होने के फर्ज को अदा कर दिया था.

यदि मैं तुम्हारी जगह पर होता

हमारे जानने वाली एक महिला इस बात से बेहद परेशान थी कि उनका चार साल का बेटा अक्सर दूसरों के यहाँ से कुछ भी जो उसे अच्छा लगता वो सामान घर उठा कर ले आता कभी दूसरे बच्चों के खिलौने उठा लाता तो कभी उनकी पेन्सिल या किताबें उठा लाता। उसकी इस आदत से परेशान वो उसको डांटती उस पर गुस्सा होती पर बच्चे के व्यवहार में कोई परिवर्तन न होते देख उन्होंने child psychologist से मदद मांगी उन्होंने उनसे खुद को बच्चे के स्थान पर रखकर सोचने की सलाह दी और समझाया कि बच्चों को अपनी और दूसरों की चीजों का अन्तर मालूम नहीं होता,इसलिए अच्छी लगने पर कोई भी चीज उठा लेना चाहे वो किसी और की क्यों न हो,इसमें उन्हें बुराई नजर नहीं आती।

बच्चों का मानना है कि दुनिया की हर चीज अपनी है जिसे वे जब चाहे ले सकते हैं हालांकि 6 वर्ष की उम्र तक आते आते वे अपनी और दूसरों की चीजों में अन्तर करना जान जाते हैं। उन्होंने उन महिला को समझाया कि जब भी बच्चा दूसरों की चीज उठाकर घर ले आए तो उन्हें बच्चे को डाटने की बजाय खुद को बच्चे की जगह रखकर सोचना चाहिए और उसे धैर्य के साथ समझाना चाहिए, उसे गलती का एहसास कराना चाहिए कि जो चीज वो अपनी समझ कर उठा लाया है वो उसकी नहीं है और उसे उस चीज को वापस करना होगा और जब वो वह चीज वापस कर दे तो उसकी तारीफ करनी चाहिए एेसा करने पर बच्चे में सुधार होगा और यह सुधार डर के कारण नहीं होगा।

यह मानव का स्वभाव है कि अक्सर हम निर्णय लेते वक्त भावनाओं में बह जाते हैं। यह emotions क्रोध, दया, sympathy,पूर्वाग्रह या prejudice हो सकते हैं। एेसे में हमारे निर्णय के गलत होने की संभावना बढ़ जाती है। पर खुद को भावनाओं या emotions से मुक्त रखना बड़ा ही मुश्किल काम है। मानव मन है ही एेसा जो भावनाओं और संवेदनाओं से भरा हुआ है और भावनाओं पर नियंत्रण रखना नामुमकिन नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर है।


अंग्रेजी में एक कहावत है When you take decision put yourself in another shoe.यानी निर्णय लेते वक्त खुद को दूसरे के स्थान पर रखना चाहिए। बड़ी ही practical बात है दूसरे व्यक्ति की मनोदशा समझने का इससे अच्छा तरीका हो ही नहीं सकता। जब हम खुद को दूसरे के स्थान पर रखते हैं तो दूसरे व्यक्ति की मनोदशा के साथ हमें उन परिस्थितियों को भी समझने में मदद मिलती है जिसके प्रभाव में व्यक्ति वर्तमान में में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। फिर जब हम दूसरे व्यक्ति के बारे में निर्णय लेते हैं तो उसके सही होने की संभावना बढ़ जाती है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि एेसा करने में या सोचने में हमें अपनी भावनाओं से मुक्त भी नहीं होना पड़ता है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि आपको को किसी की बात सुनकर गुस्सा आ गया है और बदले में आप भी क्रोध में आकर प्रतिक्रिया व्यक्त करने जा रहे हैं तो आपकी प्रतिक्रिया के सही होने की संभावना बढ़ जाएगी यदि आप खुद को सामने वाले के स्थान पर रखकर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।


यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो क्या होता, क्या हमारी दुनिया एेसी होती, क्या मैं और भी बेहतर होता, क्या जिदंगी और भी अच्छी होती… इन सभी के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है पर एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो आपके निर्णय बेहतर होते और आपको उन निर्णय निर्णयों पर अफसोस भी कम होता क्योंकि जब आप दूसरों के स्थान पर खुद को रखकर निर्णय लेते हैं तो दरअसल आप दूसरों के बारे में नहीं बल्कि खुद के बारे में निर्णय लेते हैं और आपके बारे में आपसे बेहतर कौन जानता है यही कारण है कि आपके निर्णय के सही होने की संभावना बढ़ जाती है…

