विचार ही आदत बन जाते हैं

हम आज जो भी हैं अपनी आदतों की वजह से हैं। आदतें ही वो हैं जो हमें बनाती हैं और मिटाती हैं। वक्त के साथ आदतें भी बदलती रहती हैं नई आती हैं और पुरानी जाती हैं वहीं कुछ आदतें एेसी भी होती हैं जो ताउम्र नहीं बदलती हैं। जो आदतें कभी नहीं बदलती वो हमारे सब कॉन्शस या अचेतन मन का हिस्सा बन जाती हैं और हमारे चीजों को देखने के नजरिये को प्रभावित करती हैं।

हमारा नजरिया और हमारी आदतें मिलकर हमारा स्वभाव बनाती हैं। हम देखते हैं कि एक परिस्थिति में दो अलग अलग स्वभाव के लोग अलग प्रतिक्रिया देते हैं इसका मतलब यह भी हुआ कि एक स्वभाव के लोग किसी एक परिस्थितियों में लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया देगें। यही कारण है कि बड़ी कंपनियों में समय-समय पर अलग अलग बैकग्राउंड के लोगों के लिए एक जैसी ट्रेनिंग आयोजित की जाती है इसके पीछे उद्देश्य होता है कि एक जैसी विभिन्न परिस्थितियों के आने पर सभी कर्मचारी विभिन्न परिस्थितियों में लगभग एक जैसी प्रतिक्रिया दें।

हमारा स्वभाव हमारी आदतों और हमारे नजरिए का मिश्रण होता है। आदतें नजरिए को प्रभावित करती हैं और आदतों को विचार प्रभावित करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि विचारों को बदलकर आदतों को, आदतों को बदलकर नजरिए को और नजरिए को बदलकर स्वभाव को बदला जा सकता है। यही कारण है कि हमें विचारों को सकारात्मक रखने को कहा जाता है क्योंकि सकारात्मक विचार पाजिटिव और नकारात्मक विचार निगेटिव स्वभाव के निर्माण में पूरी तरह से सक्षम हैं।

दूसरे शब्दों में मनुष्य अपने विचारों को बदलकर अपना कायाकल्प कर सकता है। इसे ही बिहेवियर की cognitive resonance थ्योरी कहते हैं.. इसका सार यही है कि कोई किसी के विचारों की फ्रिक्वेंसी को पकड़ कर उसके जैसा बन सकता है या विचारों की फ्रिक्वेंसी को मैच कराकर विभिन्न परिस्थितियों में एक जैसी प्रतिक्रिया प्राप्त की जा सकती है..।

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