ये घर अब घर नहीं है…

ये घर अब घर नहीं है,

बस मकान है तुम्हारा,

वापस तुम मुझसे ले लो,

जो समान है तुम्हारा।

ख़ुद को खोकर भी तुझमें,

मुझे कहाँ तुम मिली हो,

शायद अब अलग-अलग हैं,

जो कभी मुकाम था हमारा।

रहते तो हम संग थे,

पर मिलते कभी नहीं थे,

कभी तुम गलत नहीं थे,

कभी हम सही नहीं थे।

जब-जब लगा तुम हो मेरी,

तुम हो गई पराई,

दूर मुझसे ऐसे हुई हो,

जैसे जिस्म से परछाई।

फिर एक वो दिन भी आया,

जब मुझे कर दिया पराया,

पल भर में बिखर गया वो,

जो कभी अरमान था हमारा।

अब रास्ते भी अलग हैं,

मँजिलें भी अब जुदा हैं

किस्मत ने भी लिखा था

शायद अंजाम यही हमारा…

Leave a Reply