विचार ही आदत बन जाते हैं

हम आज जो भी हैं अपनी आदतों की वजह से हैं। आदतें ही वो हैं जो हमें बनाती हैं और मिटाती हैं। वक्त के साथ आदतें भी बदलती रहती हैं नई आती हैं और पुरानी जाती हैं वहीं कुछ आदतें एेसी भी होती हैं जो ताउम्र नहीं बदलती हैं। जो आदतें कभी नहीं बदलती वो हमारे सब कॉन्शस या अचेतन मन का हिस्सा बन जाती हैं और हमारे चीजों को देखने के नजरिये को प्रभावित करती हैं।

हमारा नजरिया और हमारी आदतें मिलकर हमारा स्वभाव बनाती हैं। हम देखते हैं कि एक परिस्थिति में दो अलग अलग स्वभाव के लोग अलग प्रतिक्रिया देते हैं इसका मतलब यह भी हुआ कि एक स्वभाव के लोग किसी एक परिस्थितियों में लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया देगें। यही कारण है कि बड़ी कंपनियों में समय-समय पर अलग अलग बैकग्राउंड के लोगों के लिए एक जैसी ट्रेनिंग आयोजित की जाती है इसके पीछे उद्देश्य होता है कि एक जैसी विभिन्न परिस्थितियों के आने पर सभी कर्मचारी विभिन्न परिस्थितियों में लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया दें।

हमारा स्वभाव हमारी आदतों और हमारे नजरिए का मिश्रण होता है। आदतें नजरिए को प्रभावित करती हैं और आदतों को विचार प्रभावित करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि विचारों को बदलकर आदतों को, आदतों को बदलकर नजरिए को और नजरिए को बदलकर स्वभाव को बदला जा सकता है। यही कारण है कि हमें विचारों को सकारात्मक रखने को कहा जाता है क्योंकि सकारात्मक विचार पाजिटिव और नकारात्मक विचार निगेटिव स्वभाव के निर्माण में पूरी तरह से सक्षम हैं।

दूसरे शब्दों में मनुष्य अपने विचारों को बदलकर अपना कायाकल्प कर सकता है। इसे ही बिहेवियर की cognitive resonance थ्योरी कहते हैं.. इसका सार यही है कि कोई किसी के विचारों की फ्रिक्वेंसी को पकड़ कर उसके जैसा बन सकता है या विचारों की फ्रिक्वेंसी को मैच कराकर विभिन्न परिस्थितियों में एक जैसी प्रतिक्रिया प्राप्त की जा सकती है..।

अंतर्मुखी स्वभाव

1- दूसरों के लिए आपको और आपके विकल्पों को समझना मुश्किल होता है। यहां तक कि आपके परिवार के निकटतम सदस्यों और दोस्तों को भी आपके दिमाग के अंदर क्या चल रहा है, इसका पता नहीं होता।

2- किसी चीज़ को जरूरत से ज्यादा सोचना अंतर्मुखी स्वभाव के व्यक्तियों की सबसे बुरी आदतों में से एक है। अधिकतम समय आपके दिमाग में कुछ न कुछ चलता रहता है। आप हमेशा अपने भविष्य, करियर, आदतों और कई दूसरी चीजों के बारे में सोचते रहते हैं।

3- अंतर्मुखी स्वभाव के लोग अपना समय एकांत में बिताना पसंद करते हैं और अक्सर कम बोलने वाले होते हैं। अधिकांश समय इन्हें दूसरों को समक्ष अपनी भावनाओं को व्यक्त करने या कहने में हिचकिचाहट महसूस होती है।

4- दूसरों से मदद लेने के मामले में शर्मीले स्वभाव के लोगों की स्थिति अत्यंत दयनीय होती है। दूसरों की मदद लेने में वे बुरा महसूस करते हैं और कई बार सोचते हैं।

5- जब अंतर्मुखी स्वभाव के लोगों के मन में कोई संदेह होता है तो वे सीधे सवाल नहीं पूछते हैं, वे केवल यह सोचते हैं कि उन्हें पूछना चाहिए या नहीं, फिर कुछ बार सोचने के बाद वे इसे छोड़ने का फैसला करते हैं और अन्य स्रोतोंं के माध्यम से अपने डाउट क्लीयर करते हैं।

