दिखता नहीं है जो वो कहीं अंदर छिपा रहता है

दिखता नहीं है जो वो कहीं अंदर छिपा रहता है,

ख़ामोश निगाहों में भी एक समंदर छिपा रहता है,

यकीन आता नहीं तो कभी आज़मा के देख लो,

रिश्तों की आड़ में भी एक खंजर छिपा रहता है।

जो कहते है उन्हें किसी का खौफ़ नहीं,

आखों में उनकी भी डर का मंज़र छिपा रहता है,

मुमकिन है किनारों को पता भी न चले,

ठहरे पानी में भी एक बवंडर छिपा रहता है।

कोई माने न माने पर हकीक़त है यही,

रिश्तों का मकसद तो मतलब के अंदर छिपा रहता है,

लोग ढूढ़ते हैं खु़दा को पत्थरों में कहीं,

असली ख़ुदा तो दिल के अंदर छिपा रहता है।

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