ये हादसा भी होना था

नहीं पता था जिंदगी में,

ये हादसा भी होना था,

खुद को खोकर पाया था जिसको,

उसे पाकर फिर से खोना था।

शायद है रेखाओं का खेल यही,

जो नहीं लिखा था वो ही होना था,

वो मंजूर थी किसी की किस्मत को,

किसी और का उसको होना था।

जब टूटना ही फितरत है ख्वाबों की,

कोई सपना फिर क्यों संजोना था,

जिस रात की फिर न हो सहर,

उस नींद में फिर से सोना था।

समझ गया इश्क का अंजाम यही,

संग जिस्म तो है पर जान नहीं,

गँवाकर सब कुछ बेहोशी में,

अब होश को फिर से खोना था।

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