6- अंतर्मुखी स्वभाव के लोग जानते हैं कि लोग उन्हें छोटी-छोटी बातों में बेवकूफ बनाने की कोशिश करते हैं फिर भी वे इसे लेकर चिंतित नहीं होते क्योंकि वे बहस करना पसंद नहीं करते हैं। दूसरों से धोखा खाना उनकी अक्षमता नहीं है बल्कि यह दूसरों पर हर बार भरोसा करने और माफ कर देने की उनके दिल की दयालुता है।

7- शर्मीले स्वभाव के लोग सबसे दुर्भाग्यशाली एक तरफा प्रेमी होते हैं। यहां तक कि उनके सबसे अच्छे दोस्त को भी पता नहीं होता कि वो प्यार में हैं।

8- अंतर्मुखी और शर्मीले स्वभाव वालों के पास कई भावनाओं के लिए एक ही चेहरा होता है क्योंकि ये अंदर ही रोते हैं, अंदर ही हंसते हैं, अंदर ही प्यार करते हैं और अंदर ही नफरत करते हैं।

9- अंतर्मुखी और शर्मीले स्वभाव के लोगों के जीवन की कहानी में हर भूमिका के लिए उनके पास बहुत कम लोग होते हैं और जब वे उनमें से किसी को खो देते हैं, तो उन्हें बहुत गहराई से दर्द देता है और उन घावों को ठीक होने में कई साल लग जाते हैं।

10- अंतर्मुखी और शर्मीले स्वभाव के लोगों को असमाजिक,अपनी दुनिया में केंद्रित,अहंकारी और ऐसे अन्य विशेषणों से नवाजा जाता है क्योंकि वे ज्यादा कुछ बोलते नहीं हैं और सामाजिक घटनाओं में शरीक होने से बचते हैं।

निस्वार्थ प्रेम

दिल्ली संकेत के लिए नई थी,अभी कुछ दिन पहले ही उसका सेलेक्शन बतौर साफ्टवेयर इंजीनियर गुड़गांव स्थित एक मल्टीनेशनल कंपनी में हुआ था। संकेत अपने कालेज के कुछ दोस्तों के साथ दिल्ली में रहता था और रोजाना मेट्रो ट्रेन से गुड़गांव अप-डाउन करता था।

हजारों लोग की भीड़ संकेत के साथ प्रतिदिन सफर करती थी। वह अक्टूबर महीने की शुरुआत के दिन थे, दिन जल्दी ढलने लगे थे और मौसम में हल्की ठंड का आगाज़ हुआ था। प्रतिदिन की तरह संकेत मेट्रो ट्रेन से वापस लौट रहा था, उसका स्टेशन आने ही वाला था कि एक स्टेशन पहले ट्रेन रूकी और एक लड़की ने उसके डिब्बे में प्रवेश किया और सामने वाली सीट पर बैठ गयी।

अगले दिन से संकेत ने महसूस किया कि न जाने क्यूं अब उसका आफिस से घर और घर से आफिस तक का समय आसानी से नहीं कटता, आते और जाते समय सफर के दौरान और स्टेशन पर हजारों की भीड़ में उसकी आँखें न जाने किसको ढूंढा करती हैं?

कुछ दिनों तक संकेत को वह लड़की नहीं दिखाई दी, एक दिन अचानक जब उसकी ट्रेन गंतव्य से एक स्टेशन पहले पहुंची तो ट्रेन की खिड़की से बाहर संकेत की निगाह गई, उसने देखा कि वही लड़की एक दूसरी लड़की का हाथ पकड़े हुए स्वचालित सीढ़ियों पर खड़ी हुई थी और रात में भी काला चश्मा पहने हुए थी। संकेत ने महसूस किया कि उसके दिल की धड़कन बढ़ गई है।

उस लड़की का नाम श्रुति था। श्रुति जन्म से ही कुछ देख नहीं सकती थी, उसने अपने मजबूत इरादों के बल पर उच्च शिक्षा प्राप्त की थी, वह सरकारी स्कूल में टीचर थी। कुछ दिनों की मुलाकात के पश्चात संकेत और श्रुति बहुत करीब आ गए थे। संकेत श्रुति की आंखें तो श्रुति संकेत की जुबान बन गई थी।

