वो भी एक दौर था ये भी एक दौर है

वो भी एक दौर था,

ये भी एक दौर है,

कभी खुशियाँ बेशुमार थीं,

आज सन्नाटे का शोर है।

शह-मात के खेल में,

कहाँ कुछ हासिल हुआ,

कल मेरा वक्त पे जोर था,

आज वक्त का मुझपे जोर है।

आँखों में आँसू लिए,

कोई है मुझको देखता,

क्या मैं उसका गुनाहग़ार हूँ,

या फिर मुझसे जुड़ी उसकी डोर है।

नज़ारे भी बदल गए,

जब पलट कर चली हवा,

कल आँधियों का दौर था,

आज बारिशों का दौर है।

जो मेरा नसीब नहीं,

क्यों मैं हूँ उसको ढूंढ़ता,

क्या चाहतें बेशुमार हैं,

या फिर मेरी मँज़िलें कहीं और हैं।

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