मन के टूटे टुकड़े हैं…

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मन के टूटे टुकड़े हैं

जाऊँ मैं अब किस ओर प्रिये

कोई यहाँ गिरा,कोई वहाँ गिरा

हुआ कहाँ कोई बोध प्रिये

ऊँगलियों से बनी कोई मुट्ठी है

मुट्ठी में छिपी कोई रेखा है

उस रेखा को किस्मत कहते हैं

क्यूँ लिखे इतने अवरोध प्रिये

माना ये जीवन नश्वर है

नश्वर से जुड़ा मेरा हर नाता है

फिर भी दिल में क्यूँ कुछ चुभता है

कैसा है ये अपराध-बोध प्रिये

लगता सच क्यूँ लज्जित है

क्या लज्जा ही मर्यादा है

उस मर्यादा ने हमको बाँध दिया

फिर कैसा है ये क्रोध प्रिये

माया ने मुझको घेर लिया

झीना माया का हर धागा है

मैं अस्तित्व को अपने ढूंढ़ रहा

ये जीवन है गहरा शोध प्रिये

जो बीज था अब वो पेड़ बना

अब वो पेड़ कहानी सुनाता है

मिलना और बिछड़ना ही नियति है

शेष है सब संयोग प्रिये…

© trehan abhishek

#manawoawaratha

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