श्रुति हमेशा संकेत से कहती रहती थी की तुम मुझे इतना प्यार क्यूँ करते हो!मैं तुम्हारे किसी काम नहीं आ सकती मैं तुम्हें वो प्यार नहीं दे सकती जो कोई और देगा,लेकिन संकेत उसे हमेशा दिलासा देता रहता था कि तुम ठीक हो जाओगी, तुम्हीं मेरी दुनिया हो, कुछ समय तक ये सिलसिला यूहीं चलता रहा।

आज संकेत ने श्रुति से मिलने का वादा किया था, पर अंतिम समय में कुछ काम आ जाने से संकेत को देर हो गई थी और उसकी ट्रेन छूट गई थी, संकेत श्रुति को इंतजार नहीं करना चाहता था, उसने अपने दोस्त से बाइक मांग ली और तेज रफ्तार से श्रुति से मिलने के लिए निकल पड़ा।

काफी देर से श्रुति मेट्रो स्टेशन पर संकेत का इंतजार कर रही थी, जब काफी देर हो गई और घर जाने का समय हो गया तो उसने संकेत को फोन किया पर उसका फोन स्वीच आफ जा रहा था। अगली सुबह श्रुति को एक नामी अस्पताल से फोन आया कि किसी व्यक्ति ने आपकी आंखों के आपरेशन के लिए पैसे और अपनी आंखें दान की हैं। बहुत पूछने पर भी उस व्यक्ति का नाम और पता नहीं पता चल सका। श्रुति ने यह खुशी शेयर करने के लिए संकेत को फोन किया पर उसका फोन अभी भी स्वीच आफ था।

श्रुति को कुछ चिंता हुई पर उसने सोचा कि अाखों का आपरेशन कराकर वह संकेत को सरप्राइज देगी और सबसे पहले संकेत को देखेगी। श्रुति की आखों का आपरेशन सफल रहा। उसने अपनी सहेली से संकेत को फोन करने को कहा पर उसका फोन अभी भी बंद था। श्रुति के पास संकेत के रूम पार्टनर सुमित का नंबर भी था, जब उससे संपर्क किया गया तो उसने बस इतना कहा कि वो शाम को अस्पताल आएगा।

शाम को सुमित जब अस्पताल पहुंचा तो संकेत साथ नहीं था। श्रुति के बार बार पूछने पर वह बस इतना कह सका कि संकेत कहीं बिना बताए चला गया है, इसके आगे वह कुछ कह नहीं सका उसका गला रूंध गया और उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह वहां से चला गया और जाते जाते श्रुति के हाथों में एक पत्र थमा गया। श्रुति किसी अनहोनी की आशंका से सिहर उठी।

श्रुति ने कांपते हाथों से पत्र को खोला और पढना शुरू किया, पत्र अस्पष्ट राइटिंग और जल्दबाजी में लिखा था, इस पत्र में लिखा था कि जब तुम इस पत्र को नहीं पढ़ रही होगी तो शायद मैं तुम्हारे पास नहीं होऊंगा, पर यकीन मानों मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं और तुम्हारी आँखों से सब कुछ देख रहा हूँ। पत्र के अंत में लिखा था – अपना और मेरी आंखों का ख्याल रखना, तुम्हारा – संकेत।

कुछ समय पश्चात श्रुति को सच पता चला । संकेत की बाइक को उस रात किसी तेज रफ्तार कार ने टक्कर मार दी थी। संकेत को गंभीर अवस्था में उसी अस्पताल में लाया गया था। जब संकेत को अस्पताल लाया गया तब उसकी चेतना पूरी तरह लुप्त नहीं हुई थी। शायद संकेत को यह अहसास हो गया था कि उसका अंतिम समय नजदीक है। इसलिए उसने सुमित के माध्यम से अस्पताल प्रसाशन के सामने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त कर दी थी।

संकेत जाते-जाते भी अपना वादा निभा गया था। उसने श्रुति की अंधेरी दुनिया को रोशनी दे दी थी,वह हमेशा के लिए श्रुति की आंखों में बस गया था।

