हर अधूरी तालाश का कोई मुकाम होना चाहिये

हर अधूरी तालाश का कोई मुकाम होना चाहिये,

हर गहरे दर्द का कोई ईनाम होना चाहिये,

मिल ही जाएगा वो कभी जिसको दिल है ढूंढ़ता,

इस शहर में कहीं उसका भी मकान होना चाहिये।

इस जम़ाने में हर किसी को मंजिलें मयस्सर कहां,

हर नाकाम पहल का भी कोई अंजाम होना चाहिये,

देखो क्या कह रही है बदलते मौसम की ठंडी हवा,

हद से गुज़र जाने पर मुश्किलें भी आसान होनी चाहिये।

बरसों से दिल में ख़ामोश जैसे कोई गहरा राज़ हो छिपा,

लफ्ज़ों से परे आखों की भी कोई ज़ुबान होनी चाहिये,

जहां हर दर्द को दवा मिले हर दुआ को मिले हौसला,

हर शहर में उम्मीद की कोई ऐसी दुकान होनी चाहिये।

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