जो भी हुआ अच्छा हुआ

जो भी हुआ अच्छा हुआ,

ख़त्म पुराना एक किस्सा हुआ,

जिसमें कभी समाया था वजूद मेरा,

दूर मुझसे आज मेरा वो हिस्सा हुआ।

वो अपनी ही धुन में खोई रही,

कोई बेमतलब ही रूसवा हुआ,

आग और पानी जैसा प्यार था अपना,

किस हक़ से फिर आज वो गुस्सा हुआ।

सूरत को सीरत पर तरजीह मिली,

हुस्न महंगा इश्क सस्ता हुआ,

कैसे मिलता दिल को करार,

ख़ुद से मिले भी एक अरसा हुआ।

Leave a Reply