शब्दों के घाव

आज के युग मे इंसान को क्रोध बहुत जल्दी आता है, गुस्सा एक तरह का मनोविकर है जिसका मुख्य कारण तनाव पूर्ण जीवनशैली है, क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो सबसे पहले खुद को जलती है कहते है क्रोध करने वाले इंसान को उसका क्रोध स्वय सज़ा देता है।

आज बहुत दिनो की बारिश के बाद आज मौसम साफ हुआ था पर समीर अपने कमरे मे उदास बैठा था उसकी आज ऑफीस मे फिर से किसी से किसी बात पर बहस हुई थी उसका मन गुस्से से भरा हुआ था, यू तो समीर एक होशियार और मेहनती कर्मचारी था पर उसके भीतर एक ही कमी थी कि उसे क्रोध बहुत जल्दी आता था।

छोटी छोटी बातों में अपना टेम्पर लूज कर देना समीर का स्वभाव बन गया था, अपनी इस आदत से स्वयं समीर भी परेशान था और इस आदत से छुटकारा पाना चाहता था पर यह सब इतनी तेजी से होता था कि वो कुछ भी सोच समझ नहीं पाता था उसने बहुत कुछ सीखा था पर क्रोध पर नियंत्रण करना वो नहीं सीख पाया था।

बहुत प्रयास करने के बाद भी जब उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ तो उसने अपने मित्र अनुराग से मदद माँगी, अनुराग समीर को लेकर मठ मे अपने गुरुजी के पास गया समीर ने गुरुजी से अपनी समस्या बतायी और सहयता करने की अपील की।

समीर की बात सुन कर गुरुजी मुस्कुराने लगे उन्होने समीर को कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना।

पहले दिन समीर ने छोटी छोटी बातों में दिनभर में बीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी, उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया और फिर एक दिन ऐसा आया समीर ने पूरे दिन में एक बार भी अपना टेम्पर लूज नहीं किया।

जब उसने अपने मित्र अनुराग को ये बात बताई तो वह उसे लेकर फिर आश्रम गया जहा समीर की बात सुनकर गुरुजी ने कहा आज से, अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो उस दिन इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना।

समीर ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब समीर ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने मित्र अनुराग को ख़ुशी से ये बात बतायी।

कुछ दिनों बाद गुरुजी अनुराग के साथ समीर के घर आये और उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो। अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था,जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं।

गुरुजी के जाने के बाद समीर फिर से बाड़े के पास गया और बाड़े में हुए छेदों पर हाथ फेरने लगा उसे यह महसूस हो रहा था कि मानों ये बाड़े के छेद न होकर लोगों के ह्दय थे जिन्हें उसने अपनी बातों से छलनी कर दिया था। उसकी आखों मे आसू आ गये थे .समीर ने मन ही मन गुरुजी को धन्यवाद दिया और निश्चय किया कि वो अब क्रोध करके इस बाड़े में और कील नहीं ठोकेंगा।

इसलिए अगली बार आप भी अपना टेम्पर लूज करने से पहले ज़रूर सोचियेगा कि क्या आप भी उस बाड़े में और कीलें ठोकना चाहते हैं ?

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