चित्र स्रोत- गूगल इमेज

साभार- http://awgpskj.blogspot.com/

गलतफ़हमी

आज इतवार का दिन था। दूसरे कमरे में पड़े फ़ोन की घंटी बजती ही जा रही थी। राजीव ने फ़ोन उठाया। दूसरी तरफ से आवाज आयी। हेलो बेटा, बहुत दिनों से तुम्हे मिले नहीं सो हम दोनों ११ बजे की गाड़ी से आ रहे है। दोपहर का खाना साथ में खा कर हम ४ बजे की गाड़ी वापिस लौट जायेंगे। ठीक है। हाँ पापा, मैं स्टेशन पर आपको लेने आ जाऊंगा।

फोन रख कर वापिस कमरे में आ कर राजीव ने नेहा को बताया कि मम्मी पापा ११ बजे की गाड़ी से आरहे है और दोपहर का खाना हमारे साथ ही खायेंगे।

यह सुनकर नेहा का पारा एक दम सातवें आसमान पर चढ़ गया। कोई इतवार को भी सोने नहीं देता, अब सबके के लिए खाना बनाओ। पूरी नौकरानी बना दिया है। वह गुस्से से उठी और बाथरूम में घुस गयी। राजीव हक्का बक्का होकर उसे देखता ही रह गया।

नेहा गुस्से में बड़बड़ाते हुए खाना बना रही थी। दाल सब्जी में नमक, मसाले ठीक है या नहीं इसकी परवाह किए बिना बस करछी चलाये जा रही थी। कच्चा पक्का खाना बना बेमन से परांठे सेंकने लगी कोई कच्चा तो कोई जला हुआ। आखिर उसने सब कुछ किसी तरह से ख़त्म किया।

वह तैयार हो सोफे पर बैठ मैगज़ीन के पन्ने पलटने लगी।उसके मन में तो बस यह चल रहा था कि सारा संडे खराब कर दिया। बस अब तो आएँ, खाएँ और वापिस जाएँ।

थोड़ी देर में घर की घंटी बजी तो बड़े बेमन से उठी और दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उसकी आँखें हैरानी से फटी की फटी रह गयी और मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका।

सामने राजीव के नहीं उसके अपने मम्मी पापा खड़े थे जिन्हें राजीव स्टेशन से लाया था।

मां ने आगे बढ़ कर उसे झिंझोड़ा अरे, क्या हुआ। इतनी हैरान परेशान क्यों लग रही है। क्या राजीव ने बताया नहीं कि हम आ रहे हैं। जैसे मानो नेहा के नींद टूटी हो नहीं, मम्मी इन्होंने तो बताया था पर…। चलो आप अंदर तो आओ।

थोड़ी देर बाद पापा ने कहा नेहा, बातें ही करती रहोगी या कुछ फिर कुछ खिलाओगी भी। यह सुनकर नेहा को मानो साँप सूँघ गया हो। क्या करती, बेचारी को अपने हाथों ही से बनाए अध पक्के और जले हुए खाने को परोसना पड़ा। मम्मी पापा खाना तो खा रहे थे मगर उनकी आँखों में एक प्रश्न था जिसका वो जवाब ढूँढ रहे थे। आखिर इतना स्वादिष्ट खाना बनाने वाली उनकी बेटी आज उन्हें कैसा खाना खिला रही है।

नेहा बस मुँह नीचे किए बैठी खाना खा रही थी। मम्मी पापा से आँख मिलाने की उसकी हिम्मत नहीं हो पा रही थी। थोडी देर बाद राजीव कुछ काम से बाहर चला गया। राजीव के जाते ही मम्मी, जो बहुत देर से चुप बैठी थी बोल पड़ी “क्या राजीव ने सच में बताया नहीं था कि हम आ रहे हैं ”

अचानक नेहा के मुँह से निकल गया उसने सिर्फ यह कहा था कि मम्मी पापा लंच पर आ रहे हैं, मैं समझी उसके मम्मी पापा आ रहे हैं।

फिर क्या था नेहा की मम्मी को समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या है। दुखी मन से उन्होंने नेहा को समझाया बेटी, हम हों या उसके मम्मी पापा तुम्हे तो बराबर का सम्मान करना चाहिए। मम्मी पापा क्या, कोई भी घर आए तो खुशी खुशी अपनी हैसियत के मुताबिक उसकी सेवा करो। बेटी, जितना किसी को सम्मान दोगी उतना तुम्हे ही प्यार और इज़्ज़त मिलेगी। रिश्ता कोई भी हो, हमारा या उसका, कभी फर्क नहीं करना चाहिये।

