वो बिना मंजिल के सफर पे था

वो बिना मंजिल के सफर पे था,

वो नाकाम होकर भी किसी की नज़र में था,

अनजानी सी ख्वाईशों से थी उसकी यारियां,

न जाने वो किसके असर में था।

बातों में उसकी थी दुनियादारी की कमी,

वो अपनी ही मौजों की लहर में था,

किसे सुनाता वो अपने चंद पन्नों के ग़म,

पता चला वो तो बुतों के शहर में था।

करता था वो उसकी हर बातों पर यकीं,

न जाने वो किस वहम में था,

कहने को तो छोड़ दिया था उसने भी उसे,

पर वो चेहरा आज भी उसके ज़हन में था।

खो गया था बिखेरकर खुशबू दिशाओं में सभी,

वो गुलाब जो कभी उसके चमन में था,

वो सोया ऐसे कि फिर सहर न हुई,

जिस्म लिपटा हुआ सफेद क़फन में था।

वो बिना मंजिल के सफर पे था

वो नाकाम होकर भी किसी की नज़र में था।

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