वर्तमान का महत्व

एक मजदूर पहाड़ पर बैठा पत्थर काट रहा था उसने सोचा भला यह भी कोई जिंदगी है। दिन भर पत्थर तोड़ते रहना और बदले में मामूली सी मजदूरी मिल जाना। उसने अधिक अच्छी स्थिति में पहुंचने, अधिक समर्थ बनने की सोची। उसने सुन रखा था की पर्वत पर एक ऐसी देवी रहती है, जो सबकी मनोकामनाएं पूरी कर देती है। मजदूर ने विचार किया कि उसी से वरदान मांग कर समर्थ बनना चाहिए थोड़ी देर सोच- विचार करने के बाद उसके सामने यह समस्या पैदा हुई कि देवी से क्या वरदान मांगा जाए और क्या बना जाए?

 मजदूर के मन में आया राजा बड़ा होता है इसलिए मुझे देवी से राजा बनने का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। थोड़ी देर बाद मन में कल्पना उठी कि राजा का राज्य छोटा होता है, सूर्य का विस्तार अधिक और यश सर्वव्यापी है इसलिए सूर्य बनना ठीक रहेगा। पर दूसरे ही क्षण में विचार आया कि सूर्य को तो बादल ही अपने आंचल में छुपा लेते हैं इस तरह बादल बड़े हुए जब बड़ा बनना ही है तो सबसे बड़ा क्यों ना बना जाए यह सोचकर उसने बादल बनना अधिक उत्तम समझा। पूरी तरह अभी वह निश्चय कर भी नहीं पाया था कि उसे एक नई युक्ति सूझी कि पवन अधिक बलवान होता है वह बादलों को साथ उड़ा ले जाता है इसलिए पवन बनना ठीक रहेगा।

कुछ देर बाद उसे लगने लगा पवन से अधिक शक्तिशाली तो पर्वत होते हैं जो अपनी ऊंचाई और मजबूती से हवा की गति को भी रोक देते हैं ऐसी स्थिति में पर्वत बनना अधिक बड़प्पन का चिन्ह है वह इतना सोच ही रहा था कि उसके मन में विचार कौंधा कि पर्वत को तो एक मजदूर काट कर धराशाई कर देता है। फिर मजदूर रहना ही क्या कम बड़प्पन की बात है। वर्तमान स्थिति को छोड़कर और कुछ अव्यावहारिक बनने की कामना में मैं अपना समय और सामर्थ्य को क्यों बर्बाद करूं?

देवी से वरदान मांगने के लिए जाते समय मजदूर के मन में अनेक विचार उठ रहे थे। वह सोच रहा था कि मुझे अधिक से अधिक ऊंचा उठने के लिए देवी से क्या वरदान मांगना चाहिए? उसके मन में अनेक विचार उठते गिरते रहे अंत में उसे यही विचार उपयुक्त लगा कि आज जो अपनी स्थिति है उसे कम महत्त्व का न समझा जाए, उसी को अधिक परिष्कृत और श्रेष्ठ बनाने का प्रयास किया जाए। इस निर्णय के बाद वह देवी के मंदिर से अनुपयुक्त इच्छाओं का परित्याग करके वापस लौट पड़ा और मनोयोग पूर्वक अपने पत्थर काटने के काम में नये उत्साह के साथ जुट गया।

हम में से अधिकांश व्यक्ति ऐसे ही होते हैं जो वर्तमान का महत्व नहीं समझते उपलब्ध परिस्थितियों का सदुपयोग नहीं कर पाते हैं और जो उपलब्ध नहीं है उसकी कामना करते रहते हैं।ऐसा करने से हमें कुछ हासिल नहीं होता बल्कि हम गवाते ही अधिक हैं, जीने का आनंद और लाभ तब है जब हम वर्तमान में जिएं।

भविष्य में क्या होगा या कोई नहीं जानता। प्रयत्न करने पर परिस्थितियां मनचाही बन जाएंगी इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। चाहना ही सब कुछ नहीं होता है, परिस्थितियां कहीं से कहीं मोड़ ले सकती हैं और जैसा सोचा गया था उससे बिल्कुल अलग प्रकार का जीवन जीना पड़ सकता है। सोचना एक बात है और पाना दूसरी बात है। ऐसी स्थिति में जो वास्तविकता नहीं है उसकी कल्पना करके जीते रहने से किसी को क्या हासिल हो सकता है?