नेहा के मम्मी पापा को स्टेशन छोडकर राजीव घर वापस आ चुके थे।वातावरण में अजीब सी खमोशी थी। थोडी बाद नेहा चाय लेकर आयी राजीव ने देखा उसकी की आँखों में ऑंसू हैं उन्होनें पूछा नेहा क्या बात है ?उत्तर में नेहा ने बस इतना ही कहा कि मैं आज बहुत शर्मिंदा हूं,मुझे माफ कर दो, आज के बाद फिर ऐसा कभी नहीं होगा.! राजीव ने उसे गले से लगा लिया वह समझ गये थे कि नेहा को आज जिंदगी का बहुत बडा सबक मिल चुका है।

चित्र स्रोत- गूगल इमेज

साभार-All World Gayatri Pariwar

राम का घर कहां है?

बहुत समय पहले एक व्यक्ति ने संसार से विरक्त होकर सन्यासी बनने का निश्चय किया। वह घर से दूर एक जंगल में जाकर तपस्या करने लगा। कुछ वर्ष बाद उसने अनुभव किया कि उसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है भले ही वह दुनिया से दूर चला आया है लेकिन संसार उसके मन में अभी भी बसता है। 


कुछ दिन बाद वह व्यक्ति जंगल छोड़कर एक उंचे दुर्गम पहाड़ पर पहुंच गया और एक गुफा में रहकर पहले की अपेक्षा और अधिक कठिन तप करने लगा। बहुत समय बीत गया पर वह मन को काबू करने में सफल नहीं हुआ उसका मन रह- रह कर संसार और उसके आकर्षणों की तरफ भागता था। अंत में वह व्यक्ति बहुत निराश होकर और सन्यास को मिथ्या मानकर अपने घर वापस लौट आया और पहले जैसा जीवन जीने लगा।

एक दिन घूमते-फिरते वह एक दुकान पर गया, दुकान मे अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे, उस व्यक्ति के मन में जिज्ञासा उतपन्न हुई, एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए दुकानदार से पूछा, इसमे क्या है? 

दुकानदारने कहा – इसमे नमक है ! उसने ने फिर पूछा, इसके पास वाले मे क्या है? दुकानदार ने कहा, इसमे हल्दी है! इसी प्रकार वह व्यक्ति पूछ्ते गया और दुकानदार बतलाता रहा, अंत मे पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया,  उसने पूछा उस अंतिम डिब्बे मे क्या है? दुकानदार बोला, उसमे राम-राम है! 

उस व्यक्ति ने हैरान होते हुये पूछा राम राम? भला यह राम-राम किस वस्तु का नाम है भाई? मैंने तो इस नाम के किसी समान के बारे में कभी नहीं सुना। दुकानदार उस व्यक्ति के भोलेपन पर हंस कर बोला – महराज! और डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं, पर यह डिब्बा खाली है, हम खाली को खाली नही कहकर राम-राम कहते हैं! उस व्यक्ति की आंखें खुली की खुली रह गई !

जिस बात के लिये मैं दर दर भटक रहा था, वो बात मुझे आज एक व्यपारी से समझ आ रही है। वो व्यक्ति उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों में गिर पड़ा, और बोला,ओह, तो खाली मे राम रहता है।

सत्य है भाई भरे हुए में राम को स्थान कहाँ? काम, क्रोध,लोभ,मोह, लालच, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष और भली- बुरी, सुख दुख, की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा? राम यानी ईश्वर तो खाली यानि साफ-सुथरे मन मे ही निवास करता है।

एक छोटी सी दुकान वाले ने उस व्यक्ति को बहुत बड़ी बात समझा दी थी! आज उसे सन्यास का मतलब समझ आ गया था। जिस चीज़ को इतने सालों से जंगलों और पहाड़ों पर ढूंढ़ रहा था वह चीज़ आज उसे भरे बाजार में एक छोटी सी दुकान पर उपलब्ध हो गई थी। वह समझ गया था कि सच्चे सन्यास के लिए उसे घर छोड़कर कहीं भी भटकने की आवश्यकता नहीं है।

साभार: http://awgpskj.blogspot.com/?m=1