गृह प्रवेश

सुधीर का पुणे से दिल्ली तबादला बहुत शार्ट नोटिस पर हुआ था। सुधीर और उसकी पत्नी सुनीता के लिए यह तबादला किसी सर दर्द से कम नहीं था। बच्चों का बड़ी मुश्किल से मिड टर्म में एडमिशन हुआ था। सुनीता की जॉब छूट गई थी। नई जगह पर गृहस्थी को नए सिरे से बसाने की चुनौती थी।


सुधीर ऑफिस के कामों में व्यस्त रहने लगे थे और बच्चे स्कूल चले जाते थे पर सुनीता का मन अभी भी उचाट था उसकी स्थिति मानो एक ऐसे पेड़ की तरह हो गई थी जिसे जड़ से उखाड़कर दूसरी जगह रोपा गया था और वह नई मिट्टी को पकड़ नहीं पा रहा था।

आते जाते सुनीता एक बात को कई दिनों से नोटिस कर रही थी की एक बुढ़िया उसके घर के सामने पेड़ की ओट में खड़े खड़े उसके घर को ताकती रहती है शुरुआत में तो सुनीता ने इस बात को इग्नोर किया पर जब आए दिन वह बुढ़िया को उस पेड़ के नीचे अपने घर की ओर टकटकी लगाए हुए देखती तो उसके मन में तरह-तरह की शंकाएं जन्म लेने लगीं।

एक दिन सुबह सुनीता ने छत से देखा सोसाइटी का वॉचमैन एक बुढ़िया के साथ मेन गेट पर खड़ा हुआ था। सुधीर उससे कुछ बात कर रहे थे पास से देखने पर उस बुढ़िया की सूरत कुछ जानी पहचानी सी लगी। थोड़ी देर बाद जब सुधीर अंदर आए  तो सुनीता कहने लगी कि यह तो वही बुढ़िया है जिसके बारे में मैंने आपको बताया था पर यह यहां क्यों आई है? सुनीता चिंतित होकर कहा।

सुधीर ने उत्तर दिया बताऊंगा तो आश्चर्यचकित रह जाओगी जैसा तुम उनके बारे में सोचती हो वैसा कुछ भी नहीं है जानती हो वह कौन हैं? सुनीता विस्मित होकर सुधीर की ओर ताक रही थी।

सुधीर कहने लगे इनका नाम मालती देवी है  यह इस घर की पुरानी मालकिन और मिस्टर दीपक की मां है जिनसे हमने यह घर खरीदा है। यह उन्हीं मिस्टर दीपक कि अभागी मां है जिन्होंने पहले धोखे से इनसे सब कुछ अपने नाम करा लिया और फिर बाद में यह घर हमें बेच कर इन्हें वृद्धा आश्रम में छोड़ दिया और खुद विदेश में रहने चले गए।

सुनीता को सहसा सुधीर की बात पर विश्वास ही नहीं हुआ थोड़ी देर बाद खुद को संभालते हुए उसने सुधीर से पूछा कि ये यहां अब क्या करने आई हैं? क्या यह घर वापस लेने आई है पर हमने तो इसे पूरी कीमत देकर खरीदा है, सुनीता ने चिंतित स्वर में कहा।

नहीं नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है दरअसल आज इनके पति की बरसी है यह उस ऊपर वाले कमरे में जा कर दिया जलाना चाहती हैं जहां उन्होंने अंतिम सांस ली थी सुधीर ने कहा।

सुनीता ने कहा मुझे इन बातों पर विश्वास नहीं है सुधीर बोले तुम्हें विश्वास नहीं है तो क्या हुआ उन्हें तो है, यदि हमारे छोटे से प्रयास से उनके दिल को शांति मिलती है तो उसमें हमारा क्या घटता है। अनमने मन से ही सही सुनीता ने उन्हें घर में आने की अनुमति दे दी।

मालती देवी अंदर आ गई दुर्बल काया फटी हुई धोती आंखों में कुछ जमे, कुछ पिघले हुए आंसुओं को लेकर वह अंदर आ गईं और उन्होंने सुधीर और सुनीता को ढेर सारी दुआएं दी।