महत्व वर्तमान का ही है। बीते हुए कल के अनुभवों का बस इतना ही फायदा है कि जो सीखा गया है उससे वर्तमान को और बेहतर बनाया जाए। भविष्य की चिंता की उपयोगिता बस इतनी ही है कि उसके आधार पर वर्तमान की गतिविधियों को सही दिशा में लगाया जाए। जो वर्तमान को नहीं सुधारते और कुछ बड़ा करने की कल्पना करते रहते हैं उनके हाथ से समय निकल जाता है वे जीवन पर्यंत भटकते रहते हैं और उन्हें अंत में पश्चाताप की अग्नि में जलना पड़ता है।

खुशी

एक अमीर महिला प्रतिदिन मनोचिकित्सक के पास जाती थी, उसे अपना जीवन अधूरा सा लगता था, वह हर रोज उनसे कहती थी कि उसे लगता है कि उसका जीवन बेकार है और उसका कोई मतलब नहीं है। वह डाक्टर से कहती थी कि वह चाहती है कि वो खुशियाँ ढूँढने में उसकी मदद करें।

शुरूआत में डाक्टर ने उसे कुछ दवांए दीं और मेडिटेशन का सुझाव दिया पर इसका असर न होते देख उन्होनें उसकी कांउसलिंग कराने का निश्चय किया। उन्होनें एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो उनके क्लीनिक पर पर्चा बनाने का काम करती थी ।

डाक्टर ने उस अमीर औरत से कहा – “मैनें इन्हें यहां यह बताने के लिए बुलाया है कि कैसे इन्होनें अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढ़ी। मैं चाहता हूँ कि आप इनकी बातों को ध्यान से सुनिये।”

वह बूढ़ी औरत कह रही थी- “मैनें अपने पति को बहुत कम समय में ही किसी अज्ञात बीमारी के कारण खो दिया था और उसके कुछ महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसे में मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी, खा नहीं पाती थी, मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था। “

“मैं अपना जीवन समाप्त करने की तरकीबें सोचने लगी थी। तभी एक दिन,जब मैं काम से घर वापस आ रही थी तब एक छोटा कुत्ते का बच्चा मेरे पीछे लग गया । बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को घर के अंदर आने दिया। उस कुत्ते के बच्चे के लिए मैनें थोड़े से दूध का इंतजाम किया ,वह भूखा था, उसनें तुरंत सारा दूध पी लिया फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और उनको चाटने लगा।”

उस दिन मैं बहुत समय बाद मुस्कुराई थी । तब मैंने सोचा अगर इस कुत्ते के बच्चे की सहायता करना मुझे इतनी खुशी दे सकता है, तो हो सकता है कि दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी खुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैनें अस्पताल में जाकर बीमार और असहाय लोगों को कुछ फल बांटे। मुझे ऐसा करके बहुत अच्छा महसूस हुआ।

इसके बाद मैं अक्सर कुछ ऐसा करने की कोशिश करती थी जिससे दूसरों को खुुशी मिले और उन्हें खुश देख कर मुझे खुुशी मिलती थी। आज, मैं खुशी से जिंदगी जी रही हूं, मैं अच्छा खाती-पीती हूं और चैन से सोती हूं। मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं, दूसरों को खुुशी देकर।

उस बूढ़ी औरत की बात सुनकर वह अमीर महिला रोने लगी। उसके पास वह सब-कुछ था जो वह पैसे से खरीद सकती थी पर उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती है।

हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हमारे पास क्या है और हम कितने खुश हैं बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं। उस अमीर महिला की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे उसे आज वह मिल गया था जिसकी तालाश उसे न जाने कब से थी।

साभार : http://awgpskj.blogspot.com/?m=1

गृह प्रवेश

सुधीर का पुणे से दिल्ली तबादला बहुत शार्ट नोटिस पर हुआ था। सुधीर और उसकी पत्नी सुनीता के लिए यह तबादला किसी सर दर्द से कम नहीं था। बच्चों का बड़ी मुश्किल से मिड टर्म में एडमिशन हुआ था। सुनीता की जॉब छूट गई थी। नई जगह पर गृहस्थी को नए सिरे से बसाने की चुनौती थी।


