राम का घर कहां है?

बहुत समय पहले एक व्यक्ति ने संसार से विरक्त होकर सन्यासी बनने का निश्चय किया। वह घर से दूर एक जंगल में जाकर तपस्या करने लगा। कुछ वर्ष बाद उसने अनुभव किया कि उसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है भले ही वह दुनिया से दूर चला आया है लेकिन संसार उसके मन में अभी भी बसता है। 


कुछ दिन बाद वह व्यक्ति जंगल छोड़कर एक उंचे दुर्गम पहाड़ पर पहुंच गया और एक गुफा में रहकर पहले की अपेक्षा और अधिक कठिन तप करने लगा। बहुत समय बीत गया पर वह मन को काबू करने में सफल नहीं हुआ उसका मन रह- रह कर संसार और उसके आकर्षणों की तरफ भागता था। अंत में वह व्यक्ति बहुत निराश होकर और सन्यास को मिथ्या मानकर अपने घर वापस लौट आया और पहले जैसा जीवन जीने लगा।

एक दिन घूमते-फिरते वह एक दुकान पर गया, दुकान मे अनेक छोटे-बड़े डिब्बे थे, उस व्यक्ति के मन में जिज्ञासा उतपन्न हुई, एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए दुकानदार से पूछा, इसमे क्या है? 

दुकानदारने कहा – इसमे नमक है ! उसने ने फिर पूछा, इसके पास वाले मे क्या है? दुकानदार ने कहा, इसमे हल्दी है! इसी प्रकार वह व्यक्ति पूछ्ते गया और दुकानदार बतलाता रहा, अंत मे पीछे रखे डिब्बे का नंबर आया,  उसने पूछा उस अंतिम डिब्बे मे क्या है? दुकानदार बोला, उसमे राम-राम है! 

उस व्यक्ति ने हैरान होते हुये पूछा राम राम? भला यह राम-राम किस वस्तु का नाम है भाई? मैंने तो इस नाम के किसी समान के बारे में कभी नहीं सुना। दुकानदार उस व्यक्ति के भोलेपन पर हंस कर बोला – महराज! और डिब्बों मे तो भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं, पर यह डिब्बा खाली है, हम खाली को खाली नही कहकर राम-राम कहते हैं! उस व्यक्ति की आंखें खुली की खुली रह गई !

जिस बात के लिये मैं दर दर भटक रहा था, वो बात मुझे आज एक व्यपारी से समझ आ रही है। वो व्यक्ति उस छोटे से किराने के दुकानदार के चरणों में गिर पड़ा, और बोला,ओह, तो खाली मे राम रहता है।

सत्य है भाई भरे हुए में राम को स्थान कहाँ? काम, क्रोध,लोभ,मोह, लालच, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष और भली- बुरी, सुख दुख, की बातों से जब दिल-दिमाग भरा रहेगा तो उसमें ईश्वर का वास कैसे होगा? राम यानी ईश्वर तो खाली यानि साफ-सुथरे मन मे ही निवास करता है।

एक छोटी सी दुकान वाले ने उस व्यक्ति को बहुत बड़ी बात समझा दी थी! आज उसे सन्यास का मतलब समझ आ गया था। जिस चीज़ को इतने सालों से जंगलों और पहाड़ों पर ढूंढ़ रहा था वह चीज़ आज उसे भरे बाजार में एक छोटी सी दुकान पर उपलब्ध हो गई थी। वह समझ गया था कि सच्चे सन्यास के लिए उसे घर छोड़कर कहीं भी भटकने की आवश्यकता नहीं है।

साभार: http://awgpskj.blogspot.com/?m=1

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