मैं कोई किताब लिखूं…

मैं कोई किताब लिखूं,

उसकी तुम कहानी बनो

मैं कोई गीत लिखूं,

उसकी तुम ज़ुबानी बनो।

रास्ते तो बहुत हैं,

मेरी राह है कौन सी,

मैं कोई अंजाम लिखूं,

उसकी तुम निशानी बनो।

जिस्म से परे है वो,

मेरे इश्क का जो मुकाम है

भीगो दे जो मेरी रूह को,

तुम बूंद का वो पानी बनो।

सही-ग़लत, कुछ नहीं,

ये नज़र-नज़र की बात है

दुनिया ढूंढ़ती है नये को,

मेरे लिए तुम पुरानी बनो।

गुज़र जाएगा ये दौर भी,

कुछ साज़िश,कुछ इत्तेफ़ाक हैं

जिस्मों से जुड़ी रिश्तों की डोर है,

मेरे लिए तुम रूहानी बनो।

कांटें तो नसीब में बहुत थे,

हमें फूल भी कम मिले नहीं

ये ज़िंदगी खुदा की मेहर है,

इस ज़िंदगी की तुम मेहरबानी बनो…

© abhishek trehan

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