आँखें भर भर के वह उस घर को देख रही थी जो कभी उनका अपना था आंखों में कितनी स्मृतियां कितने सुख, कितने दुख एक साथ तैर रहे थे, फिर वह ऊपर वाले कमरे में गई कुछ देर आंखें बंद करके बैठी रही उनकी बंद आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे फिर उन्होंने दिया जलाया प्रार्थना की और वापस दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहने लगी मैं इस घर में दुल्हन बन कर आई थी सोचा था अर्थी पर ही जाऊंगी मगर…. उनका गला भर आया।

सुधीर और सुनीता निशब्द बैठे रहे थोड़ी देर बाद उनसे बातें कर मालती देवी भारी कदमों से उठने लगी और चलने लगी पर उनके पैर तो जैसे ही इस घर की चौखट को छोड़ने को तैयार ही थे पर जाना तो था उनकी इस हालत को वह दोनों भी महसूस कर रहे थे।

आप जरा बैठी है मैं अभी आती हूं सुनीता मालती देवी को रोककर कमरे से बाहर चली गई और सुधीर को भी बाहर बुला लिया और कहने लगी कि सुनिए मुझे एक अच्छा आईडिया आया है जिससे हमारी लाइफ सुधर जाएगी और इनके टूटे दिल को भी आराम मिल जाएगा।

सुनीता ने कहा क्यों ना हम इन्हें यहीं रख ले यह अकेली है, बुजुर्ग हैं और इस घर में इनकी जान बसती है। यहां से कहीं जाएंगी भी नहीं और हम इन्हें वृद्धा आश्रम से अच्छा खाने पहनने को देंगे और अगर यह घर पर रहेंगे तो मैं भी आराम से नौकरी पर जा सकूंगी मुझे भी पीछे से घर की बच्चों की चिंता नहीं रहेगी। 

सुधीर ने कहा आइडिया तो अच्छा है पर क्या यह मान जाएगीं और कहीं मालकिन बन कर घर पर अपना हक जमाने लगी तो क्या करेंगे? सुनीता बोली और क्या करेंगे वृद्धा आश्रम में वापस छोड़ आएंगे, घर तो हमारे नाम से ही यह बुढ़िया कर ही कह सकती है? ठीक है, तुम बात करके देखो,सुधीर ने सहमति जताई।

सुनीता ने संभलकर बोलना शुरू किया, देखिए अगर आप चाहे तो यहां रह सकती हैं। मालती देवी की आंखें इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से चमक उठीं। क्या वाक़ई वो इस घर में रह सकती हैं, लेकिन फिर बुझ गईं। वो सोचने लगीं आज के ज़माने में जहां सगे बेटे ने ही उन्हें घर से यह कहते हुए बेदख़ल कर दिया कि अकेले बड़े घर में रहने से अच्छा उनके लिए वृद्धाश्रम में रहना होगा,वहां ये पराये लोग उसे बिना किसी स्वार्थ के क्यों रखेंगे?

मालती देवी ने कहा नहीं नहीं आपको बेकार में ही बहुत परेशानी होगी।परेशानी कैसी, इतना बड़ा घर है और आपके रहने से हमें भी आराम हो जाएगा, सुनीता ने उत्तर दिया।

हालांकि दुनियादारी के कटु अनुभवों से गुज़र चुकी मालती देवी सुनीता की आंखों में छिपी मंशा समझ गईं, मगर उस घर में रहने के मोह में वो मना न कर सकीं।

मालती देवी उनके साथ रहने आ गईं और आते ही उनके सधे हुए अनुभवी हाथों ने घर की ज़िम्मेदारी बख़ूबी संभाल ली।

सभी उन्हें  अम्मा कहकर ही बुलाते. हर काम उनकी निगरानी में सुचारु रूप से चलने लगा,घर की ज़िम्मेदारी से बेफ़िक्र होकर सुनीता  ने भी नौकरी ज्वॉइन कर ली. सालभर कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला।

