तेरी दुनियादारी से ऊबने लगा हूं मैं..

दुनिया तेरी दुनियादारी से ऊबने लगा हूं मैं,
वो मुझे चांद कहती थी उसी में डूबने लगा हूं मैं,
भटकते रहे उसकी तलाश में शहर-दर-शहर,
हर आईने में उसका अक्स ढूंड़ने लगा हूं मैं।

हर जख्म को दवा मिले ये मुमकिन तो नहीं,
नये दर्द से पुराने दर्द को बदलने लगा हूं मैं,
जो बादल न बरसे तो धरती की क्या ख़ता,
आजकल खुद से ही रूठने लगा हूं मैं।

वो बिखरी है मुझमें बनके खुशबू के मानिंद,
उसके ख्यालों में बसने लगा हूं मैं,
ख्वाबों से मुश्किल होती है हकीकत,
उनसे जुड़कर फिर से टूटने लगा हूं मैं।

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