रिश्ते

जीवन अपनों से ही परिभाषित होता है। जीवन की सार्थकता अपनों के बीच ही है। अपरिचित व्यक्तियों और अनजान स्थान पर जीवन व्यतीत करना मुश्किल हो जाता है। अनजानी जगहों पर मुख्य बाधा विचारों के आदान-प्रदान में आती है। जहां हम किसी से व्यवहार नहीं कर सकते और कोई हमें समझ नहीं पाता है तो वहां रहने में मुश्किल आना स्वाभाविक ही है।

संबंधों के लिए भावनाओं की जरूरत होती है। भावनाओं के तार ही हमें एक दूसरे से जोड़ने का काम करते हैं। जब तक भाव नहीं जुड़ते हैं तब तक संबंध मजबूत नहीं होते हैं और संबंधों में गहराई नहीं आती है।

जब कोई हमें समझने वाला होता है, जो हमारे सुख-दुख से संवेदित होता है, हमारे साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है तो वहां जिदंगी का फूल विकसित होकर खिलता है। जहां लोग अपने होते हैं वहां जीवन की परिस्थितियां लगभग एक जैसी होती हैं और मंजिल साथ मिलकर बढ़ने पर मिल ही जाती है।

जीवन के विकास में अपनत्व और प्रेम की बहुत आवश्यकता होती है जो हमें केवल अपनों द्वारा ही मिल पाता है, दूसरे शब्दों में जहां अपनत्व मिलता है वहीं लोग अपने होते हैं।

सामान्य रूप से हम अपने संबंधियों और परिवार के सदस्यों को ही अपना समझते हैं पर ये सब मात्र शरीर और रक्त के संबंध हैं। सच्चे संबंध तो वहां बनते हैं जहां पर विचार और भावनाएं मिलती हैं।

विचार और भावनाओं के मेल से ही संबंधों में स्थायित्व आता है, उनमें प्रेम पनपता है और रिश्तों में गर्माहट आती है। सच्चे संबंध ही जीवन को सार्थक और बेहतर बनाते हैं। हमें भी भावनाओं को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि भावनाओं की मजबूती पर ही रिश्तों की इमारत खड़ी होती है।

इंसान के रिश्ते वक्त जरूरत के मुताबिक बदलते रहते हैं, पुराने संबंध टूटते और नये बनते हैं। कभी अपने पराये तो कभी पराए अपने बन जाते हैं। पुराने लोगों की जगह नये लोग आते हैं और नया रिश्ता बन जाता है, लोग साथ छोड़कर चले जाते हैं और रिश्ता खत्म हो जाता है। कुछ संबंध एेसे भी होते हैं जो समय के परे हैं जिन रिश्तों में भावनाएं गहरी और सच्ची होती हैं उन्हें काल भी मिटा नहीं पाता है।

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