सुधीर ऑफिस के कामों में व्यस्त रहने लगे थे और बच्चे स्कूल चले जाते थे पर सुनीता का मन अभी भी उचाट था उसकी स्थिति मानो एक ऐसे पेड़ की तरह हो गई थी जिसे जड़ से उखाड़कर दूसरी जगह रोपा गया था और वह नई मिट्टी को पकड़ नहीं पा रहा था।

आते जाते सुनीता एक बात को कई दिनों से नोटिस कर रही थी की एक बुढ़िया उसके घर के सामने पेड़ की ओट में खड़े खड़े उसके घर को ताकती रहती है शुरुआत में तो सुनीता ने इस बात को इग्नोर किया पर जब आए दिन वह बुढ़िया को उस पेड़ के नीचे अपने घर की ओर टकटकी लगाए हुए देखती तो उसके मन में तरह-तरह की शंकाएं जन्म लेने लगीं।

एक दिन सुबह सुनीता ने छत से देखा सोसाइटी का वॉचमैन एक बुढ़िया के साथ मेन गेट पर खड़ा हुआ था। सुधीर उससे कुछ बात कर रहे थे पास से देखने पर उस बुढ़िया की सूरत कुछ जानी पहचानी सी लगी। थोड़ी देर बाद जब सुधीर अंदर आए  तो सुनीता कहने लगी कि यह तो वही बुढ़िया है जिसके बारे में मैंने आपको बताया था पर यह यहां क्यों आई है? सुनीता चिंतित होकर कहा।

सुधीर ने उत्तर दिया बताऊंगा तो आश्चर्यचकित रह जाओगी जैसा तुम उनके बारे में सोचती हो वैसा कुछ भी नहीं है जानती हो वह कौन हैं? सुनीता विस्मित होकर सुधीर की ओर ताक रही थी।

सुधीर कहने लगे इनका नाम मालती देवी है  यह इस घर की पुरानी मालकिन और मिस्टर दीपक की मां है जिनसे हमने यह घर खरीदा है। यह उन्हीं मिस्टर दीपक कि अभागी मां है जिन्होंने पहले धोखे से इनसे सब कुछ अपने नाम करा लिया और फिर बाद में यह घर हमें बेच कर इन्हें वृद्धा आश्रम में छोड़ दिया और खुद विदेश में रहने चले गए।

सुनीता को सहसा सुधीर की बात पर विश्वास ही नहीं हुआ थोड़ी देर बाद खुद को संभालते हुए उसने सुधीर से पूछा कि ये यहां अब क्या करने आई हैं? क्या यह घर वापस लेने आई है पर हमने तो इसे पूरी कीमत देकर खरीदा है, सुनीता ने चिंतित स्वर में कहा।

नहीं नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है दरअसल आज इनके पति की बरसी है यह उस ऊपर वाले कमरे में जा कर दिया जलाना चाहती हैं जहां उन्होंने अंतिम सांस ली थी सुधीर ने कहा।

सुनीता ने कहा मुझे इन बातों पर विश्वास नहीं है सुधीर बोले तुम्हें विश्वास नहीं है तो क्या हुआ उन्हें तो है, यदि हमारे छोटे से प्रयास से उनके दिल को शांति मिलती है तो उसमें हमारा क्या घटता है। अनमने मन से ही सही सुनीता ने उन्हें घर में आने की अनुमति दे दी।

मालती देवी अंदर आ गई दुर्बल काया फटी हुई धोती आंखों में कुछ जमे, कुछ पिघले हुए आंसुओं को लेकर वह अंदर आ गईं और उन्होंने सुधीर और सुनीता को ढेर सारी दुआएं दी।

आँखें भर भर के वह उस घर को देख रही थी जो कभी उनका अपना था आंखों में कितनी स्मृतियां कितने सुख, कितने दुख एक साथ तैर रहे थे, फिर वह ऊपर वाले कमरे में गई कुछ देर आंखें बंद करके बैठी रही उनकी बंद आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे फिर उन्होंने दिया जलाया प्रार्थना की और वापस दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहने लगी मैं इस घर में दुल्हन बन कर आई थी सोचा था अर्थी पर ही जाऊंगी मगर…. उनका गला भर आया।

