पिता…

कभी बादल जैसा बरस रहा
कभी ख़ामोश गहरा समंदर है
कभी पिता है छांव पीपल की
कभी पिता ही नीला अंबर है

नादान परिंदे क्या जानें
हँसता हुआ पिता भी टूटा अंदर है
उसका दिल भी मोम सा नाज़ुक है
फिर भी हर पिता मजबूत सिकंदर है

उन पर ख़ुदा की नेमत है
जिनके सिर पे पिता का साया है
ज़िदंगी है धूप जेठ महीने की
पिता नीम की शीतल छाया है

नासमझ हैं वो,जो परख रहे
उस पिता की बेइंतहा कुर्बानी को
जिसने ख़ुदा से बस यही दुआ है की
माफ़ करना बच्चों की हर नादानी को

मुझसे शुरू होकर,मुझ पर ख़त्म हुई
मेरे पिता की यही कहानी है
होगें लाख चाहने वाले मेरे दुनिया में
नहीं मेरे पिता का कोई सानी है

जब खोया तुम्हें तब पता चला
दुनिया कितनी सूखी और बंजर है
लोग ढूँढ़ते हैं तुम्हें अब तस्वीरों में
मुझे दिखता उसमें मेरा पैंगम्बर है…

© trehan abhishek

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