दो पल की ज़िंदगी है और अरमान बहुत हैं…

दो पल की ज़िंदगी है,

और अरमान बहुत हैं,

कहते वो कुछ नहीं हैं,

पर परेशान बहुत हैं।

छुपे-छुपे से हैं रहते,

दिखते कहीं नहीं हैं,

कहने को तो वो हैं मेरे,

पर हमसे अंजान बहुत हैं।

चेहरा हंस रहा है,

दिल में कसक है उठती,

जो होता नहीं, वो है दिखता,

और वो हैरान बहुत हैं।

चुप रहना भी हुनर है,

ख़ामोशी की भी नज़र है,

जल्दबाज़ है ये दुनिया,

और वो नादान बहुत हैं।

तन की बंदिशों से,

मन ने की है बगावत,

ज़माना कहता है इश्क जिसको,

किसी के लिए है वो इबादत।

ना उम्र की है सीमा,

ना मजहब ही कोई हद है,

ये इश्क का शहर है,

दूर अपना मुकाम बहुत है…

(स्वलिखित)

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