जाते-जाते न जाने क्यूं एक लम्हा ठहर गया

जाते-जाते न जाने क्यूं लम्हा एक ठहर गया,

देकर दर्द जुदाई का न जाने किस शहर गया,

हंसते हैं वो इस तरह से मानो कुछ हुआ ही नहीं,

आग लगी थी कहीं पर, पानी कहीं पर बह गया।

गहरे तजुर्बे दे गये इश्क के वो चार दिन,

आधा भरा था पैमाना, आधा खाली रह गया,

जाते हुए लम्हों मुझ पर कुछ इल्जा़म तो कहो,

कागज़ पे कुछ लिखा था, कुछ अधूरा रह गया।

पता चला है हाल उनके हमसे जुदा नहीं,

आसुओं की बारिश में सारा ख़ुमार बह गया,

हर मोड़ को मज़िल मिले ये मुमकिन कहां,

जख़्म पुराने भर गए, दाग़ दामन पे रह गया।

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