निस्वार्थ प्रेम

दिल्ली संकेत के लिए नई थी,अभी कुछ दिन पहले ही उसका सेलेक्शन बतौर साफ्टवेयर इंजीनियर गुड़गांव स्थित एक मल्टीनेशनल कंपनी में हुआ था। संकेत अपने कालेज के कुछ दोस्तों के साथ दिल्ली में रहता था और रोजाना मेट्रो ट्रेन से गुड़गांव अप-डाउन करता था।

हजारों लोग की भीड़ संकेत के साथ प्रतिदिन सफर करती थी। वह अक्टूबर महीने की शुरुआत के दिन थे, दिन जल्दी ढलने लगे थे और मौसम में हल्की ठंड का आगाज़ हुआ था। प्रतिदिन की तरह संकेत मेट्रो ट्रेन से वापस लौट रहा था, उसका स्टेशन आने ही वाला था कि एक स्टेशन पहले ट्रेन रूकी और एक लड़की ने उसके डिब्बे में प्रवेश किया और सामने वाली सीट पर बैठ गयी।

अगले दिन से संकेत ने महसूस किया कि न जाने क्यूं अब उसका आफिस से घर और घर से आफिस तक का समय आसानी से नहीं कटता, आते और जाते समय सफर के दौरान और स्टेशन पर हजारों की भीड़ में उसकी आँखें न जाने किसको ढूंढा करती हैं?

कुछ दिनों तक संकेत को वह लड़की नहीं दिखाई दी, एक दिन अचानक जब उसकी ट्रेन गंतव्य से एक स्टेशन पहले पहुंची तो ट्रेन की खिड़की से बाहर संकेत की निगाह गई, उसने देखा कि वही लड़की एक दूसरी लड़की का हाथ पकड़े हुए स्वचालित सीढ़ियों पर खड़ी हुई थी और रात में भी काला चश्मा पहने हुए थी। संकेत ने महसूस किया कि उसके दिल की धड़कन बढ़ गई है।

उस लड़की का नाम श्रुति था। श्रुति जन्म से ही कुछ देख नहीं सकती थी, उसने अपने मजबूत इरादों के बल पर उच्च शिक्षा प्राप्त की थी, वह सरकारी स्कूल में टीचर थी। कुछ दिनों की मुलाकात के पश्चात संकेत और श्रुति बहुत करीब आ गए थे। संकेत श्रुति की आंखें तो श्रुति संकेत की जुबान बन गई थी।

श्रुति हमेशा संकेत से कहती रहती थी की तुम मुझे इतना प्यार क्यूँ करते हो!मैं तुम्हारे किसी काम नहीं आ सकती मैं तुम्हें वो प्यार नहीं दे सकती जो कोई और देगा,लेकिन संकेत उसे हमेशा दिलासा देता रहता था कि तुम ठीक हो जाओगी, तुम्हीं मेरी दुनिया हो, कुछ समय तक ये सिलसिला यूहीं चलता रहा।

आज संकेत ने श्रुति से मिलने का वादा किया था, पर अंतिम समय में कुछ काम आ जाने से संकेत को देर हो गई थी और उसकी ट्रेन छूट गई थी, संकेत श्रुति को इंतजार नहीं करना चाहता था, उसने अपने दोस्त से बाइक मांग ली और तेज रफ्तार से श्रुति से मिलने के लिए निकल पड़ा।

काफी देर से श्रुति मेट्रो स्टेशन पर संकेत का इंतजार कर रही थी, जब काफी देर हो गई और घर जाने का समय हो गया तो उसने संकेत को फोन किया पर उसका फोन स्वीच आफ जा रहा था। अगली सुबह श्रुति को एक नामी अस्पताल से फोन आया कि किसी व्यक्ति ने आपकी आंखों के आपरेशन के लिए पैसे और अपनी आंखें दान की हैं। बहुत पूछने पर भी उस व्यक्ति का नाम और पता नहीं पता चल सका। श्रुति ने यह खुशी शेयर करने के लिए संकेत को फोन किया पर उसका फोन अभी भी स्वीच आफ था।

श्रुति को कुछ चिंता हुई पर उसने सोचा कि अाखों का आपरेशन कराकर वह संकेत को सरप्राइज देगी और सबसे पहले संकेत को देखेगी। श्रुति की आखों का आपरेशन सफल रहा। उसने अपनी सहेली से संकेत को फोन करने को कहा पर उसका फोन अभी भी बंद था। श्रुति के पास संकेत के रूम पार्टनर सुमित का नंबर भी था, जब उससे संपर्क किया गया तो उसने बस इतना कहा कि वो शाम को अस्पताल आएगा।

शाम को सुमित जब अस्पताल पहुंचा तो संकेत साथ नहीं था। श्रुति के बार बार पूछने पर वह बस इतना कह सका कि संकेत कहीं बिना बताए चला गया है, इसके आगे वह कुछ कह नहीं सका उसका गला रूंध गया और उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह वहां से चला गया और जाते जाते श्रुति के हाथों में एक पत्र थमा गया। श्रुति किसी अनहोनी की आशंका से सिहर उठी।

श्रुति ने कांपते हाथों से पत्र को खोला और पढना शुरू किया, पत्र अस्पष्ट राइटिंग और जल्दबाजी में लिखा था, इस पत्र में लिखा था कि जब तुम इस पत्र को नहीं पढ़ रही होगी तो शायद मैं तुम्हारे पास नहीं होऊंगा, पर यकीन मानों मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं और तुम्हारी आँखों से सब कुछ देख रहा हूँ। पत्र के अंत में लिखा था – अपना और मेरी आंखों का ख्याल रखना, तुम्हारा – संकेत।

कुछ समय पश्चात श्रुति को सच पता चला । संकेत की बाइक को उस रात किसी तेज रफ्तार कार ने टक्कर मार दी थी। संकेत को गंभीर अवस्था में उसी अस्पताल में लाया गया था। जब संकेत को अस्पताल लाया गया तब उसकी चेतना पूरी तरह लुप्त नहीं हुई थी। शायद संकेत को यह अहसास हो गया था कि उसका अंतिम समय नजदीक है। इसलिए उसने सुमित के माध्यम से अस्पताल प्रसाशन के सामने अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त कर दी थी।

संकेत जाते-जाते भी अपना वादा निभा गया था। उसने श्रुति की अंधेरी दुनिया को रोशनी दे दी थी,वह हमेशा के लिए श्रुति की आंखों में बस गया था।

चित्र स्रोत- गूगल इमेज

साभार- http://awgpskj.blogspot.com/

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