बच्चे अम्मा से बेहद घुल-मिल गए थे। उनकी कहानियों के लालच में कभी देर तक टीवी से चिपके रहनेवाले बच्चे उनकी हर बात मानने लगे। समय से खाना-पीना और होमवर्क निपटाकर बिस्तर में पहुंच जाते। अम्मा अपनी कहानियों से बच्चों में एक ओर जहां अच्छे संस्कार डाल रही थीं, वहीं हर वक्त टीवी देखने की बुरी आदत से भी दूर ले जा रही थीं।

सुनीता और सुधीर बच्चों में आए सुखद परिवर्तन को देखकर अभिभूत थे, क्योंकि उन दोनों के पास तो कभी बच्चों के पास बैठ बातें करने का भी समय नहीं होता था।

आज सुनीता का जन्मदिन था। सुधीर और सुनीता ने ऑफ़िस से थोड़ा जल्दी निकलकर बाहर डिनर करने का प्लान बनाया था। सोचा था, बच्चों को अम्मा संभाल लेंगी, मगर घर में घुसते ही दोनों हैरान रह गए. बच्चों ने घर को गुब्बारों और झालरों से सजाया हुआ था।

इस सरप्राइज़ बर्थडे पार्टी, बच्चों के उत्साह और अम्मा की मेहनत से सुनीता अभिभूत हो उठी और उसकी आंखें भर आईं। इस तरह के वीआईपी ट्रीटमेंट की उसे आदत नहीं थी और इससे पहले बच्चों ने कभी उसके लिए ऐसा कुछ ख़ास किया भी नहीं था।

सुनीता की आंखों में अम्मा के लिए इज्जत बढ़ गई थी। बच्चों से ऐसा सुख तो उसे पहली बार ही मिला था,केक कटने के बाद मालती देवी ने अपने पल्लू में बंधी लाल रुमाल में लिपटी एक चीज़ निकाली और सुनीता की ओर बढ़ा दी।

“ये क्या है अम्मा?”

“तुम्हारे जन्मदिन का उपहार.”

सुनीता ने खोलकर देखा तो रुमाल में सोने की चेन थी।

वो चौंक पड़ी, “ये तो सोने की मालूम होती है।”

“हां बेटी, सोने की ही है. बहुत मन था कि तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें कोई तोहफ़ा दूं। कुछ और तो नहीं है मेरे पास, बस यही एक चेन है, जिसे संभालकर रखा था।मैं अब इसका क्या करूंगी, तुम पहनना, तुम पर बहुत अच्छी लगेगी।”

सुनीता की अंतरात्मा उसे कचोटने लगी. जिसे उसने लाचार बुढ़िया समझकर स्वार्थ से तत्पर हो अपने यहां आश्रय दिया, उनका इतना बड़ा दिल कि अपने पास बचे इकलौते आभूषण को भी वह उसे सहज ही दे रही है।

“नहीं, नहीं अम्मा, मैं इसे नहीं ले सकती।”

ले ले बेटी, एक मां का आशीर्वाद समझकर रख लो,मेरी तो उम्र भी हो चली है। क्या पता तेरे अगले जन्मदिन पर तुझे कुछ देने के लिए मैं रहूं भी या नहीं।

“नहीं अम्मा, ऐसा मत कहिए. ईश्वर आपका साया हमारे सिर पर सदा बनाए रखे.” कहकर सुनीता उनसे ऐसे लिपट गई, जैसे बरसों बाद कोई बिछड़ी बेटी अपनी मां से मिल रही हो.

वो जन्मदिन सुनीता कभी नहीं भूली, क्योंकि उसे उस दिन एक बेशक़ीमती उपहार मिला था, जिसकी क़ीमत कुछ लोग बिल्कुल नहीं समझते और वो है नि:स्वार्थ मानवीय भावनाओं से भरा मां का प्यार। 

वो जन्मदिन मालती देवी भी नहीं भूलीं, क्योंकि उस दिन उनका उस घर में पुन: गृह प्रवेश हुआ था। जिसकी गवाही उस घर के बाहर लगाई गई वो पुरानी नेमप्लेट भी दे रही थी, जिस पर लिखा था ‘मालती निवास’।

साभार : https://awgpskj.blogspot.com

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