सुधीर और सुनीता निशब्द बैठे रहे थोड़ी देर बाद उनसे बातें कर मालती देवी भारी कदमों से उठने लगी और चलने लगी पर उनके पैर तो जैसे ही इस घर की चौखट को छोड़ने को तैयार ही थे पर जाना तो था उनकी इस हालत को वह दोनों भी महसूस कर रहे थे।

आप जरा बैठी है मैं अभी आती हूं सुनीता मालती देवी को रोककर कमरे से बाहर चली गई और सुधीर को भी बाहर बुला लिया और कहने लगी कि सुनिए मुझे एक अच्छा आईडिया आया है जिससे हमारी लाइफ सुधर जाएगी और इनके टूटे दिल को भी आराम मिल जाएगा।

सुनीता ने कहा क्यों ना हम इन्हें यहीं रख ले यह अकेली है, बुजुर्ग हैं और इस घर में इनकी जान बसती है। यहां से कहीं जाएंगी भी नहीं और हम इन्हें वृद्धा आश्रम से अच्छा खाने पहनने को देंगे और अगर यह घर पर रहेंगे तो मैं भी आराम से नौकरी पर जा सकूंगी मुझे भी पीछे से घर की बच्चों की चिंता नहीं रहेगी। 

सुधीर ने कहा आइडिया तो अच्छा है पर क्या यह मान जाएगीं और कहीं मालकिन बन कर घर पर अपना हक जमाने लगी तो क्या करेंगे? सुनीता बोली और क्या करेंगे वृद्धा आश्रम में वापस छोड़ आएंगे, घर तो हमारे नाम से ही यह बुढ़िया कर ही कह सकती है? ठीक है, तुम बात करके देखो,सुधीर ने सहमति जताई।

सुनीता ने संभलकर बोलना शुरू किया, देखिए अगर आप चाहे तो यहां रह सकती हैं। मालती देवी की आंखें इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से चमक उठीं। क्या वाक़ई वो इस घर में रह सकती हैं, लेकिन फिर बुझ गईं। वो सोचने लगीं आज के ज़माने में जहां सगे बेटे ने ही उन्हें घर से यह कहते हुए बेदख़ल कर दिया कि अकेले बड़े घर में रहने से अच्छा उनके लिए वृद्धाश्रम में रहना होगा,वहां ये पराये लोग उसे बिना किसी स्वार्थ के क्यों रखेंगे?

मालती देवी ने कहा नहीं नहीं आपको बेकार में ही बहुत परेशानी होगी।परेशानी कैसी, इतना बड़ा घर है और आपके रहने से हमें भी आराम हो जाएगा, सुनीता ने उत्तर दिया।

हालांकि दुनियादारी के कटु अनुभवों से गुज़र चुकी मालती देवी सुनीता की आंखों में छिपी मंशा समझ गईं, मगर उस घर में रहने के मोह में वो मना न कर सकीं।

मालती देवी उनके साथ रहने आ गईं और आते ही उनके सधे हुए अनुभवी हाथों ने घर की ज़िम्मेदारी बख़ूबी संभाल ली।

सभी उन्हें  अम्मा कहकर ही बुलाते. हर काम उनकी निगरानी में सुचारु रूप से चलने लगा,घर की ज़िम्मेदारी से बेफ़िक्र होकर सुनीता  ने भी नौकरी ज्वॉइन कर ली. सालभर कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला।

बच्चे अम्मा से बेहद घुल-मिल गए थे। उनकी कहानियों के लालच में कभी देर तक टीवी से चिपके रहनेवाले बच्चे उनकी हर बात मानने लगे। समय से खाना-पीना और होमवर्क निपटाकर बिस्तर में पहुंच जाते। अम्मा अपनी कहानियों से बच्चों में एक ओर जहां अच्छे संस्कार डाल रही थीं, वहीं हर वक्त टीवी देखने की बुरी आदत से भी दूर ले जा रही थीं।

सुनीता और सुधीर बच्चों में आए सुखद परिवर्तन को देखकर अभिभूत थे, क्योंकि उन दोनों के पास तो कभी बच्चों के पास बैठ बातें करने का भी समय नहीं होता था।

