दूसरों के दर्द को बांटना ही संवेदना है

जीवन में संवेदनाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। यह संवेदना ही है जो इंसान और मशीन में फर्क करती हैं। आज एेसे बहुत से इंसानी काम हैं जो आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के माध्यम से रोबोट कर सकते हैं। बस यह संवेदनाएं ही हैं जो अभी तक विज्ञान और मशीन के परे हैं।

संवेदनशीलता यानि, दूसरों के दुःख-दर्द को समझना, अनुभव करना और उनके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है।

वह जेठ के महीने की एक दोपहर थी जब अविनाश जो कि कस्बे के डाकघर में पोस्टमैन था ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,चिट्ठी ले लीजिये। अंदर से एक लड़की की आवाज आई,आ रही हूँ। लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो अविनाश ने फिर जोर से आवाज लगाकर कहा,अरे भाई! मकान में कोई है क्या, अपनी चिट्ठी ले लो। तपती दोपहर की गर्मी ने अविनाश को कुछ बेचैन कर दिया था।

लड़की ने अंदर से ही उत्तर दिया,पोस्टमैन साहब, दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ। अविनाश ने सोचा लगता है कि इस लड़की को दूसरे की समस्या से कोई लेना-देना नहीं है तभी बार -बार पुकारने पर भी यह जल्दी नहीं आ रही है फिर भी उसने खुद को संभाला और कहा,नहीं, मैं खड़ा हूँ, रजिस्टर्ड चिट्ठी है,रसीद पर तुम्हारे साइन चाहिये। करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। अविनाश इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही, लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज लड़की जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी।

अविनाश अपनी सोच पर शर्मिंदा हुआ और चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। इसके बाद में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, अविनाश एक आवाज देता और जब तक वह लड़की न आ जाती तब तक खड़ा रहता। उस लड़की का नाम आरूषि था। एक दिन अविनाश आरूषि की डाक लेकर आया था तभी आरूषि ने देखा कि अविनाश के पांवों की चप्पलें टूट गई हैं, उसने सोचा कि बिना टूटी चप्पलें पहन कर घर घर जा कर डाक बांटने में अविनाश को कितनी तकलीफ होती होगी। दीपावली नजदीक आ रही थी वह सोच रही थी कि पोस्टमैन को क्या ईनाम दूँ।

उस दिन जब अविनाश डाक देकर चला गया, तब उस आरूषि ने, जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये।

दीपावली के कुछ दिन बाद अविनाश आरूषि की डाक लेकर आया उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई,कौन? पोस्टमैन, उत्तर मिला। आरूषि हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,अंकल, मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह गिफ्ट है। आरूषि ने कहा,अंकल प्लीज़ इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना। बिटिया को मना करके अविनाश उसके दिल को तोड़ना नहीं चाहता था। उसने अनमने भाव से लड़की के हाथ से पैकेट लिया और ठंडा शुक्रिया देकर चला गया।

घर जाकर जब अविनाश ने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे। साथ ही एक पत्र भी था जिसमें सुन्दर हैंडराइटिंग में लिखा था ” एक छोटी सी भेंट उन पैरों के लिए जिनको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है”। उसकी आखों में आंसू आ गए। अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए।

पोस्टमास्टर ने कारण पूछा,तो अविनाश ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,” सर आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?”

पोस्टमास्टर भला व्यक्ति था उसने कहा अविनाश ईश्वर से प्रार्थना है कि वह बिटिया जहां रहे यू हीं खुशियां बिखेरती रहे। वह ईश्वर हमें भी संवेदनाओं से भरा मन प्रदान करे ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें। संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है,अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है। अपनी बात खत्म करते हुए पोस्टमास्टर ने कहा अविनाश ईश्वर ढूंढने से कही नहीं मिलता वह एेसे ही किसी रूप में हमारे सामने आ जाता है और अहसास करा जाता है अपने होने का, वास्तव में जीना इसी का नाम है।

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