यदि मैं तुम्हारी जगह पर होता

हमारे जानने वाली एक महिला इस बात से बेहद परेशान थी कि उनका चार साल का बेटा अक्सर दूसरों के यहाँ से कुछ भी जो उसे अच्छा लगता वो सामान घर उठा कर ले आता कभी दूसरे बच्चों के खिलौने उठा लाता तो कभी उनकी पेन्सिल या किताबें उठा लाता। उसकी इस आदत से परेशान वो उसको डांटती उस पर गुस्सा होती पर बच्चे के व्यवहार में कोई परिवर्तन न होते देख उन्होंने child psychologist से मदद मांगी उन्होंने उनसे खुद को बच्चे के स्थान पर रखकर सोचने की सलाह दी और समझाया कि बच्चों को अपनी और दूसरों की चीजों का अन्तर मालूम नहीं होता,इसलिए अच्छी लगने पर कोई भी चीज उठा लेना चाहे वो किसी और की क्यों न हो,इसमें उन्हें बुराई नजर नहीं आती।

बच्चों का मानना है कि दुनिया की हर चीज अपनी है जिसे वे जब चाहे ले सकते हैं हालांकि 6 वर्ष की उम्र तक आते आते वे अपनी और दूसरों की चीजों में अन्तर करना जान जाते हैं। उन्होंने उन महिला को समझाया कि जब भी बच्चा दूसरों की चीज उठाकर घर ले आए तो उन्हें बच्चे को डाटने की बजाय खुद को बच्चे की जगह रखकर सोचना चाहिए और उसे धैर्य के साथ समझाना चाहिए, उसे गलती का एहसास कराना चाहिए कि जो चीज वो अपनी समझ कर उठा लाया है वो उसकी नहीं है और उसे उस चीज को वापस करना होगा और जब वो वह चीज वापस कर दे तो उसकी तारीफ करनी चाहिए एेसा करने पर बच्चे में सुधार होगा और यह सुधार डर के कारण नहीं होगा।

यह मानव का स्वभाव है कि अक्सर हम निर्णय लेते वक्त भावनाओं में बह जाते हैं। यह emotions क्रोध, दया, sympathy,पूर्वाग्रह या prejudice हो सकते हैं। एेसे में हमारे निर्णय के गलत होने की संभावना बढ़ जाती है। पर खुद को भावनाओं या emotions से मुक्त रखना बड़ा ही मुश्किल काम है। मानव मन है ही एेसा जो भावनाओं और संवेदनाओं से भरा हुआ है और भावनाओं पर नियंत्रण रखना नामुमकिन नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर है।


अंग्रेजी में एक कहावत है When you take decision put yourself in another shoe.यानी निर्णय लेते वक्त खुद को दूसरे के स्थान पर रखना चाहिए। बड़ी ही practical बात है दूसरे व्यक्ति की मनोदशा समझने का इससे अच्छा तरीका हो ही नहीं सकता। जब हम खुद को दूसरे के स्थान पर रखते हैं तो दूसरे व्यक्ति की मनोदशा के साथ हमें उन परिस्थितियों को भी समझने में मदद मिलती है जिसके प्रभाव में व्यक्ति वर्तमान में में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। फिर जब हम दूसरे व्यक्ति के बारे में निर्णय लेते हैं तो उसके सही होने की संभावना बढ़ जाती है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि एेसा करने में या सोचने में हमें अपनी भावनाओं से मुक्त भी नहीं होना पड़ता है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि आपको को किसी की बात सुनकर गुस्सा आ गया है और बदले में आप भी क्रोध में आकर प्रतिक्रिया व्यक्त करने जा रहे हैं तो आपकी प्रतिक्रिया के सही होने की संभावना बढ़ जाएगी यदि आप खुद को सामने वाले के स्थान पर रखकर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं।


यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो क्या होता, क्या हमारी दुनिया एेसी होती, क्या मैं और भी बेहतर होता, क्या जिदंगी और भी अच्छी होती… इन सभी के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है पर एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि यदि मैं तुम्हारे स्थान पर होता तो आपके निर्णय बेहतर होते और आपको उन निर्णय निर्णयों पर अफसोस भी कम होता क्योंकि जब आप दूसरों के स्थान पर खुद को रखकर निर्णय लेते हैं तो दरअसल आप दूसरों के बारे में नहीं बल्कि खुद के बारे में निर्णय लेते हैं और आपके बारे में आपसे बेहतर कौन जानता है यही कारण है कि आपके निर्णय के सही होने की संभावना बढ़ जाती है…

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