जो जैसा करेगा वो वैसा भरेगा

कहते हैं कि कर्मों की गति बड़ी गहन होती है । हम जो कुछ भी कर्म आज करते है वो भविष्य मे हुमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है । कर्मफल के सिद्धान्त अटल और अकाट्य हैं। कभी जल्दी तो कभी देर से और कभी बहुत देर से पर कर्मों का फल मिलता अवश्य है।

कर्मों की गति गहन होती है जिसको साधारण बुद्धि और विवेक से समझना और उसकी वयाख्या करना आसान नहीं है। हमारे किन कर्मों के फल भविष्य मे किस रूप के मिलेंगे इसके बारे मे स्पष्ट रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता है। साधारण मनुष्य के लिए तो इतना ही समझ लेना काफ़ी है क़ि जो जैसे करेगा वो वैसा ही भरेगा।

देव का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। बचपन में ही माता पिता का साया उठ गया था। जीविका चलाने के लिए वह फेरी लगाकर सामान बेचता था और उसी से स्कूल की फीस भी भरता था।

वो जेठ के महीने के दिन थे आसमान में सूर्य पूरी प्रचंडता के साथ चमक रहा था। आसमान से मानो आग बरस रही थी। पेड़ पौधे, जीव जंतु सभी त्रस्त थे, धरती मानों वीरान सी हो गई थी।

इस प्रचंड गर्मी में भी देव समान बेचने के लिए घर घर घूम रहा था। उसे इस महीने के अंत में हर हाल में अपनी स्कूल की फीस भरनी थी। आज सुबह से ही उसका कोई सामान नहीं बिका था दोपहर होने को आई थी वह भूख प्यास से बेहाल हो रहा था।

जब भूख और प्यास असह्य हो गई तो उसने निश्चय किया कि अब वह जिस घर में भी जाएगा वहां पीने के लिए पानी और खाने के लिए कुछ मांग लेगा। देव ने एक घर का दरवाजा खटखटाया तो एक लड़की बाहर आयी उसे देखकर देव को कुछ संकोच हुआ और उसने खाने के बजाय सिर्फ पीने के लिए पानी मांग लिया।

लड़की ने न जाने कैसे यह भांप लिया कि वह भूखा है वह अंदर गई और वह दूध से भरा एक बड़ा गिलास ले आई। लड़के ने दूध पी लिया और धन्यवाद देते हुए दूध की कीमत पूछी। इस पर लड़की ने कहा कि पैसे किस बात के? आप यहां चाहें मेहमान की तरह आए हों अथवा जरूरतमंद की तरह, दोनों ही स्थितियों में आपसे पैसे लेना नहीं बनता है।

इस घटना के कई वर्षों बाद वह लड़की गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। जब स्थानीय चिकित्सक सफल नहीं हुए तो उसे शहर के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया। उसकी स्थिति को देखते हुए एक विशेषज्ञ डॉक्टर को मरीज देखने के लिए बुलाया गया उन्होंने लड़की को देखा और तय कर लिया कि उसकी जान बचनी ही चाहिए। डाक्टर की मेहनत रंग लाई और लड़की की जान बच गई।

डॉक्टर अस्पताल के कार्यालय में गये और उस लड़की के इलाज का बिल माँगाया . इस बिल के कोने मे उन्होने एक नोट लिखा और बिल को लड़की के पास भिजवा दिया। बिल देखकर लड़की सोचने लगी कि बीमारी से तो वह बच गयी है, पर अब बिल कैसे भरेगी?

उसने बिल को देखा तो उसकी नज़र बिल के कोने पर लिखे संदेश पर गयी। वहां पर लिखा था कि आपको इस बिल का भुगतान करने की कोई आवश्कता नही है। एक गिलास दूध के माध्यम से आपके द्वारा इस बिल का भुगतान वर्षों पहले ही किया जा चुका है । नीचे डॉक्टर देव के हस्ताक्षर थे।

लड़की समझ चुकी थी कि जिस लड़के की उसने वर्षों पहले एक गिलास दूध देकर मदद की थी उसी ने आज उसे इतने बड़े संकट से मुक्त किया है।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि समय आने पर हमे हमारे कर्म परिपक्व होकर कर्मों का फल देते ही हैं। आवश्यकता है तो बस लगतार सत्कर्म करने की साथ ही फल की प्राप्ति के लिए हमें अधीर भी नही होना चाहिए।

इस सन्दर्भ में कबीरदस जी का बड़ा ही सटीक दोहा है-

धीरे -धीरे रे मना, धीरे सब कछु होये।

माली सींचै सौ घड़ा, ऋतु आए फल होये।।

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