मासूमियत को अपनी बचा के तुम रखना…

मासूमियत को अपनी,

बचा के तुम रखना,

ये दुनिया मतलबी बहुत है,

ख़ुद को छिपा के तुम रखना।

लोग जुबां से हैं जो कहते,

दिल में होता वो नहीं है,

कुछ ख्वाईशों को अपनी,

दिल में दबा के तुम रखना।

नये रास्तों पर चलोगी,

नए शहर भी मिलेंगे,

भरोसा जिन पर कर लो,

वो लोग नहीं मिलेंगे।

पुराने ज़ख्मों को अब तुम,

अपनी यादों में याद रखना,

जो वक्त गुज़र गया है,

उसका हिसाब रखना।

बातों के इस दुनिया में,

होते हैं बहुत मतलब,

कहने से पहले कुछ भी,

शब्दों को तुम परखना।

कभी चोट भी मिलेगी,

कभी सबक भी मिलेंगे,

जो कोई गिरा दे तो,

गिर के फिर संभलना।

जिसने अपना कभी ना समझा,

उसे अब कर दो पराया,

जो फिर भी भुला ना पाओ

तो ख़ुद को ग़लत ना समझना…

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