मन के हारे हार है मन के जीते जीत

हौसला या हिम्मत एक सिक्के के दो पहलू हैं। मोटिवेशन की सारी थ्योरी इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती हैं। ये इन्सान की वो फितरत है जो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाने का माद्दा रखती है। जो भी उठा है इसी के बूते उठा है और जो नहीं उठ सका उसमें शायद इसकी कमी थी।

कुछ लोग खुद हौसला रखते हैं पर दूसरों को नहीं दे पाते वहीं कुछ लोग दूसरों को हौसला देते हैं पर खुद नहीं रख पाते। पहले को रिजर्व और दूसरे को सोशल कह सकते हैं। दोनों में बेहतर कौन है ये बिहेवियर सांइस के शोध का विषय है। कहते हैं सकारात्मक सोच हौसला या हिम्मत जुटाने का सबसे अच्छा श्रोत है।

सोच हमें अपने चारों तरफ के वातावरण से मिलती है पर यह भीतर से भी आती है चूंकि भीतर का बाहर और बाहर का भीतर प्रभाव पड़ता है इसलिए हमारी सोच भी सकारात्मक से नकारात्मक और नकारात्मक से सकारात्मक होती रहती है।

सामान्य स्थिति में बाहर का भीतर पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है ईसीलिए हमारा खुशियां हमारी सोच अक्सर दूसरों की मेहरबानी पर निर्भर करती है। जब हम किसी की मेहरबानी पर जीते हैं तो हम में हिम्मत या हौसला नहीं होता और जो होता है उसे डर कहते हैं भला डर के सहारे कभी कोई ऊंचा उठ सकता है? बुद्ध ने इसे समझा था और कहा था ” अपो दीपो भव:” अपने दीपक आप बनें। इसे आत्मसात करिये और खुद के बनाए डर से ऊपर उठिये ।

सपने देखने का अधिकार सबको है। सपने जिदंगी में उतने ही जरूरी हैं जितनी खीर में चीनी शायद सपने ही हैं जो पूरे हो या न हों पर दिल के हमेशा करीब होते हैं।

 हकीकत अक्सर निर्मम हुआ करती है ।हर सपने हर ख्वाब को कड़ी कसौटी पर आजमाती है और जो उस पर खरा नहीं उतरता उसे बिखरने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। पर सपने टूटने का मतलब ये नहीं कि वो बेकार थे दरअसल इस दुनिया के कुछ उसूल हैं और अपने सपने को जीने के लिए उन शर्तों को पूरा करना पड़ता है।

सफल होने और हार जाने में महज इतना फर्क है कि आप अपनी शर्तों पे जिए। सही या गलत कुछ नहीं है बस नजरिए का फर्क है। इतिहास गवाह है कि जो चीजों और घटनाओं को लेकर उदार रहा और जिसने दिल और दिमाग के दरवाजे खुले रखे सपने पूरे उसी के हुए। इसलिए खुद को उदार बनाइए और चीजों को आत्मसात करना सीखिए क्या पता किसी मोड़ पर इतिहास आप के इंतजार में हो।

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