मेहनत बड़ी है या भाग्य

google image

दादाजी क्या मैं बड़ा होकर कलेक्टर बन पाऊंगा? दस वर्ष के प्रखर ने अपने दादाजी से यही प्रश्न पूछा था। प्रखर के दादाजी उच्च शिक्षित एक बेहद सुलझे हुए और मिलनसार व्यक्ति थे। वे भारतीय विदेश सेवा से कुछ समय पहले ही रिटायर हुए थे। प्रखर और उसकी छोटी बहन ऊर्जा को अपने दादाजी से विशेष लगाव था। वो दोनों छुट्टी के दिनों में दिन भर दादाजी के आसपास मंडराते रहते थे। दादाजी भी बच्चों से बेहद स्नेह करते थे और खेल-खेल में उन्हें मानवीय मूल्यों की शिक्षा दिया करते थे।

प्रखर के इस प्रश्न को सुनकर दादाजी के चेहरे पर मुस्कान आ गयी उन्होंने मुस्काते हुए पूछा कि प्रखर पहले यह बताओ कि तुम कलेक्टर क्यों बनाना चाहते हो? प्रखर ने कुछ सोचने के बाद उत्तर दिया कि दादाजी स्कूल में मेरे दोस्तों ने बताया है कि कलेक्टर बहुत बडा़ आदमी होता है, उसके पास बड़ी गाड़ी और घर होता है, मेरे दोस्तों ने बताया है कि उससे सभी लोग डरते हैं, दादाजी इसीलिए मैं कलेक्टर बनना चाहता हूं।

प्रखर के उत्तर से दादाजी को आश्चर्य नहीं हुआ। उन्हें प्रखर के बाल मन से उसी प्रकार के उत्तर की उम्मीद थी। उन्होंने कहा “बेटा यदि तुम सही दिशा में प्रयास करोगे, पूरे मनोयोग से परिश्रम करोगे और तुम्हारे भाग्य में होगा तो तुम अवश्य कलेक्टर बन जाओगे।” दादाजी के कहे शब्दों को प्रखर ध्यान से सुन रहा था। उसने बालसुलभ जिज्ञासा के साथ पूछा दादाजी भाग्य किसे कहते हैं?

यह प्रश्न सुनकर दादाजी कुछ गंभीर हो गए कुछ देर शांत रहने के बाद वो प्रखर को समझाते हुए बोले कि बेटा भाग्य यानी किये जा चुके कर्मों का संचय,बीते हुए कल में हमारे द्वारा किये गये कर्मों का फल ही भाग्य का निर्माण करता है। जब तुम बड़े हो जाओगे तो तुम्हें समझ में आने लगेगा कि जीवन में सब कुछ हमारे हाथ में नहीं होता है। हमारे हाथ में तो बस प्रयास करना या मेहनत करना होता है। कर्मों का फल हमारे हाथ में नहीं होता है।

हमारे प्रयासों के फल हमारे भाग्य के अनुरूप होते हैं। जीवन में कभी कभी बहुत प्रयास करने के बाद भी वांछित सफलता नहीं मिल पाती है। हमारे भाग्य के अनुरूप ही बाहर की परिस्थितियां परिवर्तित होने लगती हैं इनका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है और हमारी किस्मत हमें वहां पहुंचा देती है जहां हमें पहुंचाना होता है। भाग्य प्रबल और शक्तिशाली होता है।

दादाजी की बातों का प्रखर पर असर पड़ा था। पर अभी उसकी बुद्धि इतनी परिपक्व नहीं हुई थी कि इन बातों को उसके सही अर्थ में आत्मसात कर सके । प्रखर सोचने लगा कि मनुष्य का भाग्य ही सबकुछ होता है हम कुछ करें या न करें हमारे भाग्य में जो होगा वह हमें अवश्य ही मिल जाएगा। प्रखर में आए इस परिवर्तन से सभी हैरान थे। बात जब दादाजी तक पहुंची तब उन्होंने प्रखर की छोटी बहन ऊर्जा को बुलाकर प्रखर के इस व्यवहार के बारे में पूछा, ऊर्जा ने बताया कि भैय्या कह रहे थे कि पढ़ाई में मेहनत करने से कोई फायदा नहीं है दादाजी ने बताया है कि जो हमारे भाग्य में होता है वह हमें अवश्य ही मिल जाता है।

ऊर्जा की बात सुनकर दादाजी की चिंता कम हो गयी वो समझ गए कि प्रखर में आए इस अचानक परिवर्तन का कारण क्या है। उन्होंने प्रखर को बुलाया और समझाते हुए कहा कि ” बेटा तुमने मेरी बातों का जो अर्थ समझा है वो अधूरा है। भाग्य प्रबल और शक्तिशाली अवश्य है पर बिना पुरूषार्थ के वह अधूरा है। भाग्य और पुरूषार्थ एक दूसरे के पूरक हैं। जहां पुरूषार्थ है भाग्य भी उसी के साथ है। बेटा इतिहास की किताबों से लेकर हमारे वर्तमान समय में अनेक एेसे उदाहरण मिल जाएगें जिन्होंने अपने भाग्य को प्रबल पुरूषार्थ से बदल दिया। बेटा पुरूषार्थ ही वह ईधन है जिसकी शक्ति से जीवन की गाड़ी दौड़ती है।”

दादाजी की बातों को सुनकर प्रखर के मन से संदेह दूर हो रहा था। उसके मन से संशय के बादल छंट रहे थे। दादाजी अपनी बात जारी रखते हुए बोले बेटा प्रखर जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है उन कर्मों पर ध्यान देना जो हमारे हाथ में हैं जिस चीज पर हमारा वश नहीं है उसके बारे में ज्यादा सोचना निरर्थक है। कर्म ही हमारे वश में हैं कर्मों के फल या भाग्य हमारे नियंत्रण से बाहर है इसलिए हमें ज्यादा सोचना छोड़कर बस कर्म करते रहना चाहिए। यही भगवान कृष्ण ने गीता में भी कहा है कि कर्म करते हुए फल की चिंता मत करो।

दादाजी के शब्दों ने प्रखर के मन को छुआ था। प्रखर ने कर्म के महत्व को समझा और वह पुनः मेहनत से पढ़ाई करने लगा प्रखर को मेहनत के रास्ते पर लौटता देख कर सभी खुश थे। दादाजी शांत बैठे प्रखर और ऊर्जा को खेलता हुए देख रहे थे वो जानते थे कि अब बच्चों का भविष्य उज्ज्वल है। आज एक बार फिर साबित हो गया था कि भाग्य और पुरूषार्थ के बीच श्रेष्ठता की कशमकश में पुरूषार्थ ही सर्वोपरि है।

Leave a Reply