आज सुनीता का जन्मदिन था। सुधीर और सुनीता ने ऑफ़िस से थोड़ा जल्दी निकलकर बाहर डिनर करने का प्लान बनाया था। सोचा था, बच्चों को अम्मा संभाल लेंगी, मगर घर में घुसते ही दोनों हैरान रह गए. बच्चों ने घर को गुब्बारों और झालरों से सजाया हुआ था।

इस सरप्राइज़ बर्थडे पार्टी, बच्चों के उत्साह और अम्मा की मेहनत से सुनीता अभिभूत हो उठी और उसकी आंखें भर आईं। इस तरह के वीआईपी ट्रीटमेंट की उसे आदत नहीं थी और इससे पहले बच्चों ने कभी उसके लिए ऐसा कुछ ख़ास किया भी नहीं था।

सुनीता की आंखों में अम्मा के लिए इज्जत बढ़ गई थी। बच्चों से ऐसा सुख तो उसे पहली बार ही मिला था,केक कटने के बाद मालती देवी ने अपने पल्लू में बंधी लाल रुमाल में लिपटी एक चीज़ निकाली और सुनीता की ओर बढ़ा दी।

“ये क्या है अम्मा?”

“तुम्हारे जन्मदिन का उपहार.”

सुनीता ने खोलकर देखा तो रुमाल में सोने की चेन थी।

वो चौंक पड़ी, “ये तो सोने की मालूम होती है।”

“हां बेटी, सोने की ही है. बहुत मन था कि तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें कोई तोहफ़ा दूं। कुछ और तो नहीं है मेरे पास, बस यही एक चेन है, जिसे संभालकर रखा था।मैं अब इसका क्या करूंगी, तुम पहनना, तुम पर बहुत अच्छी लगेगी।”

सुनीता की अंतरात्मा उसे कचोटने लगी. जिसे उसने लाचार बुढ़िया समझकर स्वार्थ से तत्पर हो अपने यहां आश्रय दिया, उनका इतना बड़ा दिल कि अपने पास बचे इकलौते आभूषण को भी वह उसे सहज ही दे रही है।

“नहीं, नहीं अम्मा, मैं इसे नहीं ले सकती।”

ले ले बेटी, एक मां का आशीर्वाद समझकर रख लो,मेरी तो उम्र भी हो चली है। क्या पता तेरे अगले जन्मदिन पर तुझे कुछ देने के लिए मैं रहूं भी या नहीं।

“नहीं अम्मा, ऐसा मत कहिए. ईश्वर आपका साया हमारे सिर पर सदा बनाए रखे.” कहकर सुनीता उनसे ऐसे लिपट गई, जैसे बरसों बाद कोई बिछड़ी बेटी अपनी मां से मिल रही हो.

वो जन्मदिन सुनीता कभी नहीं भूली, क्योंकि उसे उस दिन एक बेशक़ीमती उपहार मिला था, जिसकी क़ीमत कुछ लोग बिल्कुल नहीं समझते और वो है नि:स्वार्थ मानवीय भावनाओं से भरा मां का प्यार। 

वो जन्मदिन मालती देवी भी नहीं भूलीं, क्योंकि उस दिन उनका उस घर में पुन: गृह प्रवेश हुआ था। जिसकी गवाही उस घर के बाहर लगाई गई वो पुरानी नेमप्लेट भी दे रही थी, जिस पर लिखा था ‘मालती निवास’।

साभार : https://awgpskj.blogspot.com

डिसाइडोफोबिया

निर्णय लेने से कोई बच नहीं सकता। जब तक सांसें चलेगी फैसले लेने होंगे। निर्णय या डिसिजन जिदंगी के आधार हैं। हम आज जो भी हैं अपने बीते हुए कल में लिए गए फैसलों के कारण ही हैं। हम कल क्या होगें इसका फैसला हमारे आज के लिये हुए निर्णय करेंगे। निश्चित रूप से किसी के सभी निर्णय हमेशा न तो सही और न ही हमेशा गलत हो सकते हैं। हर इन्सान के जीवन में कुछ सही तो कुछ गलत निर्णय होते है। आपका कोई निर्णय सही होगा या गलत इसका निर्धारण सिर्फ और सिर्फ समय करता है।

