रास्तों का मैं मुसाफिर हूँ…

रास्तों का मैं मुसाफिर हूँ,

मँज़िलो पे नहीं रूकता,

मँज़िले दग़ा किया करती हैं,

कभी रास्ता नहीं मुकरता।

ये जरूरी नहीं है,

हर बात की वजह हो,

कभी परछाई नहीं है दिखती,

कभी चाँद नहीं निकलता।

हद से गुज़रने की कीमत,

हर बार चुकानी पड़ती है,

सिर्फ़ दर्द सहने से,

नसीब नहीं बदलता।

बातों के भी इस दुनिया में,

होते हैं कई मतलब,

आईना बदलने से,

रकीब नहीं बदलता।

सपनों को जीने के लिए,

नासमझ होना पड़ता है,

समझदारों की दुनिया में,

कोई दिल की नहीं सुनता।

आम हो गई है,

जो ख़ास थी कहानी,

मन की रेत पर अब,

सिर्फ़ तेरा निशान नहीं मिलता…

© abhishek trehan

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