वर्तमान का महत्व

एक मजदूर पहाड़ पर बैठा पत्थर काट रहा था उसने सोचा भला यह भी कोई जिंदगी है। दिन भर पत्थर तोड़ते रहना और बदले में मामूली सी मजदूरी मिल जाना। उसने अधिक अच्छी स्थिति में पहुंचने, अधिक समर्थ बनने की सोची। उसने सुन रखा था की पर्वत पर एक ऐसी देवी रहती है, जो सबकी मनोकामनाएं पूरी कर देती है। मजदूर ने विचार किया कि उसी से वरदान मांग कर समर्थ बनना चाहिए थोड़ी देर सोच- विचार करने के बाद उसके सामने यह समस्या पैदा हुई कि देवी से क्या वरदान मांगा जाए और क्या बना जाए?

 मजदूर के मन में आया राजा बड़ा होता है इसलिए मुझे देवी से राजा बनने का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। थोड़ी देर बाद मन में कल्पना उठी कि राजा का राज्य छोटा होता है, सूर्य का विस्तार अधिक और यश सर्वव्यापी है इसलिए सूर्य बनना ठीक रहेगा। पर दूसरे ही क्षण में विचार आया कि सूर्य को तो बादल ही अपने आंचल में छुपा लेते हैं इस तरह बादल बड़े हुए जब बड़ा बनना ही है तो सबसे बड़ा क्यों ना बना जाए यह सोचकर उसने बादल बनना अधिक उत्तम समझा। पूरी तरह अभी वह निश्चय कर भी नहीं पाया था कि उसे एक नई युक्ति सूझी कि पवन अधिक बलवान होता है वह बादलों को साथ उड़ा ले जाता है इसलिए पवन बनना ठीक रहेगा।

कुछ देर बाद उसे लगने लगा पवन से अधिक शक्तिशाली तो पर्वत होते हैं जो अपनी ऊंचाई और मजबूती से हवा की गति को भी रोक देते हैं ऐसी स्थिति में पर्वत बनना अधिक बड़प्पन का चिन्ह है वह इतना सोच ही रहा था कि उसके मन में विचार कौंधा कि पर्वत को तो एक मजदूर काट कर धराशाई कर देता है। फिर मजदूर रहना ही क्या कम बड़प्पन की बात है। वर्तमान स्थिति को छोड़कर और कुछ अव्यावहारिक बनने की कामना में मैं अपना समय और सामर्थ्य को क्यों बर्बाद करूं?

देवी से वरदान मांगने के लिए जाते समय मजदूर के मन में अनेक विचार उठ रहे थे। वह सोच रहा था कि मुझे अधिक से अधिक ऊंचा उठने के लिए देवी से क्या वरदान मांगना चाहिए? उसके मन में अनेक विचार उठते गिरते रहे अंत में उसे यही विचार उपयुक्त लगा कि आज जो अपनी स्थिति है उसे कम महत्त्व का न समझा जाए, उसी को अधिक परिष्कृत और श्रेष्ठ बनाने का प्रयास किया जाए। इस निर्णय के बाद वह देवी के मंदिर से अनुपयुक्त इच्छाओं का परित्याग करके वापस लौट पड़ा और मनोयोग पूर्वक अपने पत्थर काटने के काम में नये उत्साह के साथ जुट गया।

हम में से अधिकांश व्यक्ति ऐसे ही होते हैं जो वर्तमान का महत्व नहीं समझते उपलब्ध परिस्थितियों का सदुपयोग नहीं कर पाते हैं और जो उपलब्ध नहीं है उसकी कामना करते रहते हैं।ऐसा करने से हमें कुछ हासिल नहीं होता बल्कि हम गवाते ही अधिक हैं, जीने का आनंद और लाभ तब है जब हम वर्तमान में जिएं।

भविष्य में क्या होगा या कोई नहीं जानता। प्रयत्न करने पर परिस्थितियां मनचाही बन जाएंगी इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। चाहना ही सब कुछ नहीं होता है, परिस्थितियां कहीं से कहीं मोड़ ले सकती हैं और जैसा सोचा गया था उससे बिल्कुल अलग प्रकार का जीवन जीना पड़ सकता है। सोचना एक बात है और पाना दूसरी बात है। ऐसी स्थिति में जो वास्तविकता नहीं है उसकी कल्पना करके जीते रहने से किसी को क्या हासिल हो सकता है?

महत्व वर्तमान का ही है। बीते हुए कल के अनुभवों का बस इतना ही फायदा है कि जो सीखा गया है उससे वर्तमान को और बेहतर बनाया जाए। भविष्य की चिंता की उपयोगिता बस इतनी ही है कि उसके आधार पर वर्तमान की गतिविधियों को सही दिशा में लगाया जाए। जो वर्तमान को नहीं सुधारते और कुछ बड़ा करने की कल्पना करते रहते हैं उनके हाथ से समय निकल जाता है वे जीवन पर्यंत भटकते रहते हैं और उन्हें अंत में पश्चाताप की अग्नि में जलना पड़ता है।

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