अक्सर हमें आज जो सही लगता है वो भविष्य में गलत साबित होता है और जो गलत लगता है वो ही सही साबित हो जाता है। जब निर्णय सही साबित हो जाता है तो तारीफ और जब गलत हो जाता है तो आलोचना के साथ गलत होने की जिम्मेदारी भी लेनी पड़ती है।

जब भी इन्सान कोई निर्णय लेता है तो वह यह सोच के नहीं लेता कि यह गलत साबित होगा। दरअसल निर्णय आज की परिस्थितियों में लिए जाते हैं जबकि कल की बदली हुई परिस्थितियां उन्हें सही या गलत साबित करती हैं। कल किसने देखा है? किसी ने नहीं पर इंसान की फितरत होती है अनुमान लगाने की और इसी आधार पर निर्णय लिए जाते हैं।

आप कितनी सटीकता से भविष्य का अनुमान लगा सकते हैं यह आपकी दूरदर्शिता को निर्धारित करता है और आपकी दूरदर्शिता निर्धारित करती है आपके निर्णय के सफल या असफल होने की संभावना को। अनुमान तो कोई भी लगा सकता है पर अनुभव के साथ अनुमान लगाने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है उच्च पदों पर अनुभवी लोगों की नियुक्ति की जाती है जो कपंनी के लिए निर्णय लेते हैं। दूसरे शब्दों में आपकी कंपनी के CEO और आपमें बस इतना फर्क होता है कि वो आपकी तुलना में ज्यादा बेहतर अनुमान लगा सकते हैं।

अपनी जिंदगी में सारे निर्णय हम खुद नहीं ले सकते हमारी जिंदगी के कुछ निर्णय दूसरे भी लेते हैं और हम अक्सर अपनी जिंदगी में सफलताओं के लिए अपने निर्णयों को और असफलताओं के लिए दूसरों के निर्णयों को जिम्मेदार ठहराते हैं।

कुछ लोग जल्दी निर्णय लेते हैं तो कुछ लोग जल्दबाजी में निर्णय लेते हैं। कुछ लोग निर्णय लेने में बहुत वक्त लेते हैं तो कुछ को निर्णय लेना दुनिया का सबसे मुश्किल काम लगता है। कुछ निर्णय लेना आसान तो कुछ निर्णय लेने मुश्किल होते हैं। कुछ भी हो पर किसी के लिए सारे निर्णय न तो सही और न ही गलत हो सकते हैं।

दरअसल हम जो भी निर्णय लेते हैं वो भविष्य के अनुमान पर निर्भर होते हैं। हमारे अनुमान जितने सही होगें हमारे निर्णयों के सही होने की संभावना उतनी अधिक होगी। यह भी सही है कि अनुभव अनुमान को बेहतर बनाते हैं जिससे सफलता की संभावना बढ़ जाती है। पर फिर भी सब कुछ अनुमान और संभावना पर निर्भर करता है।

प्रायिकता या Probability theory के अनुसार किसी भी घटना या event के होने या न होने की Probability न तो एक (one) और न ही शून्य (zero) हो सकती है। जिसका अर्थ यह हुआ कि किसी घटना के होने या न होने की संभावना को लेकर न तो पूरी तरह से आश्वस्त और न ही पूरी तरह से निराश हुआ जा सकता है। यही कारण है कि हमारे सारे निर्णय न तो हमेशा सही और न ही हमेशा गलत होते हैं।

दरअसल अनुमान कभी भी absolute नहीं हो सकते। इसलिए किसी घटना के होने या न होने की संभावना हमेशा शून्य और एक के बीच होती है। यही कारण है कि हमारे कुछ निर्णय सही और कुछ गलत होते हैं।

इसलिए जब लगे कि आपका या दूसरे का कोई निर्णय गलत साबित हुआ है तो इसका मतलब यह हुआ कि आपसे या दूसरों से महज अनुमान लगाने में चूक हुई है। अनुमान गलत होने का यह मतलब कतई नहीं कि आप अयोग्य या असफल हैं और हमेशा असफल होगें। अच्छा होगा कि घटनाओं से अनुभव लेकर अगली बार बेहतर अनुमान लगाइए क्या पता यही आपका सही निर्णय हो।