तेरे मिलावटी इश्क से तो दिल की दूरियां ही अच्छी हैं

तेरे मिलावटी इश्क से तो ,

दिल की दूरियां ही अच्छी हैं,

इस ज़माने की झूठी तसल्लियों से तो,

मेरी मजबूरियां ही अच्छी हैं।

दर्द को कब परवाह कि तुम कांटा या ग़ुलाब हो,

झूठ की मीठी ख़ुराक से तो,

सच की कड़वी गोलियां ही अच्छी हैं।

हर हमराज़ हमनवा बने ये मुमकिन कहां,

नकाब के पीछे छिपे चेहरों से तो,

पीठ पे छूरियां ही अच्छी हैं।

छूटे हुए तीर को हवाओं का इल्म नहीं,

बेकसूर के शिकार से तो,

हाथ में चूड़ियां ही अच्छी हैं।

हर सवाल का जवाब हो ये कहां लिखा,

बेकार की गलतफहमियों से तो,

उलझी पहेलियां ही अच्छी हैं।

तेरे मिलावटी इश्क से तो,

दिल की दूरियां ही अच्छी हैं,

इस ज़माने की झूठी तसल्लियों से तो,

मेरी मजबूरियां ही अच्छी हैं।

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